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सरकार को क्यों चाहिए एक और मीडिया निगरानी एजेंसी!

कैच ब्यूरो | Updated on: 24 February 2016, 21:13 IST
QUICK PILL
  • खबरों के मुताबिक केंद्र सरकार मीडिया कंटेंट की निगरानी करने के लिए नेशनल मीडिया एनालिटिक्स सेंटर बनाने की योजना बना रही है.
  • पूर्व सूचना एंव प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी का कहना है कि इस तरह की कोशिशों से सरकार की असुरक्षा की भावना की पोल खुलेगी और इसका गलत संदेश जाएगा. उन्होंने कहा, \'अगर इस कोशिश का मकसद मीडिया को डराना और धमकाना है तो हम निश्चित तौर पर इसका विरोध करेंगे.\' 

ऑर्वेलियन समाज की दिशा में कदम आगे बढ़ाते हुए केंद्र सरकार नेशनल मीडिया एनालिटिक्स सेंटर (एनएमएसी) के साथ एक और मीडिया सेल खोलने की योजना बना रही है ताकि 'भड़काऊ और आक्रामक' कंटेंट के मामले दूसरे पक्ष को सामने रखा जा सके. 

एक बड़े अखबार में छपी रिपोर्ट के मुताबिक प्रस्तावित एनएमएसी 'का निर्माण ब्लॉग्स, टीवी और अखबारों के पोर्टल्स के साथ फसेबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यू-ट्यूब समेत अन्य माध्यमों की निगरानी के लिए किया जाएगा.'

रिपोर्ट के मुताबिक एनएमएसी प्रस्ताव दिल्ली स्थिति इंद्रप्रस्थ इंस्टीट्यूट ऑफ इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी के प्रोफेसर पोनुरंगनम कुमारगुरु द्वारा बनाए गए सॉफ्टवेयर पर आधारित है जिसकी मदद से कंटेंट की निगरानी की जाएगी. इस मामले में हमारी प्रोफेसर से बातचीत नहीं हो पाई. 

गृह मंत्री के वरिष्ठ अधिकारी कुलदीप सिंह धतवालिया ने कैच से कहा, 'फिलहाल यह केवल विचार के स्तर पर है.' हालांकि सरकार की यह कोशिश गंभीर सवाल पैदा करती है क्योंकि इसका संबंध केवल एक प्रक्रिया से नहीं बल्कि सरकार की मंशा को लेकर भी है.

पूर्व सूचना एवं प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी ने कहा, 'मेरे कार्यकाल में हमने न्यू मीडिया सेल का गठन किया था ताकि सरकार के विचारों को सोशल मीडिया पर प्रमुखता से रखा जा सके.' तिवारी ने कहा यह मीडिया सेल सरकार के विचारों को प्रमुखता से रखने के लिए काफी है.

 एनएमएसी की मदद से ब्लॉग्स, टीवी और अखबारों के पोर्टल्स के साथ सोशल मीडिया की निगरानी की जाएगी

2011 और 2012 में अन्ना हजारे के नेतृत्व में चल रहे भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के दौरान चल रहे सरकार विरोधी प्रचार की वजह से सरकार ने सूचना और प्रसारण मंत्रालय के तहत मीडिया सेल का गठन किया.

यूपीए-2 में सरकार ने सोशल मीडिया पर भड़काऊ कंटेंट के मामलों से निपटने के लिए आईटी एक्ट की धारा 66 ए का सहारा लिया गया लेकिन इसकी जबर्दस्त आलोचना की गई. शहरी इलाकों में इस कानून के खिलाफ जबर्दस्त आक्रोश रहा. 

तिवारी बताते हैं कि आज सरकार के हर विभाग के पास ट्विटर हैंडल है और इसके अलावा प्रेस इंफॉर्मेशन ब्यूरो भी है जिसकी मदद से सरकार से हर मुद्दे पर अपना विचार स्पष्ट करती है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी गुजरात के समय से लगातार ट्विटर का इस्तेमाल करते रहे हैं. उन्होंने कहा, 'अगर मंशा गलत खबरों को सुधारने की है तो यह तरीका सही है. लेकिन अगर आप इसकी मदद से पत्रकारों पर नजर रखने की योजना बना रहे हैं तो यह ऑर्वेलियन ढांचा खड़ा करने जैसा है जहां लोगों को धमकाया और डराया जाता है.'

रिपोर्ट बताती हैं, 'सॉफ्टवेयर की मदद से सरकार किसी लेखक के लेखकीय अतीत का भी पता लगा सकेगी कि उन्होंने कितनी बार नकारात्मक और सकारात्मक स्टैंड लिया. इसके अलावा उनकी पृष्ठभूमि और उनके द्वारा पढ़ी जाने वाली साइटों को भी खंगालने में मदद मिलेगी ताकि यह पता लगाय जा सके कि उनका मकसद कहीं तनाव भड़काना तो नहीं था.' इसके अलावा प्रस्ताव में यह भी कहा गया है एजेंसी खुफिया एजेंसियों को भी जरूरी सूचनाएं देंगी.

एक पूर्व खुफिया अधिकारी ने कहा कि नई एजेंसी को बनाने की कोई जरूरत नहीं है क्योंकि पहले से मौजूद एजेंसियों के पास पत्रकारों और मीडिया की निगरानी करने का अधिकार है. अधिकारी ने बताया, 'सरकार इस प्रस्ताव को आगे बढ़ाकर लोगों के विचारों को जानना चाहती है.'

अधिकारी ने कहा कि नई एजेंसी के आने से भ्रम बढ़ेगा. धतवालिया ने कहा कि हालांकि इस बारे में अभी कोई फैसला नहीं लिया गया है. 

पूर्व खुफिया अधिकारी ने कहा, 'हम जानते हैं कि मीडिया खासकर टीवी मीडिया की छवि खराब हुई है. क्योंकि वह गैर जरूरी और कम योग्यता वाले लोगों को जगह दे रहे हैं.' उन्होंने कहा कि अंग्रेजी चैनल में एक आदमी बतौर राष्ट्रीय सुरक्षा मामलों के विशेषज्ञ के तौर नजर आता है जबकि उनके पास खुफिया एजेंसी में काम करने का बेहद छोटा अनुभव है.

तिवारी ने कहा कि इस तरह की कोशिशों से सरकार की असुरक्षा की भावना की पोल खुलेगी और इसका गलत संदेश जाएगा. उन्होंने कहा, 'अगर इस कोशिश का मकसद मीडिया को डराना और धमकाना है तो हम निश्चित तौर पर इसका विरोध करेंगे.'  

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First published: 24 February 2016, 21:13 IST
 
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