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हिमाचल प्रदेश: पहाड़ पर नज़र मोदी और अमित शाह की

राजीव खन्ना | Updated on: 11 October 2016, 7:57 IST
QUICK PILL
  • हिमाचल प्रदेश में अगले साल विधानसभा के चुनाव होने है मगर भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती उस चेहरे को लेकर है जिसकी अगुवाई में चुनाव लड़ा जाएगा. केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री जगत प्रकाश नड्डा फ्रंट रनर के रूप में उभर रहे हैं. पिछले कुछ सालों से उन्होंने नियमित रूप से राज्य में आना-जाना बना रखा है.

भाजपा पहाड़ी राज्य हिमाचल प्रदेश में चुनाव के लिए तैय़ार है और पार्टी ने इसके लिए तैयारियां भी शुरू कर दी हैं. पार्टी अभी तक सत्तारूढ़ कांग्रेस के मुख्य मंत्री वीरभद्र सिंह को अपदस्थ करने की असफल कोशिश करती रही है. पार्टी ने अपना आधार मजबूत करने के लिए राज्य में गोटी बैठानी शुरू कर दी है. वैसे तो विधान सभा चुनाव में अभी एक साल से ज्यादा का समय बाकी है.

पार्टी राज्य की 68 सीटों में से कम से कम 50 सीटों पर जीत दर्ज कराने के महत्वाकांक्षी लक्ष्य को लेकर चल रही है. लेकिन कांग्रेस के अलावा अन्य किसी के लिए इतनी सीटों पर लक्ष्य हासिल करना बहुत मुश्किल काम साबित हो सकता है. इसके अलावा भाजपा को राज्य में आम आदमी पार्टी से भी चुनौती मिलने की आशंका है क्योंकि आप भी राज्य में अपन पैर जमाने को आतुर है.

मोदी की पहली यात्रा

पिछले कई महीनों से भाजपा नेतृत्व ने अपने राज्य अध्यक्ष सतपाल सिंह सत्ती के नेतृत्व में पार्टी कैडर के लिए रोड मैप तैयार किया हुआ है. भाजपा ने केन्द्र के भारी-भरकम नेताओं की यात्राओं की व्यवस्थाएं भी की है. ये नेता राज्य का लगातार दौरा कर रहे हैं. 18 अक्टूबर को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी राज्य के दौरे पर आएंगे. वे चुनाव तैयारियों का जायजा लेंगे और मंडी में परिवर्तन रैली से विधान सभा चुनाव अभियान का शंखनाद करेंगे.

वैसे तो वह 800 मेगावाट की कोलडम, 412 मेगावाट की रामपुर और 520 मेगावाट की पार्वती की तीसरे चरण की परियोजनाओं को राष्ट्र को समर्पित करने के लिए यहां आ रहे है. उनका नाहान जाने का भी कार्यक्रम है. वह मंडी में आम सभा को तो सम्बोधित तो करेंगे ही, और यदि वे नहान गए तो वहां भी लोगों के बीच भाषण देंगे.

प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी की यह राज्य की पहली यात्रा होगी. उन्होंने दो दशक से ज्यादा पहले कांगड़ा में आरएसएस के प्रचारक के रूप में काम किया था. हिमाचल प्रदेश से 20 साल से ज्यादा समय  से दूर रहने के बाद भी वह हमेशा हिमाचल प्रदेश की राजनीतिक गतिविधियों पर काफी नजदीक से नजर रखते रहे हैं. इस दौरान चाहे वह दिल्ली में भाजपा के केन्द्रीय कार्यालय में बैठते रहे हों या फिर गुजरात के मुख्यमंत्री रहे हों या अब प्रधानमंत्री हैं. इस यात्रा के बाद वह राज्य का एक और दौरा कर सकते हैं.

अमित शाह भी करेंगे दौरा

अपनी अगली यात्रा में मोदी धर्मशाला में केन्द्रीय विश्वविद्यालय, बिलासपुर में एम्स की आधारशिला रख सकते हैं. उनका जल्द ही धर्मशाला में स्मार्ट सिटी परियोजना की शुरुआत करने का भी कार्यक्रम है. सत्ती ने कहा कि मोदी के अक्टूबर में राज्य की यात्रा के बाद पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह भी इस पहाड़ी राज्य के दौरे पर आएंगे. अमित शाह राज्य में तीन दिन रहेंगे. ये यात्राएं राज्य सरकार को सत्ता से बेदखल करने का भाजपा का एक व्यापक गेम प्लान है.

चार्जशीट कमेटी

हिमाचल में पार्टी चुनाव के लिए जल्द से जल्द तैयारी कर लेना चाहती है. इसके अलावा भाजपा ने एक चार्जशीट कमेटी भी बनाई हुई है जिसके सदस्य नवम्बर में पूरे राज्य का दौरा करेंगे. वे हर जिलों में जाएंगे और लोगों से बात करेंगे और वीरभद्र का शासन काल में किए गए कामों का फीडबैक लेंगे. इसके बाद भाजपा की चार्जशीट को अंतिम रूप दिया जाएगा और 24 दिसम्बर को राज्य सरकार के चार साल का कार्यकाल पूरा होने पर चार्जशीट राज्यपाल को सौंपी जाएगी.

सत्ती ने कैच न्यूज को बताया कि हमने कुछ दिन पहले कार्यकारिणी की बैठक बुलाई थी. हमने आन्दोलन का कार्यक्रम शुरू करने के लिए एक कमेटी बनाई है. ये आन्दोलन, प्रदर्शन मोदी की यात्रा के बाद किया जाएगा. उन्होंने कहा कि भाजपा कांग्रेस और वीरभद्र को भ्रष्टाचार के मुद्दे पर घेरने की योजना बना रही है.  हमने पहले से ही मुख्य मंत्री के खिलाफ कथित मनी लॉंड्रिंग मामले में प्रवर्तन निदेशालय में गुहार लगाई हुई है.

बताते चलें कि लगभग महीने भर पहले ही भाजपा नेतृत्व ने हिमाचल लोकहित पार्टी (एचएलपी) को अपने पाले में करने की सफलता पा ली है. एचएलपी का गठन भाजपा के असंतुष्ट लोगों द्वारा वर्ष 2012 के विधानसभा चुनावों के मद्देनजर किया गया था. इस पार्टी से केवल एक विधायक हैं कुल्लू के परिवार के महेश्वर सिंह. वह कुछ दिनों पहले तक वीरभद्र सरकार का समर्थन कर रहे थे.

अनबन

लेकिन अब उनके वीरभद्र के साथ गहरे मतभेद हो गए हैं. वीरभद्र भी हिमाचल के एक राज परिवार से आते हैं. रुचिकर तो यह है कि यह विवाद मंदिर को लेकर है. हिमाचल प्रदेश सरकार कुल्लू के प्रसिद्ध रघुनाथ मंदिर को अपने अधीन लेना चाहती है. वीरभद्र सिंह का कहना है कि रघुनाथ मंदिर किसी की निजी संपत्ति नहीं है, बल्कि यह लोगों के लिए है। जनता की मांग पर ही वह मंदिर को सरकार के अधीन कर रहे हैं.

उधर, कुल्लू के राज परिवार  ने साफ कर दिया है कि वह भगवान रघुनाथ मंदिर को सरकार के अधीन आने नहीं देंगे. महेश्वर सिंह का कहना है कि मंदिर उनकी देखरेख में है. इस मामले में उन्होंने हाईकोर्ट की शरण भी ली हुई है. इस लड़ाई का असर दस दिन तक चलने वाले विश्वप्रसिद्द कुल्लू के दशहरे पर भी पड़ सकता है. यह उत्सव मंगलवार से शुरू हो रहा है. 

स्थानीय नागरिकों का कहना है कि दिसम्बर 2014 में मंदिर में एक सनसनीखोज चोरी की घटना हो गई थी. इसके चलते सरकार को मंदिर को अपने अधीन लेने के लिए मजबूर होना पड़ा है. कुछ सालों में कांग्रेस सरकार ने मंदिरों की सुरक्षा के साथ ही भक्तों की सुविधा के लिए तीन दर्जन से ज्यादा मंदिरों को टेकओवर किया है. दूसरी ओर महेश्वर सिंह के छोटे भाई एवं वीरभद्र सरकार में मंत्री कर्ण सिंह का कहना है कि रघुनाथ मंदिर को ट्रस्ट बनाने का फैसला सरकार ने लिया है और इसके लिए कुल्लूवासियों ने ही प्रस्ताव भेजे थे. ऐसे में मंदिर को लेकर विवाद नहीं होना चाहिए.

घर वापसी

इस बीच यह भी जोरदार अटकलें हैं कि इस बार दशहरे पर परम्परागत धार्मिक रीति-रिवाज निभाने की अनुमति नहीं दी जा सकती है. महेश्वर सिंह पहले ही राज्यपाल देव वृत के पास जा चुके हैं. शिमला के राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि भाजपा में महेश्वर सिंह के लौटने से किसी को आश्चर्य नहीं हुआ है.

यह उनके लिए अच्छा अनुभव ही है. वह पूर्व में भाजपा सांसद रह चुके हैं और उनके पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से अच्छे सम्बंध भी रहे हैं. वह भाजपा की कार्यप्रणाली को अच्छी तरह से समझते हैं. यह उनकी घर वापसी ही है.

हालांकि, यह बात अलग है कि लोकहित पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं ने इस विलय को स्वीकार नहीं किया है. अधिकांश लोग आप में शामिल हो गए हैं. लोकहित पार्टी के पूर्व नेता मोहिन्दर सोफत, जो अब आप में शामिल हो गए हैं, कहते हैं कि एचएलपी के आनुषांगिक संगठनों के बड़ी संख्या में पदाधिकारी और कार्यकर्ता, यहां तक कि जिला इकाइयों के प्रमुख भी आप में शामिल हो गए हैं.

महेश्वर ने अपनी सुविधानुसार राजनीति की है और उन्हें भाजपा ने टिकट देने का भरोसा दिया है, इसीलिए वह भाजपा में चले गए हैं.

चुनौती

भाजपा की चुनावी तैयारियों के बीच यह रेखांकित किए जाने की जरूरत है कि पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि चुनावी अभियान की अगुवाई  कौन करेगा. शांता कुमार अब रेस के पुराने घोड़े हैं और उपेक्षा के शिकार हैं. मोदी ने पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल से दूरी बना रखी है.

अब केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री जगत प्रकाश नड्डा फ्रंट रनर के रूप में उभर रहे हैं. पिछले कुछ सालों से उन्होंने नियमित रूप से राज्य में आना-जाना बना रखा है. उन्होंने कई स्थानों का भ्रमण भी किया है. केन्द्रीय सड़क एवं परिवहन मंत्री नितिन गडकरी जब हाल में राज्य के दौरे पर आए थे तो भाजपा के एक कार्यकर्ता ने बड़ी ही रुचिकर टिप्पणी की थी.

कार्यकर्ता ने कहा था कि बैनरों और होर्डिंग्स से धूमल और शांता कुमार के चित्र गायब हैं. राज्य में केवल एक ही चेहरा दिखाई पड़ रहा है, वह चेहरा है नड्डा का. और एक फोटो जो कहीं-कहीं ही दिखाई पड़ जाती है, वह है सत्ती की. इन दिनों धूमल के पुत्र अनुराग ठाकुर भी असहाय से हैं. वह बोर्ड ऑफ न्ट्रोल फॉर क्रिकेट इन इंडिया (बीसीसीआई) के अध्यक्ष हैं और बीसीसीआई का मामला सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है.

First published: 11 October 2016, 7:57 IST
 
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