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सामाजिक एकता मंच बस्तर पुलिस का मुखौटा

सुहास मुंशी | Updated on: 7 April 2016, 21:24 IST
QUICK PILL
  • मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और पत्रकारों पर बस्तर पुलिस की क्रूरता किसी से छिपी नहीं है. इसके साथ ही उनकी रणनीति भी किसी से छिपी नहीं है, जिसके तहत वह सार्वजनिक मोर्चा बनाकर अपने खिलाफ उठने वाली आलोचनाओं को बंद कर देते हैं.
  • यहां एक नया सलवा जूडम खड़ा हो गया है, सामाजिक एकता मंच. इसी गुट पर पत्रकार मालिनी सुब्रमण्यम पर हमला करने और उन्हें छत्तीसगढ़ से बाहर जाने के लिए मजबूर करने का आरोप है.
  • सामाजिक एकता मंच ने हाल ही में यही काम बेला भाटिया के साथ करने की कोशिश की और एक स्थानीय पत्रकार को गिरफ्तार कराने में अहम भूमिका निभाई.

मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और पत्रकारों पर बस्तर पुलिस की क्रूरता किसी से छिपी नहीं है. इसके साथ ही उनकी रणनीति भी किसी से छिपी नहीं है जिसके तहत वह सार्वजनिक मोर्चा बनाकर अपने खिलाफ उठने वाली आलोचनाओं को बंद कर देते हैं.

लेकिन आप किसी पुलिस वाले को इस बारे में बात करते हुए नहीं सुन सकते. ऐसे में बस्तर के एक बड़े पुलिस अधिकारी ने जब इस बारे में बात की तो इस रिपोर्टर ने उस बातचीत को रिकॉर्ड कर लिया.

अधिकारी सामाजिक एकता मंच के बारे में बात कर रहा था. इस समूह पर पत्रकार मालिनी सुब्रमण्यम के खिलाफ मोर्चा खोलने और उन्हें छत्तीसगढ़ से बाहर जाने के लिए मजबूर करने का आरोप है. 

मंच ने हाल ही में यही काम बेला भाटिया के साथ करने की कोशिश की और एक स्थानीय पत्रकार को गिरफ्तार कराने में अहम भूमिका निभाई.

बस्तर में सामाजिक एकता मंच को मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के खिलाफ काम करने वाली संस्था के तौर पर देखा जाता है

अधिकारी ने सामाजिक एकता मंच को नक्सलियों के खिलाफ राज्य की गुरिल्ला युद्धनीति करार दिया. इसे इसलिए बनाया गया ताकि पुलिस इसकी आड़ लेकर मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और पत्रकारों के खिलाफ कार्रवाई कर सके और उसे कानूनी अड़चनों का सामना भी नहीं करना पड़े.

अधिकारी ने बताया कि मंच को ज्यादा लंबे समय तक काम करने की अनुमति नहीं होगी क्योंकि पिछली बार ऐसा ही मंच यानी सलवा जुडूम बनाया गया था तब इसके नेता महेंद्र कर्मा ने अपनी राजनीतिक पहुंच बेहद मजबूत कर ली थी. इसलिए इस बार ऐसा कुछ करने का जोखिम नहीं उठाया जाएगा और सामाजिक एकता मंच को दो से तीन सालों के भीतर ही खत्म कर दिया जाएगा. उसके बाद ऐसा ही कोई और मंच बनाया जाएगा. 

छद्म लड़ाई

समाजिक एकता मंच की स्थापना कांग्रेस के स्थानीय नेता संपत झा, सुब्बा राव और बीजेपी नेता मनीष पारेख ने सलवा जुडूम के पूर्व सदस्य पी विजय के साथ मिलकर की थी. 

सामाजिक एकता मंच से जुड़े अहम नेता फारुक अली हैं जो सादिक अली के भाई हैं. अली सलवा जुडूम के संस्थापक महेंद्र कर्मा के करीबी सहयोगी रहे हैं.

पुलिस अधिकारी से बातचीत का ऑडियो

एक स्थानयी पत्रकार ने नाम नहीं छापे जाने की शर्त पर बताया कि सलवा जूडम के अधिकांश सदस्यों को अपना राजनीतिक करियर चमकाने का मौका नहीं मिला.

सामाजिक एकता मंच की स्थापना में भाजपा से लेकर कांग्रेस तक के नेता शामिल रहे हैं

पत्रकार ने कहा, 'उनका राजनीतिक करियर ठीक ठाक रहा और अब वह पुलिस की मदद से सलवा जुडूम की तरह आंदोलन खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं. सलवा जुडूम के संस्थापक महेंद्र कर्मा बहुत बड़ी राजनीतिक हस्ती बनने में सफल रहे थे. यह सभी पूरी तरह से सिस्टम के रहमोकरम पर चलने वाले लोग हैं. आपको क्या लगता है कि उन्हें पैसा कहां से मिलता है? आपको यह जानकर आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि मंच के कार्यकर्ताओं और उनके परिजनों को सरकार से ठेके आदि मिल जाए.'

एक अन्य पत्रकार ने इस पूरे आंदोलन को झूठा करार दिया. उन्होंने कहा, 'उनकी तीन शाखाएं हैं. मुख्य संगठन सामाजिक एकता मंच, महिला एकता मंच और आदिवासी एकता मंच है. क्या इस महिला मंच ने कभी महिलाओं के अधिकार के लिए बोला है? यह सब दिखावा है. क्या आदिवासी मंच ने कभी आदिवासियों के बीच मौजूद कुपोषण के बारे में कुछ बोला है? यह भी महज दिखावा है. यहां सब को पता है कि उन्हें कौन समर्थन दे रहा है. कोई उनकी मंशा के बारे में सवाल नहीं उठा रहा है.'

सामाजिक एकता मंच के लोगों की आईजी एसआरपी कल्लूरी तक सीधी पहुंच है. कल्लूरी पर कई तरह के आरोप हैं. वास्तव में कल्लूरी और बस्तर के अन्य पुलिस अधिकारी लगातार सामाजिक एकता मंच के कार्यक्रमों में भाग लेते हैं.

लेकिन मंच के संस्थापक संपत झा का कहना है कि यह आंदोलन गैर राजनीतिक है. उन्हें सामाजिक एकता मंच की स्थापना में पुलिस की भूमिका की बात हास्यास्पद लगती है. 

झा पूछते हैं, 'हमारा आंदोलन नक्सलवाद के खिलाफ है. आप मुझे यह कह रहे हैं कि समाज के कई लोगों ने किसी लालच में इस आंदोलन का साथ दिया?'

संगठन को राज्य से मदद मिलने की अफवाह के पीछे का कारण इस समूह का पुलिस के साथ करीबी संबंध होना हो सकता है. झा ने कहा, 'अगर हम पुलिस की मदद करते हैं और उनके काम की तारीफ करते हैं तो इसमें क्या गलत है? आपको एक बात समझ में आनी चाहिए कि इस क्षेत्र में आप या तो नक्सल के साथ हैं या उनके खिलाफ हैं.'

First published: 7 April 2016, 21:24 IST
 
सुहास मुंशी @suhasmunshi

He hasn't been to journalism school, as evident by his refusal to end articles with 'ENDS' or 'EOM'. Principal correspondent at Catch, Suhas studied engineering and wrote code for a living before moving to writing mystery-shrouded-pall-of-gloom crime stories. On being accepted as an intern at Livemint in 2010, he etched PRESS onto his scooter. Some more bylines followed in Hindustan Times, Times of India and Mail Today.

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