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महाराष्ट्र: अब बहुजन क्रांति मोर्चा के नाम पर SC/ST/OBC एकजुट

अश्विन अघोर | Updated on: 28 October 2016, 3:07 IST
QUICK PILL
  • महाराष्ट्र में दलितों, आदिवासियों और ओबीसी समुदाय ने एकजुट होकर बहुजन क्रांति मोर्चे का गठन किया है. 
  • यह मोर्चा कई महीने से चल रही मराठा समाज की रैली के सामने आकर उनकी मांगों के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं. 

बहुजन क्रांति मोर्चा दलितों, ओबीसी समुदायों और मुस्लिमों का एक समूह है. इतिहास में शायद यह पहली बार है, जब ये समुदाय एक कॉमन अजेंडा के साथ एक मंच पर आ खड़े हुए हैं. राजनीतिक विश्लेषक गणेश तोरेस्कर कहते हैं कि यह इस बात का संकेत है कि इन समुदायों का कांग्रेस और एनसीपी से मोहभंग हो गया है. ऐसा भी हो सकता है कि ये भाजपा और शिवसेना के साथ मिल जाएं. 

नया गठबंधन

महाराष्ट्र में पिछले तीन महीने से मराठा क्रांति मोर्चा पूरे राज्य में मूक रैलियां निकालकर सरकार पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है. इनकी रैलियां कामयाब भी हुई हैं. मराठा समाज एससी, एसटी (प्रिवेंशन एंड एट्रोसिटी) एक्ट-1989 में संशोधन कर अन्य पिछड़ा वर्ग कैटेगिरी में आरक्षण की मांग के लिए आंदोलन कर रहा है.

वहीं बहुजन क्रांति मोर्चा ने पिछले महीने नासिक में रैली निकाली थी. इसके बाद से राज्य के दलित, जनजाति, बंजारा, ओबीसी और मुस्लिम एकजुट होते गए और इन्होंने भी राज्य के कई शहरों में रैलियां निकालीं. इन्होंने एससी, एसटी एक्ट 1989 में संशोधन किए जाने की किसी पहल का कड़ा विरोध किया है. दोनों मोर्चों के अजेंडा से इनके बीच की राजनीतिक रेखा साफ़ हो गई है.

राज्यय के सभी मराठा नेता पहले ही मराठा क्रांति मोर्चा की मांगों को अपना समर्थन दे चुके हैं. बहुजन क्रांति मोर्चे के इस फैसले का असर भविष्य में होने वाले सभी चुनावों पर पड़ेगा. ख़ासकर, अगले साल फरवरी में प्रस्तावित निकाय चुनावों में नेता दबाव में रहेंगे.

मुद्दा

महाराष्ट्र क्रांति मोर्चा के सूत्रधार और ओबीसी एक्टिविस्ट प्रो. श्रवण देवड़ा कहते हैं कि हम किसी भी जाति को आरक्षण देने के खिलाफ नहीं हैं. हमारा सिर्फ़ इतना कहना है कि ओबीसी में मराठा समाज को न शामिल किया जाए. इससे हमारे आरक्षण का हिस्सा कम हो जाएगा और हमारे समाज के योग्य बच्चे कॉलेजों में एडमिशन और नौकरियों से महरूम हो जाएंगे. 

रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया के अध्यक्ष रामदास अठावले कहते हैं कि यह अधिनियम आज भी देश में दलितों की वैसाखी है. अगर इसे कमज़ोर किया जाता है तो हमें संकट से बचाने में कोई मदद नहीं करेगा. दलित उत्पीडऩ के कई मामलों पर तो कोई ध्यान ही नहीं दिया जाता. यह गम्भीर मामला है. हम अधिनियम के साथ किसी भी छेड़छाड़ को बर्दाश्त नहीं करेंगे.

ओबीसी और दलित इस मुद्दे पर जहां एकजुट हैं, वहीं महाराष्ट्र के मराठा नेता इस गर्मी को सहने के लिए मजबूर हैं. इस फैसले से कांग्रेस और एनसीपी बुरी तरह प्रभावित हुई है क्योंकि इन दलों में सबसे ज्यादा इन समुदाय के नेता है और सबसे बड़ा वोटबैंक भी यही लोग हैं.

यह सब कैसे शुरू हुआ?

तीन महीने पहले अहमदनगर जिले के कोपार्डी में एक नाबालिग लड़की के साथ हुए गैंगरेप और हत्या की घटना के बाद राज्य में जातीय भावना भड़क गई थी. पीडि़ता मराठा समाज की थी जबकि अभियुक्त दलित था. इस घटना ने गंभीर मोड़ ले लिया और नाराजगी की लहर पूरे राज्य में मराठा रैली के ज़रिए फैल गई.

मराठाओं की रैली का असर एनसीपी नेता शरद पवार के इस बयान से लगाया जा सकता है कि एट्रोसिटी एक्ट का गलत इस्तेमाल हो रहा है और इसमें संशोधन किए जाने की जरूरत है. शरद पवार के इस बयान से राज्य में चिंगारी और भड़क गई और मराठा क्रांति मोर्चा ने इसे अपनी प्रमुख मांग बना लिया. 

बढ़ती नाराजगी

शुरू में प्रकाश अम्बेडकर, रामदास अठावले, आनन्दराज आंबेडकर, प्रो. जोगन्द्र कावडे जैसे दलित नेताओं ने अपने अनुयायियों से अपील की कि वे मराठाओं के ख़िलाफ़ रैलियां न निकालें. मगर मराठा क्रांति मोर्चा की हर रैली में उत्तेजक भाषणों से यह गुस्सा बढ़ता गया था. 

दलित स्कॉलर प्रदन्य पवार कहते हैं कि मराठा समाज के नेता सिर्फ 'जिजाऊ की पुत्रियों' के बारे में बात कर रहे थे. क्या उनके लिए केवल उनकी बेटियां और महिलाएं ही महत्व रखती हैं. दलित लड़कियों और महिलाओं का सिर्फ़ उत्पीडऩ ही किया जाता रहेगा?

नासिक के तालेगांव में एक पांच साल बच्ची के साथ कथित बलात्कार हुआ. इसके बाद स्थानीय लोगों ने बसों में आग लगा दी. कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए कई गांवों में कर्फ्यू भी लगाना पड़ गया. यह गुस्सा एक हफ्ते तक बना रहा था. इसके बाद बहुजन क्रांति मोर्चा ने एट्रोसिटी एक्ट के समर्थन में रैलियां निकालनी शुरू कर दी. इस रैली में भी मुस्लिमों समेत विभिन्न जातियों और समुदाय के लाखों लोगों ने भाग लिया.

एकजुटता

प्रो. देवड़ा कहते हैं कि बहुजन क्रांति मोर्चा की रैलियां मराठा समाज की रैलियों से पूरी तरह अलग हैं. हमें 400 से ज्यादा जातियों का समर्थन मिला है. हमने पिछले विधानसभा चुनावों में अपनी ताकत दिखा दी है. पिछली सरकार ने ओबीसी वर्ग के तहत मराठा समुदाय के लिए आरक्षण की घोषणा की. 

इसके बाद हमने मराठा नेताओं को वोट न देने का फैसला किया था. नतीजे सामने हैं. अब सदन में मराठा विधायकों की संख्या 100 के आसपास रह गई और ओबीसी विधायकों की संख्या में इजाफा हो गया. इन रैलियों में पार्टी लाइन से हटकर मराठा नेताओं ने भागीदारी निभाई है और अपना समर्थन दिया है.

तोरेस्कर कहते हैं कि यह ज़रूरी था. राज्य में दलित और ओबीसी समुदाय के लोग खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे थे ख़ासकर, मराठा समाज की रैलियों के बाद से.

तोरेस्कर कहते हैं कि यह परंपरागत मराठा राजनीति के अंत की शुरुआत है. शरद पवार जैसे नेता अपने फायदों के लिए दलितों और ओबीसी समुदायों का इस्तेमाल करते रहे हैं. लेकिन अब मराठा नेताओं ने उन्हें एक किनारे कर दिया है. अब उनके पास ज्यादा विकल्प नहीं हैं. जो भी नेता एट्रोसिटी एक्ट में संशोधन के लिए कहेगा, वह कांग्रेस और एनसीपी के ताबूत में एक और कील ही ठोकेगा.

तोरेस्कर आगे कहते हैं कि इन दोनों दलों ने अपनी प्रासंगिकता खो दी है. फुले-शाहू-अम्बेडकर के नाम पर हमेशा राजनीति की गई है. मराठाओं को कम आंका गया है. अब ज्यादा इसे स्वीकारा नहीं जाएगा. दलित और ओबीसी को लोग अब खुद को एट्रोसिटी एक्ट के तहत सुरक्षित करने की तैयारी कर रहे हैं. कांग्रेस और एनसीपी के लिए यह बहुत ही नाज़ुक स्थिति है. इन दलों को भविष्य में चुनावों में काफी नुकसान उठना पड़ेगा. अगले साल फरवरी में नगर निकायों के चुनाव प्रस्तावित हैं ही.

First published: 28 October 2016, 3:07 IST
 
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