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एस्कॉर्ट सेवाओं पर प्रतिबंध: क्या सरकार लोगों की निजता में फिर से ताकझांक कर रही है?

शुमा राहा | Updated on: 16 June 2016, 14:29 IST
(गेट्टी इमेजेज)

13 जून को सूचना तकनीकी एवं संचार मंत्रालय ने देश भर में एस्कॉर्ट सेवा देने वाली 240 वेबसाइटों को ब्लॉक करने का आदेश दिया है. इस फैसले के पीछे सरकार की तरफ से कोई स्पष्ट वजह नहीं बताई गई है.

पिछले साल जुलाई में, लोगों को इंटरनेट के अनैतिक प्रभाव से बचाने के लिए केंद्र सरकार ने 857 पोर्नोग्राफिक वेबसाइटों को बैन करने की मुहिम छेड़ी थी. हालांकि सरकार की ये पहल सार्वजनिक स्तर पर असफल साबित हुई. इंटरनेट की निगरानी करने और यौन विषयों से जुड़े लोगों की निजी ज़िंदगी पर हमले का आरोप लगाते हुए सोशल मीडिया में इस फ़ैसले का ज़बरदस्त विरोध हुआ था. 

एस्कॉर्ट सर्विस उपलब्ध करवाने वाली साइटों को बैन करना यह दिखाता है कि सरकार इंटरनेट सेंसरशिप के अपने इरादे पर टिकी हुई है. सरकार पिछले एक साल से, इंटरनेट सेंसरशिप के माध्यम से लोगों को नैतिकता का पाठ सिखाने की कोशिश में लगी हुई है.

यौन सम्बन्धों के लिहाज से एस्कॉर्ट सर्विस निश्चित तौर पर सेक्स पार्टनर्स ढूंढ़ने और संपर्क बढ़ाने का आसान माध्यम है. मीडिया रिपोर्टों की मानें तो, ऐसी 240 पोर्नोग्राफिक साइटों को सरकारी आदेश के बाद बैन करने का अनुरोध गृह मंत्रालय द्वारा गठित एक्सपर्ट कमिटी ने किया है. मामले से जुड़े मंत्रालय के अधिकारियों को ऐसा लगता है कि पोर्नोग्राफी साइटों की तरह एस्कॉर्ट सर्विस उपलब्ध करवाने वाली साइटें भी नैतिक पतन का कारण हैं.

इंटरनेट के अनैतिक प्रभाव से बचाने के लिए केंद्र सरकार ने जुलाई 2015 में 857 पोर्न साइट पर बैन की कोशिश की थी

यहां इस सवाल पर ध्यान देना ज़रूरी है कि जब अनैतिक व्यापार (निवारण ) अधिनियम, 1956 के तहत सेक्स की खरीद के मामले गैर कानूनी नहीं हैं तो फिर, सरकार एस्कॉर्ट सर्विस को क्यों बैन करना चाहती है. गौर करने वाली बात है कि इसके मुक़ाबले एस्कॉर्ट सर्विस का बाज़ार काफी सीमित है. 

सरकार का इंटरनेट की निगरानी करना और साइटों को बैन करने का फैसला बेमानी लगता है. पहला, ये इंटरनेट की आज़ादी पर हमला बोलना हुआ, और दूसरा ये फ़ैसला संविधान के आर्टिकल 21 द्वारा दिए गए व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का हनन भी करता है.

इंटरनेट के माध्यम से लोग दुनिया के सामने अपनी बात आसानी से रख सकते हैं. साथ ही, एक कमरे में बैठ कर किसी भी क्षेत्र से जुड़ी जानकारी प्राप्त करने का ये सबसे आसान और प्रभावशाली माध्यम है. अगर कोई वयस्क व्यक्ति एस्कॉर्ट सर्विस का उपयोग करना चाहता है, तो ये उसका निजी मामला है. किसी की निजता पर हमला बोलना सरकार के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता.

हज़ारों भारतीय ऐश्ले मैडिसन नाम के वेबसाइट पर रजिस्टर हैं. पिछले साल वेबसाइट के हैक होने के बाद ये डाटा सामने आया था. सिर्फ़ दिल्ली से 38,652 लोगों ने इस साइट पर ख़ुद को रजिस्टर कर रखा है. ये साइट लोगों को एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर का विकल्प देती है. 

सरकार इस साइट को भी ब्लॉक करना चाहेगी? या वो संस्कारी तौर पर विज्ञापन दिखलाने वाले डेटिंग ऐप्लिकेशन टिंडर को अपना निशाना बनाएगी? 

ये विडम्बना है कि इंटरनेट को बैन करने की सरकार की ये कोशिश, समाज पर कोई सकारात्मक प्रभाव नहीं डाल सकती, क्योंकि ये बात जगजाहिर है कि इंटरेनट सार्वजनिक संचार का सबसे मजबूत माध्यम है. सरकार ने आईटी रूल-2009 के तहत पोर्नोग्राफिक वेबसाइटों को ब्लॉक करने का आदेश दिया था. लेकिन भारी विरोध के बाद उसने इस आदेश में संशोधन कर केवल चाइल्ड पोर्न साइटों तक सीमित कर दिया. 

अभी भी इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर्स पूरी तरह से ऐसी साइटों को ब्लॉक नहीं कर पाये हैं. एक साइट ब्लॉक होती है, तो उसी पल उसी नाम से या उसके जैसे दूसरे नामों से चल रही नई साइट्स खुल जाती हैं. भारत का इस मामले में चीन से बराबरी करना बेमानी है, जहां इंटरनेट पर सरकार की निगरानी है. जितने एकतरफा और कारगर तरीके से चीन ने इंटरनेट को सेंसर किया है, भारत में वैसा होना नामुमकिन है.

इन सबके बावजूद भी, सरकार इंटरनेट को सेंसर कर लोगों को नैतिकता का पाठ पढ़ाने के अपने मंसूबे पर टिकी हुई है. सरकार लोगों के व्यवहार और अपनी इच्छा से चीजों को चयन करने के उनके अधिकार पर नियंत्रण करना चाहती है. अपनी सहयोगी पार्टियों के साथ मिलकर एनडीए की सरकार अब ये तय करना चाहती है कि हमें क्या खाना चाहिए, क्या पहनना चाहिए, किसके साथ कैसे संबंध रखने चाहिए, कौन सी किताब पढ़नी चाहिए, इंटरनेट के किस हिस्से से अपना मनोरंजन करना चाहिए और कौन सा हिस्सा नहीं देखना चाहिए आदि.

पिछले साल संस्कृति मंत्री महेश शर्मा ने लड़कियों के नाइट आउट करने को भारतीय संस्कृति के ख़िलाफ बताया था. मुंबई पुलिस का होटल के कमरों से युवाओं को गिरफ़्तार करना इसी मंसूबे का एक हिस्सा था.

ये सब करके सरकार हमें ये एहसास दिलवाना चाहती है कि हम एक अखण्ड हिन्दू भारतीय समाज का हिस्सा हैं. लेकिन वो इस बात को नजरअंदाज कर रही है कि ये सोच, प्रजातंत्र के आदर्शों के विपरीत है. हमारा संविधान अनेकता में एकता के आदर्श पर टिका हुआ है.

यूपीए सरकार ने भी कई साइटों को घटिया या विद्रोहजनक करार देते हुए ब्लॉक करने के आदेश दिए थे

हालांकि मात्र बीजेपी ही ऐसी सरकार नहीं है जो इंटरनेट सेंसरशिप के पक्ष में है. यूपीए सरकार ने भी कई साइटों को घटिया या विद्रोहजनक करार देते हुए ब्लॉक करने के आदेश दिए थे. दिसंबर 2011 में जारी किया गए गूगल ट्रांसपेरेंसी रिपोर्ट के मुताबिक सर्च इंजन को 358 चीजों को इंटरनेट से हटाने का आदेश दिया गया था, जिसमें से 255 सरकार की आलोचना से प्रेरित थे. उसी साल असीम त्रिवेदी की वेबसाइट को भी भी ब्लॉक किया गया था. असीम पर वेबसाइट के माध्यम से सरकार और सत्ता का मज़ाक बनाने का आरोप था.

पोर्नोग्राफिक साइटों और एस्कॉर्ट सर्विस को बैन करना- ये दो अलग चीजें नहीं हैं. ये इंटरनेट आज़ादी पर पाबंदी लगाने जैसा है. ये फ़ैसला दिखलाता है कि सरकार देश के युवाओं को परिपक्व नागरिक की तरह नहीं देखती, जिन्हें अपनी इच्छा से सही-गलत का चुनाव करने की छूट हो.

नैतिकता का सिद्धांत पूरी तरह से व्यक्ति का निजी मामला है. ये बेहद चिंता का विषय है कि मौजूदा सरकार इस तथ्य को नकारना चाहती है.

First published: 16 June 2016, 14:29 IST
 
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