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शराबबंदी बिगाड़ रहा बिहारी सियासत का समीकरण

कैच ब्यूरो | Updated on: 7 September 2016, 8:13 IST

बिहार में बाढ़ का पानी उतरने लगा है. बाढ़ पर बिहार सरकार की किरकिरी नहीं हो सकी, क्योंकि बाढ़ शुरू होते ही नीतीश कुमार ने फरक्का बैराज के मामले को उठाकर, गंगाजल में बिहार के साथ होनेवाले अन्याय की बात को पीएम तक पहुंचाकर पूरी बातचीत का रुख दूसरी ओर मोड़ दिया था.

बहस उसी में फंसी रह गयी थी. बाढ़ का पानी उतरने के बाद राहत शिविरों में चलाये जा रहे अभियान पर विपक्ष को टिका-टिप्पणी करने का मौका मिलनेवाला था तो भाजपा के ही नेता शत्रुघ्न सिन्हा ने बाढ़ पर नीतीश कुमार के कामकाज की तारीफ कर रुख को एक और मोड़ देने की कोशिश की लेकिन सत्ताधारी गंठबंधन में शामिल और शत्रुघ्न सिन्हा की तरह ही बयानों के लिए मशहूर राजद नेता व पूर्व केंद्रीय मंत्री रघुवंश प्रसाद सिंह ने बाढ़ राहत शिविरों में हुए इंतजाम के लिए नीतीश सरकार को चिट्ठी के जरिये नसीहतों की घुट्टी पिलाकर और उस चिट्ठी को सार्वजनिक कर सरकार की किरकिरी कर दी है.

बिहार में इन दिनों रोजाना ऐसा ही कुछ न कुछ चल रहा है. कभी कोई किसी को शह दे रहा है, कभी कोई किसी को मात. हालिया दिनों में कई ऐसी बातें बिहार में हुई है. नीतीश कुमार एक-एक कर सभी बाधाओं को पार करने की कोशिश में हैं और पार भी पा रहे हैं.

इस बार जब रघुवंश प्रसाद ने बाढ़ राहत शिविर में हो रहे बदइंतजामी पर सार्वजनिक तौर पर नीतीश कुमार को फिर से फंसाने की कोशिश की है. यह कोई बड़ी फंसान नहीं है. जिस तरह से भाजपा के लोग जानते हैं कि रह-रहकर शत्रुघ्न सिन्हा अपने ही दल के खिलाफ या नीतीश के पक्ष में बोलते हैं तो क्यों बोलते हैं और किसके कहने से बोलते हैं.

उसी तरह नीतीश कुमार भी जानते हैं कि रह-रहकर रघुवंश प्रसाद अपनी ही सरकार के खिलाफ बोलते हैं तो क्यों बोलते हैं और किसके कहने से बोलते हैं. नीतीश आसानी से इन सभी चुनौतियों से पार भी पा लेंगे. बस एक फंसान उनके गले में हड्डी बनकर फंसी है, जिसे न उगलते बन रहा है और न निगलते और वह शराबबंदी का कानून.

जो शराब से मरे उन्हें मुआवजा दिया गया, जो पीड़ित हुए उन्हें लेकर पेंच फंसा कि क्या किया जाए

हर शोर के बीच शराबबंदी का कानून आने के बाद बिहार के चौक-चौराहे और चौपालों में बातचीत का सबसे गर्म मुद्दा शराबबंदी कानून ही है. इसकी वजह भी है. गोपालगंज हादसा तो अभी बहुत बाद में हुआ, जिसमें 19 लोग जहरीली शराब पीने से मरे. सरकार ने पहले उसे जहरीली शराब पीने से हुई मौत मानने से मना कर दिया था.

फिर जब साबित हुआ तो आनन फानन में एक थाने के सभी 25 पुलिसकर्मियों को सस्पेंड कर दिया गया. जो शराब से मरे उन्हें मुआवजा दिया गया, जो पीड़ित हुए उन्हें लेकर पेंच फंसा कि क्या किया जाए. इंसानियत कहने लगी कि इन्हें भी मदद चाहिए, कुछ लोगों ने कहा कि इंसानियत क्योंकर बीच में लाना, गुनाहगार हैं तो इन्हें सजा मिले.

गोपालगंज कांड ने शराबबंदी कानून के पेंच को फंसाया. इस बीच दूसरी ओर शराबबंदी को लेकर कई खबरें एक-दूसरे से टकराती भी रहीं. एक खबर यह निकली कि बिहार में शराबबंदी होने के बाद होम्योपैथी दवाएं महंगी हो गयी है और उसकी किल्लहत होने लगी है. दूसरी खबर यह निकली कि बिहार के पर्यटन उद्योग का कमर तोड़ना शुरू कर दिया है.

पर्यटन निदेशालय के एक अधिकारी का कहना है कि 2013 में बोधगया ब्लास्ट के बाद अचानक पर्यटन उद्योग को झटका लगा था लेकिन शराबबंदी ने पर्यटकों पर इतना प्रतिकूल असर डाला है कि उसकी भरपाई मुश्किल होगी. बोधगया ब्लास्ट के बाद जब पर्यटक बिहार आने से डरे थे तो भी एक साल में करीब तीन लाख पर्यटकों के आवाजाजी में कमी आई थी.

लेकिन शराबबंदी कानून ने दो माह में ही करीब 21 लाख पर्यटकों की संख्या में कमी कर दी है. पर्यटन का मामला तो अलग है, बिहार में चर्चा इस बात की भी खूब है कि पिछले चार माह में राज्य में 13,839 लोगों की गिरफ्तारी शराबबंदी कानून तोड़ने को लेकर हुई है और यह देश में एक रिकार्ड की तरह है कि किसी अपराध में इतने कम समय में इतने लागों की गिरफ्तारी हुई है.

हमारे यहां तो शराब अब भी उसी तरह से उपलब्ध है, बस जो पीनेवाले हैं वे अपने घर में कम पैसा खर्च करते हैं

शराबबंदी बाहरी दुनिया में इस पर जो बात हो रही है, रोज नये किस्से सामने आ रहे हैं. मजा लेने के लिए रोज किस्से गढ़े जा रहे हैं और हकीकत यह है कि अब भी शराब पीनेवाले किसी न किसी तरह से सीमापार से शराब का जुगाड़ कर ही ले रहे हैं.

फर्क यह हुआ है कि कीमत दस गुना महंगी हो गयी. बक्सर के पुरैनी गांव में मिले प्रेमप्रकाश कहते हैं कि हमारे यहां तो शराब अब भी उसी तरह से उपलब्ध है, बस जो पीनेवाले हैं वे अपने घर में कम पैसा खर्च करते हैं, ज्यादा पैसा शराब पर लगा दे रहे हैं. प्रेम प्रकाश कहते हैं कि नीतीश कुमार का मैं प्रशंसक हूं लेकिन मुझे यह समझ में नहीं आ रहा कि इस बार की सरकार में वे इतने अतिवादी क्यों हो गये हैं?

आज तक बिहार में कट्टा-पिस्तौल रखना तो बंद नहीं हो सका तो शराब क्या खाक बंद होगा. शराब बंद हो न हो, यह तो अलग बात है, सबसे चिंतनीय बात यह है कि किसी के घर में शराब मिलने पर पूरे परिवार को परेशान करनेवाली बात समझ से परे है.

प्रेमप्रकाश सवाल उठाते हैं कि बिहार में आप देखिए तो सबकुछ पता चल जाएगा. रोज रेल में छापेमारी हो रही है, पुलिस सबका मुंह सूंघते चल रही है लेकिन क्या कभी किसी बड़े लोगों को परेशान करते हुए देखे हैं? वे कहते हैं कि सबसे प्रहसन की बात तो यह है कि नीतीश कुमार सभी जगह यह एलान करते चल रहे हैं कि केंद्र सरकार को चाहिए कि जहां-जहां भाजपा की सरकार है, वहां शराबबंदी लागू करे.

यह तो अजीब बात कर रहे हैं नीतीश कुमार. क्या यूपी में समाजवादी सरकार है या कि पास के बंगाल में ममता बनर्जी की सरकार है तो वहां शराबबंदी न हो और अकेले भाजपा की सरकार होने की वजह से झारखंड में शराब बंद हो जाए तो बिहार में सीमा पार से शराब आना बंद हो जाएगा!

अब तक 14 हजार के करीब लोग इस कानून के तहत गिरफ्तार किये जा चुके हैं

शराबबंदी को लेकर यह सब तो फिर भी एक सामान्य बात है, जिस पर रोज ही कहानियां सामने आ रही हैं और लोग सुन-सुना रहे हैं. लेकिन इन किस्सों और शिकायतों की दुनिया से अलग चले तो बिहार में शराबबंदी कानून सियासत के समीकरण को भी गड़बड़ाने की राह चलने लगा है. भाजपा नेता सुशील मोदी कहते हैं कि नीतीश कुमार की सरकार शराबबंदी में पूरी तरह से विफल रही है. अब तक 14 हजार के करीब लोग इस कानून के तहत गिरफ्तार किये जा चुके हैं लेकिन दूसरी ओर रोज कहीं न कहीं से शराब पकड़ा जा रहा है, इसका मतलब यह हुआ कि शराब अभी बंद नहीं हुआ है.

सुशील मोदी और भी ढेरों बात कहते हैं. वे विपक्ष के नेता हैं, उनका काम है कहना. उनकी बातों को अगर परे भी कर दे तो शराबबंदी कानून को लेकर नीतीश कुमार अपने ही सहयोगियों से घिरते नजर आ रहे हैं. गोपालगंज कांड के बाद जिस तरह से रघुवंश प्रसाद सिंह ने नीतीश सरकार पर करारा प्रहार किया, सियासी गलियारे में महज उसे रघुवंश प्रसाद के बयान के रूप में नहीं देखा जा रहा. यह माना जा रहा है कि यह सब वे लालू प्रसाद की सहमति से कह रहे हैं. रघुवंश प्रसाद सिंह कहते हैं कि हमने तो कहा ही है और क्या गलत कहा है कि गोपालगंज में जो कांड हुआ, वह बिहार सरकार की नयी शराबबंदी नीति के कारण हुआ.

उनके मुताबिक यह कानून अनाप-शनाप है. नीतीश कुमार के इस कानून के फैसले में उनके ही विधायक नहीं हैं, वे दूसरों को क्या समझायेंगे-बतायेंगे. रघुवंश प्रसाद सिंह ने यह सब बातें उस गोपालगंज कांड के बाद कही, जो गोपालगंज लालू प्रसाद यादव का इलाका है. लालू प्रसाद यादव का गांव फुलवरिया उसी गोपालगंज में पड़ता है. लालू प्रसाद ने भी गोपालगंज कांड के बाद ज्यादा तो नहीं लेकिन थोड़ा इशारे में यह बोला कि इतना सख्त कानून ठीक नहीं. हालांकि लालू प्रसाद यादव अब भी शराबबंदी पर बोलने से बच रहे हैं और एक तरीके से मौन मुद्रा में हैं.

बताया जा रहा है कि पहले आंशिक शराबबंदी के बाद जिस दिन नीतीश कुमार ने पूर्ण शराबबंदी वाला फैसला लिया, उस दिन कैबिनेट में उप मुख्यमंत्री और लालू प्रसाद के बेटे तेजस्वी यादव भी मौजूद नहीं थे. इसे लेकर लालू प्रसाद यादव में नाराजगी है. जो लालू प्रसाद यादव को जानते हैं वे यह मानकर चल रहे हैं कि लालू प्रसाद यादव रणनीतिक तौर पर चुप्पी साधे हुए हैं ताकि वे जिस दिन इस पर बोले तो फिर सरकार पूरी तरह से बैकफुट पर आ जाये.

चूंकि लालू प्रसाद यादव नहीं बोल रहे तो राजद के भी बड़े नेता इस पर बोलने से बच रहे हैं. वरिष्ठ पत्रकार राघवेंद्र कहते हैं कि शराबबंदी को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर छा जाने की हसरत रखनेवाले नीतीश कुमार भविष्य में इस अभियान के कारण राष्ट्रीय स्तर पर छा जायेंगे या नहीं, यह तो कोई नहीं कह सकता लेकिन बिहार में यह आहट मिलने लगी है कि वे इस मसले पर अपनों से ही घिरेंगे और जब घिरेेंगे तो फिर उस चक्रव्यूह को तोड़ना उतना आसान नहीं होगा.

First published: 7 September 2016, 8:13 IST
 
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