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बीडी शर्माः बस्तर का हीरो जिसे लगता था 'विकास' नहीं रुका तो क्रांति होगी

आकाश बिष्ट | Updated on: 10 February 2017, 1:47 IST
QUICK PILL

ब्रह्म देव शर्मा नहीं रहे. उनके साथ ही भारत ने आदिवासी अधिकारों के लिए लड़ने वाला एक योद्धा खो दिया. लोगों में 'बीडी' नाम से मशहूर शर्मा का रविवार को ग्वालियर में 86 वर्ष की उम्र में निधन हो गया.

गणित में पीएचडी शर्मा 1956 बैच के आईएएस अफ़सर थे. वो अविभाजित मध्य प्रदेश में बस्तर के पहले जिला कलेक्टर बनाए गए थे. उसके बाद उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी आदिवासियों को उनके वाजिब अधिकार दिलाने में लगा दिया.

वो चाहते थे कि अपनी ज़मीनों से बेदखल किए जा रहे आदिवासी 'विकास' की मौजूदा अवधारणा का विरोध करें. वो चाहते थे कि आदिवासी, किसान, मजदूर और दूसरे हाशिये के लोग एकजुट होकर राज्य की नीतियों की मुखालफत करें क्योंकि राज्य उनके संविधान प्रदत्त अधिकारों का भी सम्मान नहीं कर रहा है.

उनका मानना था कि आदिवासियों के संवैधानिक अधिकारों का घोर उल्लंघन हुआ है. ऐसे में अपने जल, जंगल और ज़मीन की खातिर आदिवासियों द्वारा हथियार उठा लेना बड़ी बात नहीं है.

यादगार भेंट

साल 2012 की गर्मियों में निज़ामुद्दीन रेलवे स्टेशन के पास स्थित एक मामूली तीन कमरे के घर में उनसे हुई मुलाकात मुझे आज भी याद है.

पहली बार उनका घर खोजने में मुझे काफी मुश्किल हुई. उनके लैंडलाइन पर फ़ोन करके मैंने रास्ता बताने का अनुरोध किया.

थोड़ी देर बाद 80 साल से अधिक उम्र के एक बुजुर्ग सफ़ेद पायजामा कुर्ता में एक गली से बाहर निकले. उन्होंने मेरे पास आकर पीछे आने के लिए कहा.

गली में पानी लगा था. लोगों के आने जाने के लिए ईंटें रखी हुई थीं. शर्मा बहुत सहजता पर उनसे होते हुए आगे बढ़ते जा रहे थे.

बस्तर में बीडी शर्मा की हीरो जैसी छवि बन गई लेकिन खदान माफिया उनका दुश्मन बन गया. उनपर कई बार जानलेवा हमले हुए

उनके आसपास के घरों में प्रवासी मजदूर रहते थे. उनका कमरा किताबों से भरा था. कमरे में कोई सीलिंग फ़ैन नहीं था जिसके कारण मैं असहज था.

गर्मी से बेअसर शर्मा आराम से गरमा-गरम चाय पी रहे थे. उन्होंने मुझसे भी यह कहते हुए चाय पूछी कि आपको शायद थोड़ी मीठी लगे.

मुझे किसी ने बताया था कि नोएडा में उनके बेटे का घर है लेकिन वो वहां बहुत कम रुकते हैं. उन्हें निजामुद्दीन का शोरगुल पसंद है.

मेरे पास सवालों की लंबी लिस्ट थी जिन्हें मैंने धड़ाधड़ पूछना शुरू कर दिया. मुझे रोकते हुए वो बहुत नरमी से बोले, "मुझे लगता है कि आपको कोई जल्दी नहीं है क्योंकि मुझे तो किसी तरह की जल्दी नहीं."

बस्तर के हीरो

इस बातचीत से पहले शर्मा हाल ही में छत्तीसगढ़ से लौटे थे. वो वहां बस्तर के तत्कालिन कलेक्टर पॉल एलेक्स मेमन को माओवादियों से छुड़ाने गये थे. मध्यस्थ की भूमिका के लिए उनका नाम खुद माओवादियों ने सुझाया था. वो पहले भी ऐसी भूमिका निभा चुके थे.

हमने बहुत सारे मुद्दों पर बातचीत की. मुझे जल्द महसूस हो गया कि बस्तर उनके दिल के सबसे करीब है. बस्तर के पहले कलेक्टर के तौर पर उन्होंने तब कार्यभार संभाला था जब बस्तर के 20वें राजा प्रवीर चंद्र पुलिस के हाथों मारे गये थे. उनपर आदिवासी विद्रोह का नेतृत्व करने का आरोप था.

बीडी शर्मा सवाल उठाने पर मजबूर हुए कि पहले से हाशिए पर पड़े आदिवासियों को और क्यों दबाया जा रहा है?

जन आक्रोश को भांपते हुए शर्मा ने कुछ बड़े फ़ैसले किए थे. उन्होंने भूमिहीनों को जमीन दी, खदानों के ठेके रद्द कर दिए और सभी विदेशी कंपनियों को इलाके से बाहर कर दिया. उनके इन निर्णयों के कारण बस्तर में उनकी हीरो जैसी छवि बन गयी. लेकिन खदान माफिया उनकी जान का दुश्मन बन गया. उन पर कई जानलेवा हमले हुए लेकिन वो बचते रहे.

बाद में उन्हें मध्य प्रदेश सरकार में आदिवासी मामलों का सचिव बनाया गया. वो शिलॉन्ग स्थित नार्थ-ईस्टर्न हिल यूनिवर्सिटी(एनईएचयू) के वाइस-चांसलर भी रहे. उनके पहले के वाइस-चांसलर की गोली मारकर हत्या कर दी गयी थी इसलिए कोई यह पद लेने को तैयार नहीं था. ऐसे समय में शर्मा आगे आए थे.

जब उन्हें एससी/एसटी कमिश्नर बनाया गया तो उन्होंने एक रुपये की तनख्वाह पर काम किया.

उनके बस्तर से जाने के बाद वहां के हालात काफी बिगड़ गये जिससे शर्मा कुछ सवाल उठाने पर मजबूर हुए, मसलन आदिवासी इलाकों में विदेशी कंपनियां क्या कर रही हैं? हर चीज को बिकाऊ क्यों बनाया जा रहा है? पहले से हाशिए पर पड़े आदिवासियों को और हाशिए पर क्यों धकेला जा रहा है? और आदिवासियों के पास सशस्त्र विद्रोह से जुड़ने के अलावा क्या विकल्प है?

वो चाहते थे कि माओवादी जंगलों से बाहर निकलें और शहरों में अपना आधार बनाएं. वो कहते थे कि उन्हें किसानों और असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को जोड़कर बदलाव लाना चाहिए.

राज्य बनाम समाज

हमारी बातचीत के दौरान उन्होंने एक सवाल कई बार कहा, "पहले क्या आया, राज्य या समाज? राज्य बनने से बहुत पहले से समाज हैं. इसलिए राज्य को पूरी सत्ता सौंप देने का विचार जन-विरोधी है."

उनके अनुसार औद्योगीकरण से किसान बेहाल हो जाएंगे. इससे किसान और हाशिए पर चले जाएंगे और राज्य के खिलाफ हथियार उठाने को मजबूर होंगे.

उन्होंने कहा, "आजादी के समय जीडीपी में खेती का योगदान 67 प्रतिशत था लेकिन अब ये घटकर 14 प्रतिशत हो गया है. साल 2020 तक इसके छह प्रतिशत हो जाने का अनुमान है. ऐसे में आप किसानों और उनके परिवार से क्या उम्मीद करते हैं? समतावादी प्रतिमानों की पूरी तरह अनदेखी की जा रही है. समाज के 10 प्रतिशत लोगों के पास सारे संसाधन हैं. अगर आप इसे बदलेंगे नहीं तो क्रांति जरूर होगी."

उसके बाद भी मैंने उनसे मिलने की कोशिश की लेकिन उनके परिवारवालों ने सेहत का हवाला देकर मुझे रोक दिया. हालांकि हमने फ़ोन पर बात की. वो आखिर तक ये कहते रहे कि बदलाव बहुत जल्द होने वाला है. भारत की मौजूदा सरकार के 'विकास' से प्यार को देखते हुए लगता है कि शर्मा की भविष्यवाणी सच भी हो सकती है.

First published: 9 December 2015, 6:50 IST
 
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