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क्या बंगाल में बह रही है बदलाव की बयार?

शौर्ज्य भौमिक | Updated on: 28 April 2016, 22:33 IST
QUICK PILL
  • अभी एक पखवाड़ा पहले तक ज्यादातर लोग यह मान रहे थे कि राज्य में तृणमूल 170 से अधिक सीटें जीत कर स्पष्ट बहुमत हासिल करेगी लेकिन मतदान का चौथा चरण बीतते-बीतते लोग परिणामों को लेकर अनिश्चित दिखाई दे रहे हैं.
  • इस बार इन क्षेत्रों में चुनाव बिल्कुल स्वतंत्र और निष्पक्ष तरीके से आयोजित हो रहे हैं और मतदाताओं को धमकी देने के अलावा बूथ कैप्चरिंग के प्रयासों को पूरी तरह से नाकाम कर दिया गया है.

कई लोग बंगाल विधानसभा चुनावों की घोषणा होने के साथ ही इस निष्कर्ष पर पहुंच गए थे कि ममता बनर्जी दोबारा चुनाव जीत कर अपना परचम फहराएंगी. लेकिन हाल के दिनों में राज्य के माहौल में एक बदलाव देखने को मिला है.

अभी एक पखवाड़ा पहले तक ज्यादातर लोग यह मानकर चल रहे थे कि राज्य में सत्तारूढ़ टीएमसी 170 से अधिक सीटें जीत कर स्पष्ट बहुमत हासिल करेगी लेकिन मतदान का चौथा चरण बीतने के बाद आप जिस भी व्यक्ति के बात करें वही परिणामों को लेकर अनिश्चित दिखाई पड़ रहा है. 

यह तो मुकाबला ‘बेहद कड़ा’ रहने की संभावना जताई जा रही है या फिर ‘तृणमूल की सीटों में भारी कमी’ होने की बात हर किसी की जुबान पर है. साथ ही यह अफवाह भी उड़ी हुई है कि कांग्रेस और सीपीआई (एम) का पीपुल्स गठबंधन इन चुनावों में सबको चौंकाने जा रहा है.

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स्थानीय मीडिया की खबरों के अनुसार टीएमसी के वोट प्रबंधक अपनी स्थिति को लेकर निश्चित नहीं दिखाई दे रहे हैं. अफवाहों पर यकीन करें तो ऐसा लगता है कि नौकरशाही ने समय के साथ अपनी निष्ठा बदल ली है और सरकारी मशीनरी अब टीएमसी के आदेशों का पालन नहीं कर रही है जिसके चलते टीएमसी के मजबूत माने जाने वाले गढ़ों में बिल्कुल स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव हो रहे हैं.

इस संवाददाता ने जब राज्य का दौरा किया तो काफी समय बाद वाम कार्यकर्ताओं और समर्थकों को स्पष्ट रूप से पिछले चुनावी मुकाबलों से कहीं अधिक उत्साहित मुद्रा में बाहर निकलते देखा. 

अब स्थितियां बदली दिख रही हैं. बर्धमान, बीरभूम, उत्तरी 24 परगना और हावड़ा जिलों को टीएमसी का बेहद मजबूत गढ़ माना जाता है

दूसरी तरफ टीएमसी के पास अपने पक्ष में केवल एक ही मजबूत पक्ष है और वह है ममता द्वारा किया गया राज्य का सर्वांगीण विकास. ऐसा प्रतीत हुआ कि टीएमसी को इन चुनावों में अपने विरोधियों के मुकाबले मामूली बढ़त मिली हुई है.

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कैच ने बुधवार को जमीनी स्तर पर राजनीति को कवर करने वाले इलेक्ट्राॅनिक मीडिया के पत्रकारों सहित सरकार के साथ मिलकर काम करने वाले सामाजिक वैज्ञानिकों, वकीलों, शिक्षकों और सरकारी अधिकारियों सहित कई लोगों से बातचीत की.

उनमें से कुछ का कहना था, ‘भ्रमित’, ‘मुकाबला बेहद कड़ा रहेगा’, ‘कुछ भी कहना मुश्किल है’. लेकिन सब एक बात पर एकमत दिखे कि टीएमसी बाकी सबकी तुलना में लाभ की स्थिति में है.

अब स्थितियां बदली दिख रही हैं. बर्धमान, बीरभूम, उत्तरी 24 परगना और हावड़ा जिलों को टीएमसी का बेहद मजबूत गढ़ माना जाता है. 2011 के विधानसभा चुनावों के बाद से इन जिलों की लगभग सभी सीटों पर पार्टी जीतती आ रही है.

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लेकिन इस बार इन क्षेत्रों में चुनाव बिल्कुल स्वतंत्र और निष्पक्ष तरीके से आयोजित हो रहे हैं और मतदाताओं को धमकी देने के अलावा बूथ कैप्चरिंग के प्रयासों को पूरी तरह से नाकाम कर दिया गया है.

चुनाव आयोग ने कई कड़े कदम उठाते हुए टीएमसी के कद्दावर नेता अणुब्रत मंडल को नजरबंद करने के अलावा उत्तरी 24 और हावड़ा जिलों में धारा 144 लगा दी गई है. साथ ही आयोग ने 30 से भी अधिक आला अधिकारियों जिनमें जिलाधिकारी, पुलिस कप्तान और स्थानीय थानों के थानाध्यक्ष शामिल हैं का स्थानांतरण करने के अलावा स्थानीय अपराधियों को या तो मुचलके में पाबंद किया है या फिर उन्हें इलाका छोड़कर जाने को मजबूर कर दिया है.

यहां तक कि पहली बार राज्य के पुलिस बल को किसी भी प्रकार के दबाव के आगे न झुकते हुए स्थानीय टीएमसी नेताओं को लाठियों के बल पर खदेड़ते हुए देखा गया. इसे देखते हुए इस धारणा को बल मिल रहा है कि राज्य की नौकरशाही सत्ता में संबावित बदलाव की बयार को सूंध रही है.

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पूर्वी मिदनापुर में तैनात राज्य सरकार के एक अधिकारी कहते हैं, ‘‘हम चुनाव आयोग के जबर्दस्त दबाव में हैं. हम एक स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव करवाने के लिये रात-दिन काम कर रहे हें.’’ टीएमसी के मजबूत गढ़ माने जाने वाले पूर्वी मिदनापुर में पांच जुलाई को मतदान होना है.

वे आगे कहते हैं, ‘‘इस जिले की स्थिति देखने पर मुकाबला बराबरी का लग रहा है. सिर्फ शुभेंदु अधिकारी की सीट सुरक्षित है.’’

हमें सरकार में होने वाले किसी भी प्रकार के परिवर्तन की बिल्कुल परवाह नहीं है और हमें आदेश है कि हम किसी भी कीमत पर हर प्रकार से स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव होना सुनिश्चित करें

क्या यहां बदलाव की बयार बह रही है? यह पूछने पर वे कहते हैं, ‘‘देखिये अगर सिर्फ सरकारी कर्मचारी इन चुनावों में मतदान करते हें तो यह निश्चित है कि उनमें से 95 प्रतिशत टीएमसी के विरोध में मत देंगे. टीएमसी ने सत्ता में आने के बाद नियम बना दिया है कि हमें उनके हर आदेश का सिर्फ पालन करना है. उनके भ्रष्टाचार का खामियाजा हमें भुगतना पड़ता है. लेकिन हमारी नौकरी स्थायी है जबकि सरकार सिर्फ 5 वर्षों के लिये है.’’

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इसके अलावा कैच ने दक्षिण 24 परगना में तैनात एक उप-प्रभागीय पुलिस अधिकारी से भी बात की जिनका विशेष रूप से कहना था, ‘‘हम 30 अप्रैल को किसी भी प्रकार का अनाचार नहीं होने देंगे. हमें सरकार में होने वाले किसी भी प्रकार के परिवर्तन की बिल्कुल परवाह नहीं है और हमें आदेश है कि हम किसी भी कीमत पर हर प्रकार से स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव होना सुनिश्चित करें.’’

जाहिर है कि ऐसे बयान विपक्ष का हौसला बढ़ाने वाले साबित होते हैं जो बीते चुनावों में टीएमसी द्वारा लगातार किये जा रहे वाइटवाॅश को लेकर उसपर अनुचित साधनों का प्रयोग करने के आरोप लगाते आए हैं.

इस बात में कोई शक नहीं है कि चुनाव आयोग का पूरा दबाव है. लेकिन पुलिस द्वारा टीएमसी के गुंडों की पिटाई चुनाव आयोग का दबाव नहीं है

रुख में परिवर्तन की तरफ इशारा करते हुए एक टीवी पत्रकार कहते हैं, ‘‘पुलिस बल के मनोबल में अचानक ही काफी इजाफा हुआ है जो अपने आप में बहुत स्पष्ट संकेत देता है. इसके अलावा आईबी की खुफिया रिपोर्ट भी राज्य में पीपुल्स गठबंधन की जीत की आशंका जता रही है और राज्य की खुफिया एजेंसियां भी मुकाबले को बिल्कुल बराबरी का आंक रही हैं. यहां तक कि अगर टीएमसी विजयी रहती है तो भी उसके लिये पांच साल शासन करना बेहद मुश्किल होगा.’’

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प्रेसीडेंसी विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के व्याख्याता ज़ाद महमूद कहते हैं, ‘‘इस बात में कोई शक नहीं है कि चुनाव आयोग का पूरा दबाव है. लेकिन पुलिस द्वारा टीएमसी के गुंडों की पिटाई चुनाव आयोग का दबाव नहीं है. इसके अलावा वरिष्ठ नौकरशाहों द्वारा विपक्ष को जानकारियां लीक करने में भी चुनाव आयोग के दबाव की कोई भूमिका नहीं है.’’

हालांकि सरकारी अधिकारी रुख में हो रहे इस परिवर्तन को किसी भी सूरत में खुलकर स्वीकार नहीं करेंगे लेकिन पश्चिम बंगाल की नौकरशाही राज्य सरकार से कदमताल मिलाकर चलने के लिये खासी मशहूर है.

कलकत्ता हाईकोर्ट में कार्यरत और सरकार के बेहद करीबी एक वकील बदलाव की संभावनाओं के बारे में पूछे जाने पर कहते हैं, ‘‘जी हां. लेकिन सिर्फ मध्यम स्तर के नौकरशाहों के बीच. वरिष्ठ स्तर के अधिकारी काफी फूंक-फूंककर कदम रख रहे हैं और साथ ही यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि बदलाव होने की सूरत में उन्हें कोई समझौता न करना पड़े. फिलहाल वे सिर्फ खुद को गलत फैसले लेने से बचा रहे हैं.’’

First published: 28 April 2016, 22:33 IST
 
शौर्ज्य भौमिक @sourjyabhowmick

संवाददाता, कैच न्यूज़, डेटा माइनिंग से प्यार. हिन्दुस्तान टाइम्स और इंडियास्पेंड में काम कर चुके हैं.

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