Home » इंडिया » Bastar SP D shrawan write letter against CJM Prabhakar gwal
 

समथिंग इज़ रॉटेन इन द स्टेट ऑफ छत्तीसगढ़

राजकुमार सोनी | Updated on: 20 April 2016, 10:17 IST
QUICK PILL
  • छत्तीसगढ़ सरकार के अफसरों के खिलाफ अपने सख्त फैसलों से सुर्खियों में रहे सुकमा के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रभाकर ग्वाल के मामले में चौंकाने वाली जानकारी सामने आई है.
  • कुछ दिनों पहले \'जनहित\' को आधार बताकर प्रभाकर ग्वाल को छत्तीसगढ़ सरकार ने बर्खास्त कर दिया था.
  • सुकमा के एसपी ने दंतेवाड़ा के जिला एवं सत्र न्यायाधीश को पत्र लिखकर प्रभाकर ग्वाल के फैसलों की शिकायत की थी.
  • इतना ही नहीं चिंतागुफा थाने में तैनात एएसआई भीमकुमार ने भी सीजेएम प्रभाकर ग्वाल के फैसलों पर सत्र न्यायाधीश को पत्र लिखकर शिकायत दर्ज करायी थी.
  • कैच के पास इन सभी पुलिस अधिकारियों के सभी ऐसे दस्तावेज मौजूद हैं. यहां एक गंभीर सवाल देश की न्यायपालिका पर उठता है कि क्या एक सीजेएम के अदालती निर्णयों के खिलाफ पुलिस अधिकारी इस तरह की शिकायत दर्ज कर सकते हैं? जानने के लिए पूरी स्टोरी पढ़ें:

सबसे पहले इस स्टोरी के अंग्रेजी शीर्षक के लिए माफी. पाठक इसे हिंदी में इसका विकल्प नहीं मिलने की मजबूरी मान सकते हैं. शेक्सपियर के नाटक हैमलेट की अमर पंक्ति से प्रेरित यह वाक्य ही दरअसल इस कहानी के लिए सबसे मुफीद है. कुछ दिन पहले ही कैच ने छत्तीसगढ़ की एक खबर प्रकाशित की थी. उस खबर में बताया गया था कि कैसे एक मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (सीजेएम) प्रभाकर ग्वाल को वहां की सरकार ने 'जनहित' के आधार पर बर्खास्त कर दिया था. यह जनहित क्या था, एक सीजेएम जनहित के लिए कैसे खतरा है, इन सवालों के बारे में कुछ भी नहीं बताया गया था.

कैच ने अपनी पड़ताल में पाया था कि प्रभाकर की छवि एक ईमानदार और दबंग किस्म के मजिस्ट्रेट की थी. उन्होंने पिछले कुछ समय के दौरान तमाम ऐसे फैसले दिए थे जिससे स्थानीय पुलिस अधिकारियों और नेताओं के लिए मुश्किलें खड़ी हो गई थीं.

पढ़ें: 'जनहित' है इस दलित मजिस्ट्रेट की बर्खास्तगी की वजह

इसके अलावा भी पिछले कुछ महीनों के दौरान छत्तीसगढ़ में बहुत कुछ हुआ है जो एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए खतरा है. वहां पत्रकारों को जेल में डाला गया है, मनवाधिकारकर्मियों पर हमले हुए हैं, सामाजिक कार्यकर्ताओं को छत्तीसगढ़ से बाहर जाने के लिए मजबूर किया गया है. यानी बहुत कुछ सड़ रहा है छत्तीसगढ़ में. इन्हीं सब बातों के मद्देनजर शेक्सपियर की वह अमर पंक्ति इस कहानी का शीर्षक है.

प्रभाकर ग्वाल की लगातार फटकार से खिसियाए पुलिस अफसरों ने उनकी शिकायत दंतेवाड़ा के जिला एवं सत्र न्यायाधीश से की थी

इस सड़न की एक और बानगी यहां हम देने जा रहे हैं, आप भी जानिए. माओवाद उन्मूलन के नाम पर छत्तीसगढ़ में चल रही सरकार और पुलिस की कार्रवाई पर लगातार सवाल उठते रहे हैं. सरकार और उसके अफसरों के खिलाफ दिए गए अपने सख्त फैसलों के लिए सुर्खियों में रहे और सुकमा जिले के बर्खास्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रभाकर ग्वाल की लगातार फटकार से खिसियाए पुलिस अफसरों के कुछ ऐसे दस्तावेज सामने आए हैं, जिसमें अफसरों ने मजिस्ट्रेट की शिकायत दंतेवाड़ा के जिला एवं सत्र न्यायाधीश से की थी. सुकमा पुलिस अधीक्षक डी श्रवण ने सत्र न्यायाधीश को खत लिखकर कहा था कि मजिस्ट्रेट ग्वाल की वजह से गंभीर अपराधों में लिप्त माओवादी जमानत का लाभ पाने में सफल हो रहे हैं.

सिर्फ एसपी ही नहीं बल्कि माओवाद प्रभावित थानों के अफसरों ने भी अपने वरिष्ठ अधिकारियों को खत लिखकर कहा था कि मजिस्ट्रेट न्यायिक प्रक्रिया में अनावश्यक रोड़ा बन रहे हैं जिसकी वजह से उनका मनोबल टूट रहा है.

एसपी के खत में चौंकाने वाली बातें

सुकमा पुलिस कप्तान ने जिला एवं सत्र न्यायाधीश को जो खत लिखा, उसमें उन्होंने माना कि सुकमा माओवाद प्रभावित जिला है और इलाके में संचार साधनों का अभाव है. उनके पत्र की कुछ खासियतें देखिए.

  • माओवादी सड़कों पर विस्फोट करते हैं और कानून-व्यवस्था की परवाह किए बगैर जन अदालत लगाकर हत्या करते हैं.
    letter1

  • माओवादी प्रकरण में गिरफ्तार लोगों से सुकमा सीजीएम (प्रभाकर ग्वाल) पूरी जानकारी मांगते हैं. उनका फोटो, पूरा नाम, पिता का नाम, गांव का नाम, उम्र, जाति वगैरह. जबकि माओवादी संगठनों के सदस्य के सिर्फ एक नाम नहीं होते.
    letter3

  • माओवाद प्रभावित चिंतागुफा थाने के एक प्रकरण में सीजेएम ने सात लोगों के ऊपर से कई गंभीर धाराएं हटा दी और उन्हें जमानत दे दी गई. जबकि माओवादियों ने सुरक्षा बलों को जान से मारने और हथियार लूटने के लिए हमला किया गया था.
    letter4

  • बिना ट्रायल के धारा 307 के आरोपी को जमानत दे देना न्यायिक प्रक्रिया को कमजोर करने वाला है.

  • गादीरास थाने के चार माओवादी मामलों में भी आरोपियों को जमानत का लाभ दे दिया गया. इससे फोर्स का मनोबल प्रभावित होता है और अपराधियों को न्याय का मजाक उड़ाने का मौका मिलता है.
    letter5

  • चिंतागुफा थाने के एक निरीक्षक जन्मेजय पाण्डेय ने 31 जनवरी 2016 को केस डायरी में लिखा कि जब वे सीजीएम के सामने उपस्थित हुए तो उन्होंने कहा, 'तुम लोग गरीब ग्रामीणों को बिलावजह पकड़कर ले आते हो भेड़-बकरियों के जैसे. तुम्हारे बंदूक के डर से बेचारे कुछ बोल नहीं पाते. मुझे लगता है कि ये लोग किसी भी तरह से आरोपी नहीं हैं, जिनके पास पेट भरने का साधन नहीं हैं, वे गोली क्या चलाएंगे. पुलिसवालों की ज्यादती के कारण ही लोग माओवादियों का साथ देते हैं और हथियार उठाते हैं. असली माओवादियों को तो पकड़ नहीं पा रहे हो और गांव के गरीब लोगों को फर्जी जेल में ठूंस रहे हो.

  • चिंतागुफा थाने के एसआई भीमकुमार सोम ने सुकमा के थाना प्रभारी को एक फरवरी 2016 को खत लिखकर कहा 'तुम लोग वाहवाही लूटने के लिए किसी भी गरीब को गाय-बैल समझकर पकड़ लेते हो और माओवादी बना देते हो. यदि कोई तुम्हारी कनपटी पर रिवाल्वर टिका देगा तो तुम भी वैसा करोगे जैसा ये कहते हैं. जो लोग अपने बच्चों की परवरिश ठीक से नहीं कर पा रहे वे क्या हथियार उठाएंगे.

  • दो फरवरी 2016 को चिंतागुफा के थाना प्रभारी ने अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक को बताया  कि सीजेए ने ग्रामीणों को माओवादी बनाकर पेश करने पर जेल भेजने की धमकी दी है. पांच फरवरी 2016 को सुकमा सिटी कोतवाली के प्रभारी ने अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक को लिखा कि मजिस्ट्रेट ने पुलिस के बारे में नकारात्मक टिप्पणी की है, जिससे मनोबल टूटा है.

यहां घटनाक्रम और उसके समय को समझना भी जरूरी है.  यह कोई संयोग नहीं है कि पुलिस ने मजिस्ट्रेट की शिकायत के लिए जो भी पत्र आदि की लिखापढ़ी की वह 31 जनवरी से 8 फरवरी 2016 के बीच की है. इससे पहले ग्वाल ने 22 दिसम्बर 2015 को ही पुलिस महानिदेशक सहित अन्य कई जिम्मेदार लोगों को पत्र लिखकर जानकारी दी थी कि माओवाद उन्मूलन के नाम पर बस्तर में केवल फर्जीवाड़ा चल रहा है.

पुलिस अधीक्षक को मजिस्ट्रेट के किसी फैसले को लेकर टिप्पणी करने का अधिकार ही नहीं है

तो क्या यह सब योजनाबद्ध तरीके से जानबूझकर एक ईमानदार अधिकारी को बदनाम करने और उसे नौकरी से बाहर करवाने के लिए किया गया. परिस्थितियों पर ध्यान दे यह अटकल एक हद तक सच लगती है. पत्र लिखने और प्रभाकर ग्वाल की बर्खास्तगी के बीच कुल दो से तीन महीने का अंतराल है. लेकिन बस्तर के एसपी डी श्रवण इस बारे में कुछ नहीं बताना चाहते. वे कहते हैं, "मजिस्ट्रेट के बारे में मैंने क्या लिखा और क्या नहीं, इसे लेकर मुझे कुछ नहीं कहना है.”

बर्खास्त सीजेएम प्रभाकर ग्वाल एसपी के तर्क को गलत बताते हैं. उनके मुताबिक पुलिस वाले अक्सर बेकसूर आदिवासियों को निशाना बनाते हैं. वे आगे कहते हैं, "मैं जब तक अपने पद पर था, न्याय सम्मत तरीके से हर काम को किया. एक रोज पुलिस 1000 लोगों को लेकर आ गई. कहने लगी कि सब माओवादी हैं. पूछताछ पर पता चला कि सभी हाट-बाजार में घूमने आए ग्रामीण थे. तर्क और साक्ष्य के आधार पर सिर्फ उन लोगों को ही जमानत का लाभ दिया गया, जो निर्दोष थे. बस्तर में पुलिस किसी भी गरीब आदिवासी को माओवादी बनाने के खेल में लगी हुई हैं. लेकिन मैंने तर्क और साक्ष्य के आधार पर सिर्फ उन्हीं लोगों को छोड़ा जो बेकसूर थे.”

पढ़ें: छत्तीसगढ़: 'जमीन, भाई और आबरू सब कुछ चला गया'

पढ़ें: छत्तीसगढ़ का सूखा, राहत का धोखा और किसान भूखा

क्या पुलिस अधिकारी न्यायाधीश के फैसलों के प्रति ऐसी नकारात्मक टिप्पणी कर सकता है

हम एक बार फिर से उस सवाल पर लौटते हैं कि क्या किसी पुलिस अधीक्षक या थानेदार को इस बात का अधिकार है कि वह सीजेएम के निर्णय पर उंगली उठाए या फिर उसे 'अनावश्यक हस्तक्षेप' बताए. यह पहली नजर में ही तय मानकों का उल्लंघन दिखता है. एक न्यायाधीश के फैसलों के प्रति अगर इस हद तक कोई पुलिस अधिकारी चला जाता है तो इसका सीधा अर्थ है कि इस खेल में वह अकेले नहीं है. व्यवस्था, सरकार आदि सब इस खेल में शामिल हैं.

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता कनक तिवारी बताते हैं, "मजिस्ट्रेट को यह अधिकार है कि वह किसी आरोपी को रिमांड पर दे दे या फिर उसे न्यायिक अभिरक्षा में जेल भेज दें. मजिस्ट्रेट कोई पोस्टमैन नहीं है कि वह चिट्ठी बांटने का काम करेगा. पुलिस अधीक्षक को मजिस्ट्रेट के किसी फैसले को लेकर टिप्पणी करने का अधिकार ही नहीं है. यदि निचली अदालत का कोई फैसला गलत हुआ है तो पुलिस उसे सेंशन कोर्ट या हाईकोर्ट में चुनौती दे सकती है. पुलिस अधीक्षक को यह कहने का अधिकार नहीं है कि न्यायिक प्रक्रिया बाधित हुई है या न्यायिक प्रक्रिया का मजाक उड़ा है."

जाहिर है जिस तरह से एक सीजेएम के कामकाज पर जिले के पुलिस अधिकारियों ने उंगली उठाई है वह विधिसम्मत नहीं है. और जिस तरीके से प्रभाकर ग्वाल की बर्खास्तगी हुई है वह और भी बड़े सवाल खड़े करती है. इसीलिए वह बात कही गई कि छत्तीसगढ़ सूबे में कुछ बहुत गहरे तक सड़ चुका है.

First published: 20 April 2016, 10:17 IST
 
पिछली कहानी
अगली कहानी