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एक महिला के लिए सिर्फ मुस्लिम होना काफी नहीं...

लमत आर हसन | Updated on: 10 February 2017, 1:48 IST
QUICK PILL
  • कुछ दिन पहले मुझसे कलमा पढ़ने को कहा गया. मेरी मुस्लिम पहचान पुष्ट करने की कोशिश की गई मसलन मैं मुस्लिम पैदा हुई थीं या शादी के बाद इस्लाम कबूल किया. मुझसे मेरे नाम का मतलब पूछा गया जो कि अरबी का शब्द है और उसका अर्थ शायद पूछने वाले को भी नहीं पता होगा.
  • सिर्फ मुस्लिम होना काफी नहीं है, एक महिला को मुस्लिम होने के लिए और भी बहुत कुछ साबित करना पड़ता है. जमाने का बोझ मानो कम था जिसे अब ऑनलाइन और सोशल साइट्स की दुनिया पूरी कर रही है. यहां एक मुसलिम महिला को उपदेश देने के लिए हर कोई तैयार बैठा है.

मुस्लिम होना आसान नहीं है. जबकि मैं धार्मिक आचार-विचार वाली महिला हूं, दिन में पांच वक्त का नमाज अदा करती हूं और लगभग हर दिन कुरान भी पढ़ती हूं. लेकिन मैं एक रूढ़िवादी मुस्लिम नहीं होना चाहती. मैं इसके खिलाफ हूं. ढंके हुए सिर वाली मुस्लिम महिला का स्टीरियोटाइप मुझे नहीं समझ आता.

'क्या आप मुसलमान हैं?' यह शब्द सामने वाले के दिमाग में आने औऱ जुबान से निकलने के पहले ही मैं इसका अनुमान लगा सकती हूं.

अतीत में मुझसे अपनी मुस्लिम पहचान साबित करने के लिए कलमा पढ़ने को कहा जा चुका है. मुझसे पूछा जाता है कि मैं मुस्लिम पैदा हुई थीं या शादी के बाद इस्लाम कबूल किया. मुझसे मेरे नाम का अर्थ बताने को कहा गया. यह अरबी का शब्द है जिसका मतलब शायद पूछने वाला भी नहीं जानता होगा.

20 साल का एक मुस्लिम ड्राइवर पिछले हफ्ते मुझसे नौकरी मांगने आया. वह किसी मुस्लिम के यहां ही काम करना चाहता था. और फिर ट्रायल ड्राइव के दौरान मेरा यह कहकर मजाक उड़ाने की कोशिश की, 'आपने कुरान शरीफ पढ़ा-वढ़ा है या नहीं.'

सालों साल अपराधबोध में रहने के बाद अब मैंने जवाब देना और खड़ा होना सीख लिया है. मैंने उससे कहा मैं कुरान को किरात (कुरान पढ़ने का तर्कसंगत तरीका) के तरीके से पढ़ सकती हूं और मुझे जामिया हफ्सा की एक अलीमा से पढ़ने का अनुभव हासिल है.

ऑनलाइन क्रूरता

मानो असल दुनिया की बुराइयां पर्याप्त नहीं थी लिहाजा अब ऑनलाइन की आभासी दुनिया भी उपदेशक का काम करने लगी है. यहां मुझे सिखाया जाता है कि अंग्रेजी में इंशाअल्लाह कैसे बोले, या फिर शुभानअल्लाह में कहां एपॉस्ट्रॉफी कहां लगाए, या कि मुझे खुदा हाफिज़ की बजाय अल्लाह हाफिज क्यों बोलना चाहिए. या फिर जब मैं किस को शुक्रिया अदा करुं तो मुझे जज़ाकलाह बोलना चाहिए.

ऐसी कई बेहूदा चीजें हैं जहां मुझे 'आमीन' लिख कर पुण्य कमाने की सीख दी जाती है. इसके अलावा व्हाट्सएप पर मुझे दोस्तों और परिवारवालों की तरफ से ऐसे कई इस्लामी संदेश मिलते हैं जिसमें मुझसे उस मैसेज को तत्काल 11 बार फॉरवर्ड करने की अपील की जाती है और फिर मेरी जिंदगी में वांछित बदलाव आने का भरोसा दिया जाता है.

डिस्को हिजाबी

मैं अब ऑनलाइन उपदेशकों की आदी हो चुकी हूं. मैंने एक फेसबुक पर एक ऐसा फतवा देखा है जो महिलाओं के हिजाब से जुड़ा है. उले मुंह औऱ ढंके सिर वाली महिलाओं के लिए है यह. ऐसी महिलाओं को डिस्को हिजाबी बुलाया जाता है. वो महिलाएं जो पैंट या लंबे स्कर्ट के साथ अपने सिर को ढंकती हैं. सिर को ढकना तब तक इस्लामी नहीं है जब तक कि इसे पारंपरिक काले बुर्के में न ओढ़ा जाय.

लेकिन अगर पुरुष इस्लामिक ड्रेसकोड का उल्लंघन करें तो किसी को दिक्कत नहीं होती. इस्लाम में पुरुष और महिला दोनों के लिए ड्रेसकोड निर्धारित है. लेकिन मैंने आज तक एक भी ऐसे व्यक्ति को नहीं देखा जिसे पुरुषों के पहनावे से दिक्कत हो.

'आस्थावान पुरुषों को अपनी निगाह नीची रखते हुए अपने सम्मान की हिफाजत करनी चाहिए' इसी तरह 'आस्थावान महिलाओं को भी अपनी निगाह नीची रखते हुए अपने सम्मान की हिफाजत करनी चाहिए.'

अगर आपकी मंशा किसी महिला या पुरुष को आकर्षित करने की नहीं है तो यह काम पैंट या लंबा स्कर्ट्स पहन कर भी किया जा सकता है. इसके लिए महिलाओं को कम से कम बुरका पहनने की जरूरत नहीं होनी चाहिए. पूरा विचार अपने आपको सलीके से रखने का है. सभी समाज धर्म और और संस्कृति की दीवार से ऊपर उठते हुए एक ऐसे नियम का अनुसरण करते हैं जिसे कहीं लिखा नहीं गया है.

इस्लाम पूरी तरह से नीयत और मंशा के बारे में है. ऐसा लगता है कि जिन्हें इस्लाम की फिक्र है वह इसे भूल गए हैं.

रमजान की विशेष प्रार्थना के दौरान जब हाफिज साहब सूरा पढ़ते हुए गलतियां करते हैं तब मुझे उनको टोकने की इजाजत क्यों नही है? या फिर वो इमाम साहब जो घर कुरान पढ़ने के लिए आते हैं.

कुरान के 30 अध्यायों को पढ़ने का प्रतीकात्मक रिवााज क्यों जरूरी है? या फिर छोटे बच्चों को इसे पढ़ने के लिए क्यों मजबूर किया जाता है जबकि वह इसे नहीं करना चाहते हैं? दबाव में 30 पन्ना पढ़ने की बजाय तरीके से मन लगाकर एक अध्याय पढ़ना बेहतर नहीं होगा?

समस्याओं का अंबार

जब मैं गली के कुत्तों को कुछ खिलाने के लिए कार से बाहर निकली तो मेरे होने वाले ड्राइवर ने फिर सलाह दी, 'कुत्ते नापाक होते हैं.' 

मैंने दो कुत्ते पाल रखे हैं और मैं यह बात कई बार सुन चुकी हूं. यह तब है जबकि कुरान में एक अध्याय है जिसमें कुत्तों को सहयोगी बताया गया है. हदीथ में भी एक वेश्या को इसलिए माफ कर दिया गया क्योंकि उसने एक प्यासे कुत्ते को पानी पिलाया था.

मुझ पर पेडिग्री खरीदने का अपराध नहीं लगाया जा सकता. मैं सड़क से दो छोटे खूबसूरत पिल्लों को उठाकर लाई थी. एक तो जानलेवा पार्वो वायरस से संक्रमित हो चुका था. मैंने उसकी खूब देखभाल की. मैं अब उन्हें बाहर नहीं छोड़ सकती क्योंकि मुझे यह अपराध लगता है.

मैं एक आलिमा (इस्लामी विद्वान) की देखरेख में बड़ी हुई हूं जो शायद भारत की पहली महिला यूनानी चिकित्सक हैं और कुत्तों को अपने घर में पालती हैं. वह एक मस्जिद के भीतर मदरसा चलाती हैं और उन्होंने लाखों मुस्लिम लड़कियों को शिक्षित किया.

कुत्ते आज्ञाकारी बच्चों की तरह उनके दरवाजे पर इंतजार किया करते थे और वह उन्हें खिलाती हुए उन्हें नाम के बाद 'मियां' जोड़ दिया करती थीं. कई सालों तक दोषी की तरह रहने के बाद मैंने उनसे बात की. उन्होंने कहा कि कुत्तों को पालने में कोई बुराई नहीं है और अल्लाह केवल मंशा देखता है. मैंने ड्राइवर को हदीथ के बारे में विस्तार से बताया और फिर वह चुप हो गया.

लेकिन मैं उसके टेस्ट में फेल हो गई.

First published: 4 January 2016, 12:52 IST
 
लमत आर हसन @LamatAyub

संवाददाता, कैच न्यूज़

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