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बीएचयू वीसी: साइबर लाइब्रेरी में छात्र पोर्न देखते हैं, क्या जरूरत है 24 घंटे खोलने की

आवेश तिवारी | Updated on: 31 May 2016, 7:43 IST
QUICK PILL
बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. गिरीश चंद्र त्रिपाठी पद संभालने के बाद से लेकर अब तक लगातार विवादों में रहे हैं. इलाहाबाद में पढ़े लिखे त्रिपाठी के कुलपति के रूप में आगमन के बाद से ही कैंपस का माहौल लगातार बिगड़ता जा रहा हैं. कभी शिक्षक तो कभी छात्र उनके विरुद्ध नारे लगा रहे हैं, गिरफ्तारियां हो रही हैं. बीते डेढ़ सालों में तीसरी बार पुलिस ने कैंपस में प्रवेश किया है. केवल छात्र संगठन ही नहीं बल्कि अब राजनैतिक दल भी कुलपति की बर्खास्तगी की मांग कर रहे हैं. ऐसे में साइबर लाइब्रेरी से शुरू हुआ विवाद अब बड़ी राजनीतिक लड़ाई में तब्दील होता जा रहा है. कुलपति प्रो गिरीश चंद्र त्रिपाठी से हुई बातचीत के अंश:

बीएचयू में इतना सब कुछ हो रहा है. विश्वविद्यालय के फैसलों के खिलाफ़ छात्र खड़े हो गए हैं, लेकिन क्या ऐसा नहीं लग रहा है कि कुलपति और मीडिया व कुलपति और छात्रों में संवाद की कमी है?

कहां है कमी? कौन ऐसा कह रहा है? कहीं कोई कमी नहीं है. बल्कि मैं तो ऐसा कह रहा हूं कि इस विश्वविद्यालय में अब तक सबसे ज्यादा संवाद रखने वाले कुलपतियों में मैं हूं. आप लोग अखबारों के लिए काम करते हैं, बताइए अगर कहीं संवादहीनता हो.

छात्रों की साइबर लाइब्रेरी चौबीस घंटे खोलने की मांंग पर आपकी राय क्या है, वह जायज़ है या नाजायज़ है?

पहली बात तो यह कि वह विद्यार्थियों की मांग नहीं है. आपको यदि जानकारी होगी तो पता होगा कि जो लोग अनशन पर बैठे हैं, वे वर्ष भर एक दिन भी लाईब्रेरी नहीं गए. वे ऐसे विद्यार्थी हैं, जो कभी लाइब्रेरी गए ही नहीं. ये पॉलिटिकल लोग हैं जो इस आंदोलन को भड़का रहे हैं.

मुझे तो लगता है कि इस बारे में आप मुझसे अधिक जानते होंगे. वरना बताइये कि आम आदमी पार्टी के लोगों को कैम्पस में आने की क्या ज़रुरत थी? आपको अपना राजनीतिक आन्दोलन चलाना है तो सड़क पर चलाइये. 

आप कैम्पस के भीतर माहौल क्यों खराब कर रहे हैं? संजय सिंह भी प्रकट हो गए? मीडिया के लोग भी हैं. मैं आपसे भी कह रहा हूं कि यह मीडिया की स्वतंत्रता है, उस स्वतंत्रता का आनंद उठाना चाहिए. लेकिन मीडिया भी देश का हिस्सा है, जब देश ही नहीं बचेगा तो उसकी स्वतंत्रता भी नहीं बचेगी.

यहां हम छात्रों की बात कर रहे हैं आप उसे देश से जोड़ रहे हैं. छात्रों के मुद्दे में देश कहां से आ गया?

क्यों नहीं देश की बात करेंगे?

मुद्दा लाइब्रेरी का है. ये मुद्दा जितना राजनीतिक होता जा रहा है, उतना ही अराजनीतिक भी है. आपका यह कहना कि देश ही नहीं बचेगा, इससे क्या मतलब निकलेगा?

देश की बात इसलिए आयी क्योंकि इसमें पॉलिटिकल पार्टियों के लोग कूद गए. ये विश्वविद्यालय का मुद्दा था. विश्वविद्यालय इसे अपने ढंग से हल कर रहा था, बातचीत हो रही थी. लड़कों से हमारे डीन और डायरेक्टर मिल रहे थे. राजनीतिक पार्टियां बेमतलब कूद गईं.

ये सामान्य विश्वविद्यालय नहीं है, ये एक महापुरुष की तपस्थली है. इसे लिख सकते हैं तो लिखिए

इसका मतलब कैम्पस में राजनीतिक हस्तक्षेप आप रोकना चाहते हैं, ये कैसे करेंगे?

पहले ये बताइये कि ये महिलाएं और लोग टोपी-बैनर लहराते हुए कैम्पस में क्यों घुस रहे थे? क्या साबित करना चाह रहे थे? संजय सिंह हमको बताएं. ये ठीक बात है क्या? और ये भी बताइये कि आप लोग भी इसका समर्थन करते हैं क्या? 

आप लोगों ने इसे बढ़ा-चढ़ा कर छापा. आप लोगों की खबरों को देखकर लग रहा था कि विश्वविद्यालय सुरक्षा के लोगों ने जैसे कोई अपराध कर दिया हो.

एक बात और बताएं! (मालवीय की तस्वीर दिखाते हुए) ये सामान्य विश्वविद्यालय नहीं है, ये एक महापुरुष की तपस्थली है. इसे लिख सकते हैं तो लिखिए. मैं देशभर के विश्वविद्यालयों में जाता रहा हूं, हमने यहां जैसे लड़के कहीं नहीं देखे. यहां के छात्रों के मन में विश्वविद्यालय के प्रति मंदिर का भाव है.

ये कहना गलत है कि मुख्यद्वार पर लड़ाई करने वाले लड़के आरएसएस और बीजेपी के थे. सौ फीसदी गलत है. हमें भी जानकारी है. हमारा भी इंटेलिजेंस सक्रिय था. वे लड़के आम छात्र थे. उन्होंने देखा कि महिलाएं सिक्योरिटी अफसर को मार रही थीं, उनके कपड़े फाड़ रही थीं. उस पर वे आक्रोशित हुए.

हाउ डेयर यू? हमारे कैम्पस के अन्दर आप हमारे सुरक्षाकर्मियों को मार रहे हैं. जब लड़के उस सिक्योरिटी अफसर को बचाने के लिए गए तो उनको भी मारा गया. तब तमाम लड़कों ने मिलकर उन लोगों की पिटाई की.

यानी वे लड़के कहीं से भी एबीवीपी या संघ के नहीं हैं?

अरे भाई फ़ोटोग्राफ हैं. आप पहचानिए कि वे आरएसएस के लड़के हैं या नहीं. विद्यार्थी परिषद के हैं या नहीं.

आप लड़कों द्वारा की गयी इस मारपीट का समर्थन करते हैं?

नहीं, समर्थन तो नहीं करता. लेकिन इस समर्थन के पहले मैं इस बात का विरोध करता हूं कि आप के लोग झंडा-टोपी लगाए कैम्पस के अन्दर घुसे. वैसे भी ये सब इस लेवल के सवाल नहीं हैं कि इसका जवाब कुलपति दे.

मैं साफ कहता हूं कि विश्वविद्यालय को पॉलिटिक्स का प्लेटफॉर्म नहीं बनाना चाहिए. ये तो उम्मीद सभी करते हैं कि संस्थाएं विद्यार्थियों की अच्छी खेप तैयार करेंगी. संस्थाएं यह काम तभी कर सकेंगी जब पक्षधर विचारों का दखल कम से कम होगा. 

आप आइये, चरित्र पैरों के नीचे कुचलिए और फिर लोग कहेंगे कि संस्थाएं अच्छे लोग तैयार नहीं कर रही हैं. आप मीडिया वाले हैं बताइए, मैं गलत कह रहा हूं? आप मेरी मदद करिए. ईश्वर साक्षी है कि यदि मैं किसी भी पार्टी की पॉलिटिक्स कर रहा हूं तो मैं यहां एक मिनट भी न रहूं.

केजरीवाल आ रहे हैं, तीस्ता सीतलवाड़ आ रही हैं. आप कह रहे हैं कि ये मुद्दा बहुत छोटा था. ये मुद्दा प्रायोजित है

आप बार-बार मीडिया को क्यों बीच में ला रहे हैं. कैंपस में गड़बड़ी है तो आपसे सवाल तो होगा ही.

सुनिए, अगर आपको छापना है तो छापिए. मैं संजय सिंह को जानता हूं. संजय सिंह का बैकग्राउंड क्या है? वो इलाहाबाद के हैं, इसलिए मैं जानता हूं. बेहतर होगा कि वो मुझसे ज्यादा न उलझें. मैं उनसे बहस करने को तैयार हूं. उनका चरित्र मुझे पता है. मुझे नैतिकता न सिखाएं.

कहा जा रहा है कि अब अरविन्द केजरीवाल भी आ रहे हैं...

केजरीवाल आ रहे हैं, तीस्ता सीतलवाड़ आ रही हैं. आप कह रहे हैं कि ये मुद्दा बहुत छोटा था. ये मुद्दा प्रायोजित है. विकास सिंह यहां अनशन पर बैठा है. उसको पढ़ाई-लिखाई से कोई मतलब नहीं है. 

पांच-छः साल से शोध कर रहा है. वो एनएसयूआई का पदाधिकारी है. वह पूरे वर्ष में सिर्फ एक दिन 10 बजकर 45 मिनट पर लाईब्रेरी गया है, वह भी उस दिन जिस दिन आंदोलन शुरू हुआ.

विद्यार्थियों के आने-जाने का समय वहां लिखा जाता है. विकास सिंह के साथ जो लड़के अनशन पर बैठे हैं, वे बीए के छात्र हैं. आप बताइए कि बीए के छात्रों को चौबीस घंटे लाईब्रेरी की क्या ज़रुरत है.

साइबर लाइब्रेरी में आप आधे-एक घंटे बैठिये, आपके सारे काम हो जाएंगे. वहां रात भर क्या होगा? मेरा कहना है कि इस आंदोलन के पीछे इन लड़कों का मस्तिष्क नहीं है. विश्वविद्यालय को अशांत करने की सोची-समझी रणनीति है.

पूरे आंदोलन के प्रायोजित होने की बात जो आप अभी कह रहे हैं, वह बात पहले नहीं आयी. अभी ही क्यों आ रही है?

छात्रों को रोजाना विश्वविद्यालय अपनी बात समझा रहा था. उन्हें हम कह रहे थे कि यह जो तुम मुद्दा उठा रहे हो, वह कोई मुद्दा है ही नहीं. मेरे ऊपर यह आरोप है कि मैं लोगों से ज्यादा मिलता हूं. 

आप पहले यदि आते होंगे तो आप जानते होंगे कि बीएचयू का वाइस-चांसलर कभी किसी से नहीं मिलता है. मैंने छात्रों तक को अलग समय दिया हुआ है. अब भी कोई कह रहा है कि कम्यूनिकेशन गैप हो रहा है तो मैं क्या कहूं?

आपके 18 महीनों के अब तक के कार्यकाल में कम से कम तीन बार कैम्पस में पुलिस बुलाई गयी. ऐसा क्यों?

पुलिस अपने से नहीं आती. पुलिस को बुलाना पड़ता है. पुलिस के पास इतनी फुरसत नहीं कि वह अपने से यहां आए, और न उन्हें दिलचस्पी है. जब हमारे लोग प्रयास करके हार गए, तब मजबूरी में पुलिस बुलानी पड़ी.

पिछली बार दो हॉस्टलों में लड़ाई हुई थी तभी मैंने यहां कार्यभार संभाला था. मैंने पुलिस से कहा कि आप यहां से जाइए. उन्होंने कहा कि अब भी दिक्कत हो सकती है. फिर भी मैंने कहा कि आप लोग जाइए, मुझे भरोसा है कि कुछ नहीं होगा. हुआ भी नहीं, लड़कों ने हमारा साथ दिया.

जब-जब हमने पुलिस बुलाई अंतिम विकल्प के रूप में बुलाई.

मेरे सामने जब मांग आई तो लड़कियां नहीं आयीं. बात आयी कि लड़के ये मांग लेकर आ रहे हैं

क्या चुनाव इस आन्दोलन की वजह है?

देखिए, बीएचयू एक बड़ी यूनिवर्सिटी है. ये एशिया का सबसे बड़ा रेजिडेंशियल कैम्पस है. यहां हर समय कम से कम एक लाख लोग मौजूद रहते हैं. यहां छोटी से छोटी घटना किसी भी समय बड़ा रूप ले सकती है.

जिस दिन इन लड़कों को निलंबित किया गया था, अगर ये उसी दिन उठ गए होते तो आम आदमी पार्टी या तीस्ता सीतलवाड़ को आने का मौक़ा न मिलता, न ही इतना माहौल खराब होता. 

एनजीओ की फंडिंग बंद हो गयी तो अब तीस्ता जी क्या करें? कोई काम तो है नहीं. आप इसे छापिएगा, मैं कह रहा हूं. मैं तीस्ता जैसे लोगों से डरता नहीं हूं?

आपके कई ऐसे बयान अवांछित विवाद की वजह बने हैं. आपका एक बयान आया कि रात को दस बजे के बाद छात्राओं को मोबाइल पर बात नहीं करनी चाहिए. फिर आपने कहा कि रात को निशाचर घूमा करते हैं.

कब कहा मैंने ऐसा? कभी भी नहीं कहा. जो मेरा अधिकृत बयान गया है, आप उन्हें निकालकर देखिए. जो वेबपोर्टल हैं, वे विज्ञापन और हिट बटोरने के लिए ऐसे बयान देते रहते हैं.

मैंने लड़के और लड़कियों दोनों के लिए एक काउंसिलिंग और गाइडेंस सेल बनाया है. यहां 18000 बच्चे पढ़ते हैं. यहां कई तरह की घटनाएं हो रही हैं. लेकिन मैंने ये सब नहीं कहा कि फोन पर बात मत करो.

एक घटना है, मेरे सामने एक मांग रखी गयी कि पिंजड़ा तोड़. आपको पता है पिंजड़े का मतलब हॉस्टल से है. हमारे यहां नियम है कि रात आठ बजे के बाद लड़की यदि हॉस्टल से बाहर जाती है तो उसे वार्डन की इजाज़त लेकर जाना होगा. उन्हें ये भी बंदिश लग रही है.

मेरे सामने जब मांग आई तो लड़कियां नहीं आयीं. बात आयी कि लड़के ये मांग लेकर आ रहे हैं. आज लड़कों को ये मांग सही लग रही है कि लड़कियां पिंजड़ा तोड़कर बाहर आएं और हमारे साथ घूमें. 

कल को ये लड़के पिता बनेंगे. उनकी लड़कियां भी घूमेंगी, तब ये लोग समझेंगे कि इनकी मांगें कितनी जायज़ हैं, कितनी नाजायज़. पिता बनने पर नहीं समझेंगे तो दादा-नाना बनेंगे तब तो समझ में आएगी.

मैं इस कैम्पस का कुलपति हूं, कोई ऐसी चीज़ जो नियम विरुद्ध है, वह मैं नहीं करूंगा. यदि ऐसा दंडनीय है तो मैं दंड भुगतने के लिए तैयार हूं.

लाइब्रेरी का मुद्दा पहले ही हल किया जा सकता था?

हमने बहुत कोशिश की थी. हम खुद भी गए थे. हमने कहा कि रात भर लाइब्रेरी खुलेगी और चार-पांच लोग पढ़ने आएंगे. क्या फायदा होगा? उस लाइब्रेरी का दो लाख प्रतिदिन का खर्च है. लड़के बदमाश हैं, कॉपर वायर तोड़ ले जाते हैं, माउस चुरा ले जाते हैं, हार्डडिस्क निकालकर ले जाते हैं. 

पेन ड्राइव में अश्लील फ़िल्में देखते हैं. इन सबसे अलग उनके वहां रहने से एकदम दूसरी समस्या पैदा हो सकती है कि वे वहां क्या कर रहे हैं?

क्या होगा आगे?

देखिए, लाइब्रेरी तो नहीं खोलेंगे. आप ही बताइये? मैं कुछ ही समय के लिए यहां हूं. मेरे बाद कोई आएगा तो हो सकता है कि खोल दे. लेकिन इससे कोई एकेडमिक लाभ नहीं मिलना है. 

अब कैम्पस को डिस्टर्ब करना है, तो कोई तो मांग होगी इनकी. आंदोलन कर रहे लड़के ये क्यों नहीं कह रहे हैं कि मुख्य लाइब्रेरी खुलवाइये? साइबर लाइब्रेरी ही खुलवाने का क्या मकसद है? यहां हॉस्टल कम है. छात्रों की रहने की जगह कम पड़ रही है, विभागों में जगह कम है. वहां पैसे खर्च करूं या इनकी अय्याशी पर खर्च करूं? पूरा कैम्पस वाई-फाई हो रहा है, हॉस्टलों में भी इंटरनेट सुविधा सही की जा रही है, क्या करेंगे साइबर लाइब्रेरी का?

First published: 31 May 2016, 7:43 IST
 
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