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EXCLUSIVE: बालाघाट का आरएसएस प्रचारक और कहानी पांच मुक़दमों की

शाहनवाज़ मलिक | Updated on: 12 October 2016, 5:09 IST
(Special Arrangment)
QUICK PILL
  • मध्यप्रदेश के बालाघाट ज़िले में एक संघ प्रचारक की शिकायत के बाद 26 सितंबर से फ़रार चल रहे आठ पुलिसवालों ने अभी तक सरेंडर नहीं किया है.
  • उनमें से कुछ फरार पुलिसवालों ने कैच न्यूज़ से संपर्क उनसे अपनी आपबीती साझा की है. फरार थानाध्यक्ष जियाउल हक अपनी जान को खतरा होने की बात बता रहे हैं. उनका आरोप है कि राजनीतिक दबाव में उनके ऊपर हत्या की कोशिश जैसी गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया है.
  • फरार पुलिसकर्मियों ने अपने गुप्त आवास पर कैच को बताया कि मध्य प्रदेश में भाजपा की सरकार और संघ की ताकत के चलते उनके ऊपर जबरन कार्रवाई की जा रही है जबकि आरोपी प्रचारक को बचाया जा रहा है.

विजयदशमी के मौक़े पर जब आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत नागपुर से राष्ट्र को संबोधित कर रहे थे, तब उनके संगठन के ख़ौफ़ से मध्यप्रदेश पुलिस के आठ अफ़सर और कर्मचारी देश के अलग-अलग हिस्सों फरारी काट रहे थे. जब कभी मध्यप्रदेश पुलिस का इतिहास खंगाला जाएगा, तब 26 सितंबर 2016 को मध्य प्रदेश के बालाघाट से फ़रार इन पुलिसवालों का क़िस्सा फ़ेहरिस्त में सबसे ऊपर नज़र आएगा. यह एक ऐसा मामला है जिसने फ़रार पुलिस अफ़सरों का भरोसा अपने ही डिपार्टमेंट से उठा दिया.

16 दिनों से अंडरग्राउंड चल रहे इन पुलिसकर्मियों में से कुछ ने कैच से संपर्क कर अपनी आपबीती साझा की. फरार पुलिस वालों से बातचीत में अफ़सरों की हताशा, राजनीतिक व्यवस्था का दोहरापन और अपने ही विभाग की बेरुखी सामने आई.

अंडरग्राउंड अफ़सर कहते हैं, 'मध्यप्रदेश से कोई भी दल, संगठन या विभाग अभी तक हमारी मदद के लिए ना सामने आए हैं और ना ही कोई उम्मीद है. यहां संघ के ख़िलाफ़ कोई ज़ुबान नहीं खोलना चाहता. हमें अपनी जान का भी डर सता रहा है.'

राजनीतिक दबाव में हत्या की कोशिश के आरोपी बनाए जाने के बाद बालाघाट जिले के आठ पुलिस वाले अपराधियों की तरह छिपने और भागने को मजबूर हैं. फ़रार होने के बाद से ये पुलिसवाले सरेंडर की बजाय अग्रिम ज़मानत पाने की कोशिश में लगे हैं लेकिन पिछले हफ्ते बालाघाट की निचली अदालत ने एडिशनल एसपी राजेश शर्मा और एएसआई सुरेश विजयवार की ज़मानत याचिका ख़ारिज कर दी. अदालत के इस रुख़ से सभी पुलिसवाले हैरान हैं.

24 घंटे में पांच एफ़आईआर

बालाघाट ज़िले के बैहर कस्बे में 25-26 सितंबर की दरमियानी रात आरएसएस के ज़िला प्रचारक सुरेश यादव को गिरफ्तार किया गया था. सुरेश पर आरोप है कि वह एक व्हाट्एप ग्रुप में संप्रदाय विशेष के खिलाफ घृणा भरे संदेश भेज रहे थे. (कैच के पास उन संदेश का स्क्रीनशॉट मौजूद है).

मगर सुरेश की गिरफ्तारी की ख़बर सुनकर स्थानीय भाजपा नेताओं और आरएसएस कार्यकर्ताओं की भीड़ मौक़े पर जमा हो गई. बैहर नगर पंचायत अध्यक्ष यशवंती के पति गुड्डा मरकाम ने सुरेश यादव की ज़मानत ली लेकिन वहां से जाने की बजाय उन लोगों ने बैहर थाने का घेराव शुरू कर दिया. बैहर तहसीलदार अजय सिंह ने कैच न्यूज़ से कहा, 'तकरीबन छह सौ लोगों की भीड़ थी. वे सांप्रदायिक नारेबाज़ी कर रहे थे और थाने में घुसकर उन पुलिसवालों पर हमला करना चाहते थे जिन्होंने सुरेश यादव पर कार्रवाई की थी. मैंने लाठीचार्ज का आदेश दिया और भीड़ को पीछे ढकेला. हमारा काम उन्हें काबू और शांत करना था.'

दूसरी तरफ़ भीड़ का उन्मादी रुख़ देखकर एसएचओ ज़ियाउल हक़ समेत पूरी टीम को थाने के कमरे में छिपा दिया गया था. सभी पुलिसकर्मी थाने के एक कमरे में दुबके रहे. रात में तकरीबन 3 बजे एसपी डॉक्टर असित यादव थाने पर पहुंचे. फिर सुरेश यादव की तहरीर पर हेड कांस्टेबल ख्याल सिंह वरकड़े ने अपने ही एडिशनल एसपी, एसएचओ समेत आठ पुलिसवालों पर हत्या की कोशिश जैसी गंभीर अपराध की धाराओं के तहत एफआईआर लिखी.

अंडरग्राउंड एक पुलिस अफ़सर कहते हैं, 'ऐसे बहुत सारे लोग हैं जो दबे मुंह हमारे साथ हुई नाइंसाफ़ी की बात स्वीकार रहे हैं लेकिन वे किसी भी तरह की मदद करने की हालत में नहीं हैं. वे खुलकर कुछ बोलना भी चाहते हैं तो फ़ेसबुक या ट्वीटर की बजाय वॉट्सएप जैसे एप्लीकेशन पर बात करते हैं.'

चश्मदीद प्रशासनिक अफ़सरों और पुलिसकर्मियों के मुताबिक स्थानीय भाजपा नेताओं और आरएसएस समर्थकों की अगुवाई में बैहर थाने के बाहर जमा भीड़ पुलिस-प्रशासन पर हावी हो गई थी. भीड़ ने एक असिस्टेंट सब इंस्पेक्टर योगेंद्र चौहान के साथ मारपीट भी की, सब डिविज़नल पुलिस ऑफिसर पीएस मेहरा की सरकारी कार पर हमला किया और बैहर पुलिस स्टेशन का गेट तोड़कर भीतर घुसने की कोशिश भी की.

उस रात 12 बजे से बैहर थाने में पुलिसकर्मियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का शुरु हुआ सिलसिला अगले 24 घंटे तक जारी रहा. अलग-अलग कुल पांच एफआईआर दर्ज हुईं लेकिन असर सिर्फ़ उन्हीं मुक़दमों का दिख रहा है जो पुलिसवालों पर दर्ज की गई हैं.

पुलिसवालों पर हमलावर 'अज्ञात'

25 सितंबर की रात जब बैहर थाने के बाहर जमा हिंसक भीड़ ने एएसआई योगेंद्र चौहान पर हमला किया तो उनकी शिक़ायत पर एफ़आईआर 'अज्ञात' हमलावरों पर दर्ज हुई. भारी पुलिसबल और अफ़सरों की मौक़े पर मौजूदगी के बावजूद कोई मुंह नहीं खोल सका कि योगेंद्र चौहान पर हमला किसने किया.

इसी तरह एसडीपीओ पीएस मेहरा के ड्राइवर झनक सिंह ने अपने अफ़सर की गाड़ी पर हुए हमले की तहरीर दी तो इस मामले में भी हमलावर अज्ञात ही रहे. यह हमला भी थाने के बाहर ही हुआ जहां पूरा प्रशासनिक अमला मौजूद था. हमले के वक्त पीएस मेहरा के ड्राइवर झनक सिंह सुरेश यादव की मेडिकल जांच के लिए दो डॉक्टरों का दल बैहर पुलिस स्टेशन लेकर आ रहे थे. 

फ़िलहाल पुलिसवालों पर हमले की दोनों एफ़आईआर भी एसआईटी को सौंप दी गई है और अभी तक जांच में कुछ भी हासिल नहीं हो सका है और ना ही कोई कार्रवाई हुई है.  एसआईटी अभी सिर्फ़ चश्मदीदों और इस केस से जुड़े लोगों के बयान दर्ज कर रही है.

सुरेश यादव के साथ मारपीट में नामजद मुक़दमा, अफ़सर पर गाज

बैहर थाने के बाहर जमा भीड़ ने पुलिसवालों पर हमला किया तो अभी तक कोई कार्रवाई नहीं हुई. वहीं पुलिसवालों पर दर्ज दो मुक़दमे ने अफसरों के निलंबन से लेकर उन्हें अंडरग्राउंड होने के लिए मजबूर कर दिया है. पुलिसवालों पर दो एफ़आईआर आरएसएस ज़िला प्रचारक सुरेश यादव और बैहर स्थित असाटी मेडिकल स्टोर के मालिक स्वामी प्रसाद असाटी की तहरीर पर दर्ज की गई थी.

अंडरग्राउंड अफ़सर कैच को बताते हैं कि हमने सुरेश यादव का दो बार मेडिकल करवाया. 25 सितंबर की रात बैहर स्वास्थ्य केंद्र के दो डॉक्टरों ने उनकी रिपोर्ट तैयार की. 26 सितंबर की सुबह बालाघाट के ज़िला अस्पताल से उनकी मेडिकल रिपोर्ट बनी. दोनों रिपोर्टों में सुरेश यादव के शरीर पर मामूली सूजन और खरोंच का ज़िक्र है. फिर भी हम पुलिसवालों पर हत्या की कोशिश जैसी गंभीर धारा में मुक़दमा दर्ज कर दिया गया. (कैच के पास दोनों मेडिकल रिपोर्ट मौजूद हैं).

हमे फंसाने की हर मुमकिन कोशिश

अफ़सर कहते हैं कि हमारे ख़िलाफ़ माहौल बनाने की कोशिश हर मोर्चे पर हुई है. जैसे सुरेश यादव जबलपुर के जिस जामदार हॉस्पिटल में भर्ती हैं, उसके मालिक डॉक्टर जितेंद्र जामदार बीजेपी और आरएसएस में लंबे समय से सक्रिय हैं. यहां पहुंचते ही सुरेश यादव के पांव में प्लास्टर चढ़ा दिया गया जबकि दो सरकारी मेडिकल रिपोर्टों में फ्रैक्चर की आशंका तक ज़ाहिर नहीं की गई है.

बिना अपराध के जेल नहीं

अंडरग्राउंड अफ़सर कैच को बताते हैं कि 10 साल लंबा अनुभव होने के बावजूद मैंने कभी भी एफ़आईआर शुरुआती जांच के बिना नहीं लिखी. पुलिस विभाग में यह कल्चर ही नहीं है कि शिकायत मिलते ही गंभीर धाराओं में मुक़दमा कर दिया जाए.

हमने ज़िला प्रचारक सुरेश यादव के मोबाइल में भड़काऊ कंटेंट मिलने के बाद ही उन्हें गिरफ्तार किया था लेकिन जब पुलिसवालों के ख़िलाफ़ यह कार्रवाई हुई तब सभी मान्य प्रक्रियाओं की अनदेखी की गई. बिना किसी शुरुआती जांच के चार अफ़सरों समेत आठ पुलिसवालों का निलंबन कर दिया. तीन होमगार्ड बर्ख़ास्त हुए और एसपी, डीआईजी का तबादला कर दिया गया. सुरेश यादव की मेडिकल रिपोर्ट में अगर कुछ भी गंभीर नहीं है तो हत्या की कोशिश की धारा कैसे लगाई जा सकती है?

दूसरी तरफ एएसआई योगेंद्र चौहान के साथ मारपीट और पीएस मेहरा की कार पर हमला करने वाले कौन थे? कोई मुंह नहीं खोल रहा मगर दोनों अंडरग्राउंड अफ़सरों का दावा है कि बैहर पुलिस स्टेशन के बाहर जमा भीड़ की अगुवाई भाजपा नेता अर्जुन जायसवाल. प्रमोद नेमा, भगत नेताम और सुरेंद्र उर्फ़ गुड्डू मरकाम कर रहे थे.

बहरहाल, अफ़सर कहते हैं कि हमें कुछ महीने भटकना मंज़ूर है लेकिन सरेंडर नहीं. हम बिना अपराध के सिर्फ़ राजनीतिक दबाव में हम जेल नहीं जाना चाहते. अगर हाईकोर्ट से ज़मानत नहीं मिली तो सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाएंगे.

First published: 12 October 2016, 5:09 IST
 
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