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बायर-मोनसैन्टो डीलः 2016 की सबसे बड़ी कॉरपोरेट डील किसानों का काल बन सकती है

निहार गोखले | Updated on: 17 September 2016, 7:14 IST

रासायनिक कीटनाशक बनाने वाली कम्पनी बायर क्रॉप्स साइंस जीएम बीज बनाने वाली दुनिया की सबसे बड़ी एग्रोकेमिकल कम्पनी में से एक मोनसैन्टो कॉरपोरेशन को खरीदने पर सहमत हो गई है. यह डील भारत के कृषि क्षेत्र के लिए चिन्ताजनक संकेत है.

66 बिलियन डॉलर की इस डील की घोषणा अभी हुई ही है. यह डील इस साल की सबसे बड़ी डील होगी. समझौते के 2017 तक पूरा हो जाने की उम्मीद है.

उल्लेखनीय है कि भारत विश्व के कुछ सबसे बड़े उन देशो में शामिल है जहां किसानों के लिए सहकारी समितियां हैं. गुजरात में सहकारिता के आधार पर अमूल का डेयरी उत्पाद है तो उर्वरक बनाने वाली इफ्को किसान सहकारिता का विश्व का सबसे बड़ा फेडरेशन है. लेकिन सहकारी समितियों में मोनोपॉली के कारण आपस में ही वैमनस्य का भाव रखने का परिणाम मोनसान्टो-बायर डील का होना है.

बड़े हिस्से पर कब्जा

बीज व्यापार के मामले में मोनसैन्टो विश्व की सबसे बड़ी कम्पनी है और भारत में कपास की खेती में 90 फीसदी बीज इसी कम्पनी के इस्तेमाल किए जाते हैं. जबकि बायर भारत की सबसे बड़ी रासायनिक कीटनाशक निर्माता कम्पनी है.

मोनसैन्टो के अधिग्रहण के बाद किसानों द्वारा बाजार से खेती के लिए खरीदे जाने वाली तीन मुख्य चीजों में से बायर का दो पर कब्जा हो जाएगा. उर्वरक का स्थान तीसरे नम्बर पर आता है. इसका सबसे बदतर परिदृश्य तो यह है कि, जैसा विशेषज्ञ कहते हैं कि इससे किसान, उपभोक्ता और कीटनाशक बनाने वाली छोटी कम्पनियों पर संकट के बादल घिर आएंगे.

अलायंस फॉर सस्टेनेबल एंड होलीस्टिक एग्रीकल्चर की संयोजक कविता कुरुंगाती कहती हैं कि बीज और कीटनाशक बनाने वाली इन दोनों कम्पनियों का बाजार के बड़े हिस्से पर कब्जा है. इनके एक हाथ में जाने का अर्थ है कि किसानों के पास पसंद करने के लिए विकल्प बहुत ही कम होंगे जिसका किसानों की कृषि गतिविधियों और उनके जीवनयापन पर गहरा असर पड़ेगा.किसी भी तरह की विकासात्मक गतिविधियों का, जिसमें पसंद करने के विकल्प ही कम हों, किसानों के लिए जोखिम वाला है. कुरुंगाती कहती हैं कि यह उपभोक्ताओं के लिए भी नुकसानदायक है

बीज-कीटनाशक गठजोड़

इस गठजोड़ से जीएम बीज का बड़े पैमाने पर फैलाव हो जाएगा. जीएम बीजों को इस तरह से विकसित किया जा सकता है जिसके चलते खेतों में स्वतः पनपने वाली घास-पात की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ जाती है. 

किसान घास-पात को खत्म करने के लिए जो छिड़काव करते हैं, उससे फसल को नुकसान नहीं होता. धीरे-धीरे वे छिड़काव की मात्रा बढ़ाते जाते हैं. इसका परिणाम यह होता है कि घास-पात पर उनका असर नहीं होता. यही तर्क कीटनाशकों पर भी लागू होता है.

बायर और मोनसैन्टो में इसी तरह का सहयोग 2007 में भी हुआ था. तब उन्होंने एक समझौते पर हस्ताक्षर किए थे जिसके तहत मोनसैंटो को अमरीका में मक्का और सोयाबीन बेचने की अनुमति दी गई थी. इसमें बायर की घास-पात नाशक प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल किया गया था.

बीज व्यापार के मामले में मोनसैन्टो विश्व की सबसे बड़ी कम्पनी है और भारत में कपास की खेती में 90 फीसदी बीज इसी कम्पनी के इस्तेमाल किए जाते हैं.

इस अधिग्रहण का अर्थ यह होगा कि बीज और घास-पात नाशक संयुक्त लाभ वाले सौदे रहेंगे. तब यह सिर्फ सहयोग वाला समझौता नहीं रहेगा.

सेन्टर फॉर फूड एंड सेफ्टी के विश्लेषक बिल फ्रीज के अनुसार मोनसैन्टो के बीज और बायर का शाकनाशी पूरी तरह से इस विषाक्त पदार्थ को न केवल अपने कब्जे में किए रहेंगे बल्कि घास-पात नाशक का इस्तेमाल बढ़ते रहने से उन्हें बहुत ज्यादा लाभ भी होता रहेगा.

वैश्विक रूप से, जीएम फसलों में कीटनाशकों का उपयोग बढ़ता ही जाता है. वर्ष 2012 के एक अध्ययन के अनुसार अमरीका में मक्का, सोयाबीन और कपास में जीएम लाए जाने के बाद से 1996 और 2011 के बीच कीटनाशकों का उपयोग 7 फीसदी तक बढ़ गया है. 

अध्ययन का यह भी आकलन है कि मक्का और सोयाबीन में घास-पात नाशक की नई वैरायटी से घास-पात नाशकों का इस्तेमाल 50 फीसदी तक बढ़ सकता है.

टाइटेनिक थ्री

कनाडा के एक शोध संगठन ईटीसी के अनुसार बायर-मोनसैन्टो डील की तरह से पहले भी अन्य बड़ी कृषि कम्पनियों के बीच डील हो चुकी है. दिसम्बर 2015 में रसायन क्षेत्र की प्रमुख कम्पनी डूपोन्ट और डाउ केमिकल्स का भी विलय हुआ था. जबकि सिनगेन्टा का अधिग्रहण चाइनाचैम द्वारा किया जा रहा है.

इन समझौतों और मोनसैन्टो-बायर समझौते से इन तीनों समूहों का विश्व में कीटनाशकों की बिक्री पर 65 फीसदी और बीज की वैश्विक बिक्री पर 61 फीसदी नियंत्रण हो जाएगा. संगठन ने इसे–टाइटेनिक थ्री- की संज्ञा दी है.
ईटीसी के अनुसार ये व्यापार समझौते विकसाशील देशों भारत, चीन, ब्राजील और अर्जेण्टीना को ध्यान में रखकर किए गए हैं. ये देश सबसे तेज गति से उभरते बाजार हैं जिनका पहले से ही वैश्विक कीटनाशक बाजार में 28 फीसदी की हिस्सेदारी है.

एंटी-मोनोपॉली संकट

यह डील सही नहीं है. इसकी वजह मुख्यतः गुटबंदी का होना है. जून में यूरोपीय यूनियन की एंटी ट्रस्ट की मुखिया ने कहा था कि यदि यह डील होती है तो वे इस पर फिर से विचार करेंगी. यह बात उन्होंने ग्रीन पार्टी के दो सांसदों द्वारा लिखे पत्र के उत्तर में कही थी. पत्र में लिखा गया था कि बायर मोनसैन्टो का अधिग्रहण कर रहा है. इससे न केवल यूरोपीय संघ में बल्कि पूरे विश्व में बाजार केंद्रित हो जाएगा, अन्य उत्पादक बाहर हो जाएंगे और प्रतिद्वंद्विता कम हो जाएगी.

पत्र में यह भी लिखा गया था कि इसी तरह की चिन्ताएं पहले से ही चल रहे समझौते के बारे में भी हैं जो समझौते अमेरिका, ब्राजील और चीन में एंटी-मोनोपॉली नियामकों के साथ किए गए थे.

First published: 17 September 2016, 7:14 IST
 
निहार गोखले @nihargokhale

Nihar is a reporter with Catch, writing about the environment, water, and other public policy matters. He wrote about stock markets for a business daily before pursuing an interdisciplinary Master's degree in environmental and ecological economics. He likes listening to classical, folk and jazz music and dreams of learning to play the saxophone.

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