Home » इंडिया » Bastar scribe Santosh Yadav is finally out of jail, but journalism has to wait
 

जेल से बाहर आए बस्तर के पत्रकार संतोष यादव ने कहा, 'मैं जल्द ही पत्रकारिता दोबारा शुरू करूंगा'

महताब आलम | Updated on: 19 April 2017, 13:13 IST


बस्तर के पत्रकार संतोष यादव अभी भी सदमें में हैं. फिर से पत्रकारिता शुरू करने के पहले वे कुछ आराम करना चाहते हैं. या यूं कहिए कि कुछ वक़्त चाहते हैं. संतोष ने कैच से बातचीत में कहा कि मैं निश्चित रूप से और गम्भीरता से फिर से पत्रकारिता के पेशे में लौटना चाहता हूं. वास्तव में, मैं इसे और ज्यादा पेशेवर तरीके से करना चाहता हूं जितना पहले किया है. लेकिन इसके लिए मुझे कुछ वक़्त की ज़रूरत है. मुझे अभी यह देखना है कि जेल में रहने के दौरान मेरे व मेरे परिवार के साथ क्या कुछ घटित हुआ.

मेरे ऊपर अभी भी केस चल रहा है और मुझे लड़ना है. बिना एक क्षण गंवाए यादव आगे कहते हैं कि मैं जल्द ही पत्रकारिता में लौट आऊंगा. हालांकि, इस तथ्य के बावजूद उनके परिवार के लोगों और मित्रों ने उन्हें सलाह दी है कि वे कोई दूसरा काम कर लें या फिर कोई कारोबार कर लें.

यादव को उनके गांव दरभा से सितम्बर 2015 में छत्तीसगढ़ पुलिस ने गिरफ्तार किया था. उन पर माओवादी समर्थक होने का आरोप लगा था. उन पर भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं समेत कई कानूनों के तहत मुकदमा दर्ज किया गया था. इसमें अव्यवस्था फैलाने, आपराधिक षडयंत्र और आपराधिक धमकी देने जैसे मामले थे. उन पर अन्य आरोपों के अलावा प्रतिबंधित कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (माओवादी) से भी सम्बंध रखने का आरोप लगाया गया था.


उन्हें इसी साल 26 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिली है. हालांकि, वह लगभग दो हफ्ते बाद ही जेल से बाहर आ सके. 10 मार्च को. क्योंकि उन्हें जेल से बाहर आने के लिए ज़मानतदारों की व्यवस्था करनी थी. उनके पहले बस्तर के एक अन्य पत्रकार सुमारो नाग को जुलाई 2015 में गिरफ्तार किया गया था. वह पत्रिका अखबार के स्ट्रिंगर थे.


यादव की ट्रायल अभी भी जगदलपुर की अदालत में चल रही है. आरोपों की गम्भीरता के कारण स्थानीय अदालत पूर्व में उनकी जमानत याचिका को खारिज कर चुकी है. उनके मित्रों और सहयोगियों को अनुसार उन्हें जानबूझकर निशाना बनाया गया और गिरफ्तार किया गया क्योंकि उन्होंने ऐसी खबरें लिखी थीं जिससे पुलिस इनकार करती रही है.

अपनी गिरफ्तारी के वक़्त 31 साल यादव दो स्थानीय दैनिक अखबारों नवभारत और छत्तीसगढ़ के लिए काम कर रहे थे. आख़िरकार अब वो जेल से बाहर आ गए हैं. वह अपने पत्रकार दोस्तों, मानवाधिकार संगठनों और वकीलों के प्रति आभारी हैं जिन्होंने उन्हें पूरी तरह समर्थन दिया और पूरी तरह उनके साथ रहे.

 

अब तक की कहानी


नाग और यादव की गिरफ्तारी के बाद 26 नवम्बर 2015 को पूरे देश के 100 से ज़्यादा पत्रकारों, एक्टिविस्टों और अकादमिक क्षेत्र से जुड़े लोगों ने छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री और तत्कालीन गृह, सूचना और प्रसारण मंत्री, आदिवासी मामलों के मंत्री को ज्ञापन देकर पत्रकारों की तुरन्त रिहाई की मांग और मामलों की निष्पक्ष जांच की अपील की थी. बाद में इसी तरह की मांग एमनेस्टी इंटरनेशनल और कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स (सीपीजे) ने भी की, पर कोई सुनवाई नहीं हुई.

अपने जेल के दिनों को याद करते हुए यादव कहते हैं कि शुरुआत में तो मैं यह विश्वास ही नहीं कर सकता था जो मैंने जेल में देखा है. मैं सोचता हूं कि ऐसा केवल अंग्रेजों के समय में होता होगा. वो कहते हैं कि मैं देश के अन्य भागों के बारे में तो नहीं जानता लेकिन बस्तर की जेलें ठसाठस भरी हुई हैं. वहां मूलभूत सुविधाएं तक नहीं हैं.

उनके मुताबिक कैदी जिनमें ज्यादातर अंडरट्रायल हैं, वे गैर-मानवीय हालत में रहने को मजबूर हैं. इनमें से अधिकांश कैदी वंचित और पिछड़े वर्ग के जैसे कि आदिवासी और दलित हैं. उन्होंने यह भी कहा कि इनमें से अधिकांश कैदी बेगुनाह हैं. वे अच्छे वकील नहीं कर सकते, इसलिए जेल में रहने को मजबूर हैं. उन्होंने हैरानी भरे अंदाज़ में पूछा कि क्या यही आज़ादी है जिसका सपना हमारे पुरखों ने देखा था.

अपनी 17 महीने की जेल के दौरान वह बस्तर की दो जेलों में रहे. पहली बार जगदलपुर के केन्द्रीय कारागार में और फिर कांकेर की जिला जेल में. उन्होंने कैच से कहा कि जगदलपुर के केन्द्रीय कारागार की तुलना में कांकेर जिला जेल के हालात कुछ अच्छे हैं लेकिन कैदियों के लिए ऐसे हालात भी अच्छे नहीं कहे जा सकते.

 

संतोष यादव ने हैरानी भरे अंदाज़ में पूछा कि क्या यही आज़ादी है जिसका सपना हमारे पुरखों ने देखा था.


यादव ने आरोप लगाया कि पिछले साल अक्टूबर में, जब हम कैदी थे, तब हमने कैदियों के मुद्दों पर शिकायत करते हुए शांतिपूर्ण तरीके से विरोध जताया. हमें कई बार पीटा गया. उन्होंने दावा किया कि उन्हें इतनी बुरी तरह पीटा गया कि वह छह घंटे तक बेहोश रहे. बाद में उन्हें कालकोठरी में रखा गया जहां वह 11 दिन रहे.

उन्होंने कहा कि मुझ पर जेल तोड़ने की साज़िश करने और साथी कैदियों को भड़काने का भी आरोप लगाया गया. मुझे जेल के मेट्स के सामने पेश किया गया जैसे कि हम नक्सली हों. ज़्यादातर मुझे अपने साथी कैदियों से भी बात करने की इजाज़त नहीं दी जाती थी.

 

काम में जोखिम

 

बस्तर जैसे प्रतिकूल माहौल वाले इलाक़े में पत्रकारिता के दौरान आने वाली जोखिमों, कठिनाइयों का ज़िक्र करते हुए वह कहते हैं कि यहां पत्रकारिता करना आसान काम नहीं हैं. आप हर वक़्त शक़ के घेरे में रहते हैं. उनके मुताबिक यहां पत्रकारिता करने में जोखिम हैं. कई मुद्दे इसमें जुड़े हुए हैं. संसाधनों की कमी से लेकर विपरीत हालातों के चलते बहुत ज़्यादा महत्वपूर्ण ख़बरों को छापने में भरोसे की कमी तक.

उन्होंने यह भी कहा कि हर कोई सुरक्षित खेल खेलना चाहता है. लेकिन ऐसे भी लोग हैं, जिनका ज़मीर बचा हुआ है. वे अपनी ज़िंदगी और उन्हें जो आज़ादी मिली है, उसे जोखिम में डालते हुए तथ्यों को आगे लाने में अपनी भरसक कोशिशें करते हैं. उन्होंने एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया की फैक्ट फाइंडिंग टीम की उस रिपोर्ट (मार्च 2016) को दोहराया जिसमें कहा गया था, 'बस्तर में एक भी पत्रकार बिना भय या दबाव के काम नहीं कर रहा है.'

ज़मानत पर रिहा होने के बाद उन्हें रोज़ाना थाने पर अपनी मौजूदगी दर्ज करानी है. अनेक कारणों में से एक कारण यह भी है जिसके चलते वे पत्रकार के रूप में अपना काम अभी तक शुरू नहीं कर सके हैं. उन्होंने कैच से कहा कि मुझे कसूरवार साबित नहीं किया गया है लेकिन एक मैसेज दिया गया है कि मैंने कुछ ग़लत किया है.

दिल्ली आने के लिए भी संतोष को स्थानीय अदालत से अनुमति लेना पड़ी. दिल्ली विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान विभाग में आयोजित एक सार्वजनिक बैठक में संतोष बोले, पत्रकारों से रूबरू हुए और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अधिकारियों से मिले.

आने वाले दिनों में, यादव को उम्मीद है कि प्रतिबंध कुछ कम हो जाएंगे, थाने में हफ्ते में एकबार से ज्यादा नहीं जाना पड़ेगा और वे नियमित रूप से पूर्णकालिक पत्रकारिता कर सकेंगे और अपने पत्रकारिता के पेशे को बखूबी अंजाम दे पाएंगे. उन्हें भरोसा है कि ट्रायल के आख़िर में वो सभी आरोपों से बरी हो जाएंगे.

यादव कहते हैं कि इस केस से और जेल जाने के नाते उनकी ज़िंदगी बुरी तरह प्रभावित हो गई है. वह कहते हैं कि मैं जल्दी ही पत्रकारिता का काम शुरू करने और वह सब लिखने के प्रति उत्सुक हूं जो बस्तर के दूर-दराज क्षेत्र में घटित हो रहा है.

First published: 19 April 2017, 9:43 IST
 
पिछली कहानी
अगली कहानी