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बिरियानी में बीफ खोज रही हरियाणा सरकार की मंशा क्या है?

राजीव खन्ना | Updated on: 10 September 2016, 13:57 IST

हरियाणा में मनोहर लाल खट्टर के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार अपने पितृ संगठन आरएसएस के एजेण्डे को राज्य में लागू करने में लगी हुई है, ताकि वह खुश और संतुष्ट बना रहे. इसी श्रृंखला में सबसे नया वाकया राज्य के एकमात्र मुस्लिम बहुल जिले मेवात से बिरयानी के नमूनों को एकत्रित कर उन्हें हिसार के लाला लाजपत राय यूनिवर्सिटी ऑफ वेटेनरी एंड एनीमल साइंसेज (एलएलआरयू) में भेजने का है ताकि यह पता लगाया जा सके कि इसमें प्रयुक्त मांस बीफ तो नहीं है.

रिपोर्टस के अनुसार परीक्षण किए गए इन नमूनों में से सात के परिणाम पॉजीटिव आए हैं. एलएलआरयू के डायरेक्टर रिसर्च और वाइस-चांसलर समेत संस्थान के वरिष्ठ अधिकारियों को कई बार फोन करने के बाद भी उनसे सम्पर्क नहीं हो सका. ऐसे में उनकी प्रतिक्रिया नहीं ली जा सकी है.

सोशल एक्टिविस्ट और विश्लेषकों ने सरकार और हाल ही में गठित गौ सरंक्षण टास्क फोर्स (सीपीटीएफ) के कार्मियों के अलावा इन परीक्षणों को करने वाली प्रयोगशाला के जांचकर्ताओं के इरादों पर कई सवाल उठाए हैं. यह भी कहा जा रहा है कि ये गतिविधियां बकरीद से पहले की गईं.

समुदाय विशेष को घेरने और उन्हें निशाने पर लिए जाने का यह एक और उदाहरण है. सत्ता में आने के तुरन्त बाद ही खट्टर सरकार ने हरियाणा गौवंश संरक्षण एवं गौसंवर्धन अधिनियम लागू कर दिया था. सरकार के गौ सेवा आयोग को अपनी सभी गायों की हर तरह की निगरानी रखने के कारण आलोचनाओं का शिकार होना पड़ा है. उससे भी बड़ी बात यह रही कि सरकार ने हाल में ही सीपीटीएफ के नाम पर डीआईजी स्तर के एक अधिकारी की नियुक्ति कर दी.

टास्क फोर्स का हौव्वा

यह अधिकारी 300 सदस्यीय टास्क फोर्स की अगुवाई करेगा. टास्क फोर्स गायों को अवैध रूप से यहां से वहां ले जाने और उनका वध किए जाने पर नजर रखेगी. इसी के चलते एक शिकायत दर्ज कराई गई कि मेवात जिले के अधिकारियों ने फिरोजपुर झिरका क्षेत्र में दुकानदारों और वेंडरों से बिरयानी के नमूने एकत्रित किए हैं. अगले एक हफ्ते में और ज्यादा नमूने एकत्रित किए जा सकते हैं.

राज्य सरकार की इस तरह की कार्रवाइयों से एक सवाल खड़ा हो रहा है कि सरकार अपने पितृ संगठन की राजनीति को बढ़ावा दे रही है. इस समय इस तरह की कार्रवाई करने का क्या औचित्य है? राज्य में कहीं भी चुनाव नहीं होने जा रहे कि इस कदम से चुनाव में वोट मिल जाए? दूसरी बात यह कि राज्य मुख्यत: हिन्दू बाहुल्य राज्य है. मेवात में इस तरह का कौन सा डर है जबकि यह जिला सबसे गरीब जिलों में शामिल है और यह एकमात्र जिला है जहां मुस्लिम आबादी बड़ी संख्या में है.

यह भी कहा जा रहा है कि यहां के इतिहास में कभी भी साम्प्रदायिक उन्माद नहीं भड़का है तो फिर क्यों इस तरह के काम करने की कोशिश की जा रही है जिसका परिणाम साम्प्रदायिक तनाव के रूप में सामने आए.

राज्य मुख्यत: हिन्दू बाहुल्य राज्य है. मेवात में कौन सा डर है जबकि यह जिला सबसे गरीब जिलों में शामिल है

राजनीतिक विश्लेषक बलवन्त तक्षक कहते हैं कि लम्बे समय से जाति के नाम पर लोगों का ध्रवीकरण करने की कोशिश की गई, इसमें विफल रहने पर नई चाल चली जा रही है. अब धर्म के नाम पर राजनीति का ध्रुवीकरण करने की कोशिश की जा रही है. वे कहते हैं कि हर कोई जानता है कि जाट आन्दोलन के दौरान क्या हुआ. लेकिन कुछ दिनों बाद सब यूं ही गुजर गया.

सत्तारुढ़ पार्टी यादवों को जाट या सैनी के खिलाफ अथवा जाटों या सैनियों को यादवों के खिलाफ लम्बे समय तक एक-दूसरे के मुकाबले में खड़ा रखने में विफल रही. जो लोग मारे गए थे वे सुरक्षा बलों के साथ संघर्ष में मारे गए थे न कि एक-दूसरे के खिलाफ लड़ते हुए. अब वे विभिन्न हिन्दू समुदायों को मुस्लिमों के खिलाफ मुकाबले के लिए एकजुट करना चाहते हैं और उनकी समान दुश्मन के रूप में ब्रांडिंग करना चाहते हैं.

वे यह सब करने की दुस्साहिक तरीके से कोशिश कर रहे हैं और इस साम्प्रदायिक एजेण्डा के जरिए आम नागरिकों को आगे कर रहे हैं.

पत्रकार से अकादमिक बने डॉ. गुरमीत सिंह, जो हरियाणा से जुड़ी सभी हलचलों पर करीब से नजर रखते हैं, कहते हैं कि सरकार अल्पसंख्यक बाहुल्य जिले मेवात को जानबूझकर असंवेदनशील बनाने की कोशिश कर रही है. वे कहते हैं कि इस बात के सबूत हैं कि गुड़गांव का नाम बदलने की घोषणा करने के साथ ही इस जिले का नाम भी बदलने की घोषणा कर दी गई. गुड़गांव का नाम गुरुग्राम रखा गया जबकि मेवात का नाम नूह किया गया. यह सब करने की क्या जरूरत थी?

दूसरी बात यह कि पिछले साल के दादरी बीफ हत्याकांड की घटना के बाद सरकार को बीफ के इस संवेदनशील मुद्दे पर चौकस हो जाना चाहिए था लेकिन इस मामले में उसकी अनदेखी की गई. आम लोगों को न्याय होता दिखे, इसकी कोशिश करनी चाहिए लेकिन इस दिशा में कोई कदम ही नहीं उठाया गया है. जो कुछ घटित हो रहा है, वह बहुत गलत है. यह भी कहा जा रहा है कि यह संकट मुस्लिम त्यौहार बकरीद के नजदीक आने के साथ ही जानबूझकर पैदा किया गया है.

मुस्लिम नेता और पूर्व विधायक आफताब अहमद ने कैच से कहा कि ईद-उल-अजहा के ठीक पहले यह सब किया गया है. पिछले साल भी खट्टर ने त्यौहारों पर पशुओं का वध खत्म किए जाने को लेकर विवादास्पद बयान दिया था. इस समय वे बिरयानी के नमूनों को इकट्ठा करने के प्रति गंभीर हैं.

सरकार द्वारा सोच-समझ कर ईद-उल-अजहा के ठीक पहले यह सब किया जा रहा है जिससे सदभाव का माहौल बिगड़ रहा है

उन्होंने यह भी कहा है कि सरकार अपने वैचारिक संगठन को खुश करने की कोशिश कर रही है. आरएसएस के निशाने पर तो मुसलमान रहते ही हैं. वे हमेशा ही मेवात को निशाने पर रखने की कोशिश करते रहते हैं. इसका उदाहरण है कि खनन हर जगह अवैध ही किया जाता है लेकिन मेवात का मामला जब सामने आता है तो वे इस धर्म और अपराध से जोड़कर पेश करते हैं.

यहां की आबादी आर्थिक रूप से कमजोर और वंचित लोगों की है. सरकार मुस्लिम आबादी में हीन भावना भरना चाहती है. इस तरह की कार्रवाइयों से सरकार अन्य सभी मोर्चों पर विफल रहने के बाद असल मुद्दे से लोगों का ध्यान भटकाने की कोशिश कर रही है.

कांग्रेस नेता रणदीप सुरजेवाला कहते हैं कि सजातीय राजनीति धर्म विशेष के लोगों पर लक्ष्य साधने और उन पर जुल्म करने के कुटिल षडयंत्र को दर्शाती है. वह कहते हैं कि यह एजेण्डा धार्मिक आधार पर लोगों का ध्रुवीकरण करने और उन्हें आपस में बांटने वाला है. उन्होंने कहा कि मेवाती वे लोग हैं जिन्होंने भारत के बंटवारे के बाद महात्मा गांधी और जवाहर लाल नेहरू के कहने से पाकिस्तान जाने से इनकार कर दिया था.

इस क्षेत्र में साम्प्रदायिक संघर्ष की कोई घटना अभी तक नहीं हुई है. एक सामाजिक संगठन अनहद ने मेवात से इकट्ठा किए गए नमूनों के परीक्षण पॉजीटिव आने की मीडिया रिपोर्ट्स पर कई सवाल उठाए हैं. संगठन के अनुसार पता चला है कि एलएलआरयू की जिस प्रयोगशाला में ये कथित परीक्षण किए गए, उस प्रयोगशाला को हरियाणा गोवंश संरक्षण और संर्वद्धन अधिनियम-2015 के तहत राज्य सरकार ने मान्यता दी है. यह भी कहा गया है कि जिस कथित प्रयोगशाला द्वारा रिपोर्ट दी गई है, वह तो पशु कल्याण के कानूनी उद्देश्यों के लिए वैध है. और एलएलआरयू के जिस विभाग की प्रयोगशाला (जहां यह परीक्षण किया गया और रिपोर्ट जारी की गई) में जांच कराई गई, वह क्या जांच करने में सक्षम है?

क्या प्रयोगशाला के डिपार्टमेन्ट हेड को जांच के परिणामों से अवगत कराया गया? संगठन ने यह भी कहा है कि जहां तक तथ्यों का सवाल है, तो विश्वविद्यालय में किसी भी अधिकारी को यह सुनिश्चित करने के लिए पदस्थापित ही नहीं किया गया है कि नमूनों की जांच और उन पर जो पर्ची चिपकाई जा रही है, वह ठीक है या नहीं.

न्यूज चैनलों और अखबारों को बयान जारी करने के लिए राज्य सरकार से कोई अनुमति भी नहीं ली गई. इस पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं कि जांच परिणामों की सच्चाई को लेकर ऐसी खबरों के प्रकाशन के बाद कोई भी अशोभनीय घटना होती है तो उसके लिए कौन सा अधिकारी जिम्मेदार है.

पूर्व मुख्यमंत्री भुपिन्दर सिंह हुड्डा कहते हैं कि बिरयानी के नमूनों को एकत्रित करने और इस तरह की रिपोर्ट्स कि नमूने पॉटीटिव आए हैं, के मुद्दे पर कोई भी बवाल होता है तो उसके लिए पूरी तरह से राज्य सरकार जिम्मेदार होगी.

First published: 10 September 2016, 13:57 IST
 
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