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माल्या की कारगुजारी से आखिरकार मिली मनमोहन को राहत

कैच ब्यूरो | Updated on: 23 May 2016, 7:28 IST
QUICK PILL
  • पीलीभीत के किसान मनमोहन के खाते को बैंक ऑफ बड़ौदा ने इसलिए सीज कर दिया था, क्योंकि उनका नाम विजय माल्या के साथ किंगफिशर एयरलाइंस के ‘‘डायरेक्टर और गारंटर’’ के रूप में दर्ज था.
  • जबकि मनमोहन अपने जीवन में न तो कभी माल्या से मिले थे और न ही उन्हें देखा था, इसके बावजूद वह कागजों पर माल्या की एयरलाइन में डायरेक्टर थे
  • पीलीभीत के छोटे से किसान मनमोहन सिंह अब चैन की सांस ले सकते हैं. बैंक ऑफ बड़ौदा में खुला हुआ उनका खाता बीते वर्ष सीज कर दिया गया था. वजह बेहद दिलचस्प थी. बैंक के रिकार्ड के अनुसार उनका नाम विजय माल्या की किंगफिशर एयरलाइंस के ‘‘डायरेक्टर और गारंटर’’ के रूप में ऋण हासिल करने वाले के व्यक्ति के रूप में दर्ज थी.

    अब वे चैन की सांस इसलिये ले सकते हैं क्योंकि उनका यह खाता अब दोबारा से चालू कर दिया गया है.

    पीलीभीत में बैंक की नंद शाखा के प्रबंधक मांगे राम ने बताया कि उनके खातों को ‘‘दोबारा चालू करने के आदेश’’ शुक्रवार की शाम को ही प्राप्त हुए हैं.

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    मनमोहन सिंह के बेटे अरविंदर सिंह ने बताया कि उनके पिता सहित परिवार के तमाम सदस्य इस आदेश के आने के बाद काफी राहत महसूस कर रहे हैं.

    प्रबंधक मांगे राम ने बताया कि मनमोहन के खाते को सीज करने का आदेश बीते वर्ष दिसंबर के महीने में बैक की मुंबई स्थित नरीमन पाॅइंट शाखा से आया था क्योंकि उनका नाम विजय माल्या और उनके बेटे सिद्धार्थ माल्या के साथ किंगफिशर एयरलाइंस के ‘‘डायरेक्टर और गारंटर’’ के रूप में दर्ज था.

    फरवरी 2013 में केंद्र सरकार ने किंगफिशर एयरलाइंस के घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उड़ान भरने पर पाबंदी लगा दी थी. कंपनी के ‘‘दिवालिया’’ घोषित होने के बाद आयकर विभाग ने उसके खातों को भी फ्रीज कर दिया था.

    मनमोहन के बैंक में खुले दो खातों में क्रमशः 4000 और 1217 रुपए थे. मनमोहन को बाकी सब चीजों से अधिक इस बात की चिंता खाए जा रही थी कि वे इस ऋण को चुकता कैसे करेंगे या फिर उनसे यह ऋण कैसे वसूला जा सकता है.

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    मनमोहन, जिन्होंने अपने जीवन में कभी न तो माल्या से मिले न कभी उन्हें देखा था. लिहाजा उन्हें यह भी कैसे पता हो सकता था कि अच्छे दिनों के राजा ने यह ऋण अपनी एयरलाइन के लिये लिया था.

    मनमोहन को तो माल्या के एयरलाइन के बारे में भी कुछ पता नहीं है, जिसके वे कागजों में डायरेक्टर थे.

    बैंक प्रबंधक को जैसे ही मुंबई से इस बारे में आदेश मिले उन्होंने तुरंत ही मनमोहन को इसकी जानकारी देते हुए उनसे संपर्क साधा.

    जब बैंक प्रबंधन मांगे राम से इस बारे में पूछा गया कि उन्होंने मनमोहन की आर्थिक स्थित और वास्तविकता के बारे में बैंक के मुंबई कार्यालय को अवगत करवाया तो उनका कहना था कि उन्होंने उनके खातों के विवरण की जानकारी भेज दी थी.

    हालांकि इतना होने के बावजूद भी बेचारे मनमोहन पांच महीने तक बैंक के अगले कदम का इंतजार करते रहे.

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    अरविंदर कहते हैं, ‘‘चिंता के अलावा हमें काफी वित्तीय नुकसान से भी दो चार होना पड़ा क्योंकि इसकी वजह से हमें मजबूर होकर अपनी गेहूं की फसल बहुत कम दामों पर निजी विक्रेताओं को बेचनी पड़ी.’’

    निजी विक्रेताओं की तुलना में सरकार किसानों की फसल के अच्छे दाम चुकाती है लेकिन अपने बैंक खाते के फ्रीज होने के चलते मनमोहन उस समय न्यूनतम समर्थन मूल्य का फायदा उठाने में असमर्थ थे.

    सरकार के साथ होने वाली प्रत्येक खरीद-फरोख्त में हर भुगतान को सीधे बैंक खाते में स्थानांतरित किया जाता है.

    अरविंदर कहते हैं, ‘‘मेरे पिता के बैंक खातों के फ्रीज होने के चलते हम सरकार द्वारा तय किये गए न्यूनतम समर्थन मूल्य पर अपनी गेहूं की फसल नहीं बेच पाए.’’

    First published: 23 May 2016, 7:28 IST
     
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