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यमुना के नुकसान पर ऑर्ट ऑफ लिविंग की पैंतरेबाजी

जगदीप एस छोकर | Updated on: 27 April 2016, 8:06 IST
QUICK PILL
  • आर्ट ऑफ लिविंग के कार्यक्रम के दौरान यमुना के डूब क्षेत्र को हुए नुकसान के बारे में विशेषज्ञ और दस्तावेज बता चुके हैं. लेकिन इसके बावजूद आर्ट ऑफ लिविंग का यह कहना कि अगर नुकसान होता है तो उसका हर्जाना भरने में कोई आपत्ति नहीं होगी, चालाकी भरा बचाव है.
  • एनजीटी ने मामले की सुनवाई करते हुए आर्ट ऑफ लिविंग पर शुरुआती 5 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया था जिसे संस्था ने बैंक गारंटी के तौर पर देने का वादा किया था.

आर्ट ऑफ लिविंग फाउंडेशन की वकील अक्षमा नाथ ने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के सामने कहा था, 'अगर यमुना के डूब क्षेत्र में कुछ भी नुकसान होता है तो हमें उसका हर्जाना भरने में कोई आपत्ति नहीं होगी. हमने एनजीटी को बताया है कि हम इस मामले में नकद के मुकाबले बैंक गारंटी के तौर पर भुगतान करने को तैयार हैं.'

अगर कोई वकील अदालत या ट्रिब्यूनल में कुछ ऐसा बयान देता है तो उसे बेहद गंभीरता से लिया जाना चाहिए. ऊपर कही गईं दोनों बातें बेहद अहम हैं. इसलिए इन्हें बारी बारी से समझे जाने की जरूरत है ताकि इसके निहितार्थ को समझा जा सके.

बीच की स्थिति

'डूब क्षेत्र में किसी तरह का नुकसान होने की स्थिति में हमें हर्जाना भरने में कोई आपत्ति नहीं है, का क्या मतलब है?

साधारण तौर पर इसका मतलब निकाला जाए तो यह बात समझ में आती है कि अक्षमा नाथ ने अपने क्लाइंट ऑर्ट ऑफ लिविंग फाउंडेशन के लिए यह बात कही थी कि अगर कुछ नुकसान होता है तो वह हर्जाना भरने को तैयार हैं.

नाथ ने बेहद चतुराई से भविष्य में इस बात की गुंजाइश रख दी कि यमुना के डूब क्षेत्र में दरअसरल कोई नुकसान हुआ ही नहीं. 9 मार्च के एनजीटी के फैसले को देखते हुए यह कहना बेहद गुस्ताखीपूर्ण है.

9 मार्च के एनजीटी के आदेश के पैराग्राफ 7 में कहा गया, 'विशेषज्ञों और सामने आए दस्तावेजों के मुताबिक यह बात पूरी तरह से साफ हो चुकी है कि नदी के प्राकृतिक प्रवाह में छेड़छाड़ कर डूब क्षेत्र को नुकसान पहुंचाया गया. इसकी वजह से नदी के जलीय वातावरण को नुकसान हुआ और साथ ही प्रवाह क्षेत्र को भी. 13 जनवरी 2015 को मनोज मिश्रा बनाम यूनियन ऑफ इंडिया के मामले में यह बात साफ है कि वहां जल के स्रोत थे और दलदली भूमि थी जिसे अब नुकसान हुआ है. इसके अलावा उन्होंने रैंप और सड़कें बनाईं. पॉन्टून ब्रिज के साथ कई अस्थायी ढांचे बनाए गए और यह सब कुछ जल संसाधन मंत्रालय समेत अन्य विभागों की मंजूरी के बिना किया गया.'

'नदी के पर्यावरण, जैव विविधता और जलीय जीवन को हुए नुकसान की वजह से फाउंडेशन को इसे फिर से बहाल करने के लिए जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए. इस संबंध में एनजीटी एक्ट 2010 की धारा 15 और 17 के तहत हम शुरुआत में पांच करोड़ रुपये का हर्जाना लगाते हैं.' 

आर्ट ऑफ लिविंग फाउंडेशन पर एनजीटी एक्ट 2010 की धारा 15 और 17 के तहत पांच करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया गया था 

'यह रकम आयोजन के पहले फाउंडेशन को जमा कराना होगा. रेस्टोरेशन का काम कराए जाने के बाद इस रकम को आखिरी भुगतान की रकम में शामिल कर दिया जाएगा.'

'फाउंडेशन को कल तक ट्रिब्यूनल के सामने हलफनामा देना होगा कि वह दो हफ्तों के भीतर बाकी की रकम का भुगतान करेगा. यह रकम ट्रिब्यूनल तय करेगा.'

अब यह बात साफ हो चुकी है कि भुगतान करने में कोई आपत्ति नहीं होगी का कोई मतलब नहीं है क्योंकि एनजीटी ने फांडेशन को भुगतान करने का आदेश दिया.

फिर किसी को भी यह समझने में तकलीफ हो सकती है कि आखिरकार फाउंडेशन की वकील ने ट्रिब्यूनल के समक्ष ऐसा बयान क्यों दिया. मकसद साफ था ताकि बाद में यह बताया जा सके कि कोई नुकसान हुआ ही नहीं. इसलिए किसी तरह का भुगतान करने में उन्हें आपत्ति होगी.

कमाल का तर्क

दूसरा वाक्य, 'हमने अभी एनजीटी को सूचित किया है कि हम नकद के मुकाबले बैंक गारंटी के तौर पर भुगतान करना चाहते हैं.' कमर्शियल वर्ल्ड में इसे अब तक का बेहतरीन इनोवेशन माना जाना चाहिए. इनोवेशन मतलब भुगतान का नायाब तरीका.

अभी तक इस तरह के मामलों में नकद या चेक के तौर पर भुगतान होता रहा है. लेकिन ऑट ऑफ लिविंग फाउंडेशन ने नया तरीका निकालते हुए बैंक गारंटी के तौर पर भुगतान की बात की.

एनजीटी ने कार्यक्रम की शुरुआत से पहले ऑर्ट ऑफ लिविंग को पांच करोड़ रुपये की रकम जमा कराने का आदेश दिया था

बैंक गारंटी बैंक की तरफ से दी जाती है. गारंटी का मतलब, लिखित में भुगतान की गारंटी से है.

आश्वासन दूसरे की तरफ से दिया गया दायित्व है जिसे पूरा किया जाना होता है. या फिर वैसा कुछ जिसे सिक्योरिटी या गारंटी के तौर पर दिया जाता है.

साफ शब्दों में समझा जाए तो इसका मतलब होता है कि बैंक गारंटी वैसी गारंटी होती है जिसे पूरा करने का आश्वासन दिया जाता है लेकिन इस मामले में गारंटी भुगतान का जरिया हो गया.

चूंकि 5 करोड़ रुपये के जुर्माने की रकम शुरुआती हर्जाना था और इस रकम को आखिरी भुगतान की रकम में व्यवस्थित किया जाना था. यह रकम रिस्टोरेशन का काम पूरा होने के बाद तय किया जाता. अब ऐसा लग रहा है कि यह रकम बैंक गारंटी से ही ली जाएगी.

अब बैंक गारंटी की रकम रिस्टोरेशन का काम पूरा होने के बाद कम होगी और इसका एक हिस्सा यह काम करने वाली एजेंसी को दिया जाएगा और फिर वही रकम मजदूरों और सप्लायर्स को दी जाएगी, देखा जाना बाकी है. तब तक हम ऑर्ट ऑफ लिविंग फाउंडेशन के नए भुगतान के तरीकों के बारे सोच ही सकते हैं.

(यह लेखक के निजी विचार हैं. संस्थान का इनसे सहमत होना जरूरी नहीं है)

First published: 27 April 2016, 8:06 IST
 
जगदीप एस छोकर @CatchNews

Jagdeep S. Chhokar is a former professor, Dean, and Director In-charge at IIM, Ahmedabad. Views are personal.

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