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भारत-पाक संबंधः बड़ा वादा, छोटी आशा

गौहर गिलानी | Updated on: 10 February 2017, 1:46 IST

विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के पाकिस्तान में होने वाले पांचवें "हार्ट ऑफ एशिया" सम्मेलन में हिस्सा लेने की खबर आते ही कश्मीर में भी सरगर्मियां शुरू हो गईं. कश्मीर के अलगाववादी, नेता दोनों देशों के बीच ठप वार्ता के आधिकारिक तौर पर शुरू होने की उम्मीद से इस पर बारीकी से नजर रखे हुए हैं.

हालांकि इनमें से ज्यादातर लोग उम्मीदों की जगह एक उलझन में है.

लोगों की बड़ी उम्मीदों और उलझन की कुछ वाजिब वजहें भी है. बीते 10 जुलाई को रूस के उफा में हुए सम्मेलन में नरेंद्र मोदी और नवाज शरीफ के बीच हुई बैठक के बाद जारी संयुक्त बयान में विशेषकर कश्मीर विवाद को आधिकारिक रूप से उल्लिखित न करने के कारण कश्मीर घाटी के लोगों को निराश हुई थी.

उस संयुक्त बयान के मुताबिक, दोनों प्रधानमंत्रियों ने "भारत और पाकिस्तान के बीच शांति सुनिश्चित करने और विकास को बढ़ावा देने के लिए सामूहिक जिम्मेदारी निभाने पर सहमति जताई. इसके लिए वे सभी लंबित मुद्दों पर चर्चा करने के लिए तैयार थे."

लेकिन उफा सम्मेलन का यह घोषणा पत्र सिरे चढ़ता उससे पहले ही भारत-पाकिस्तान वार्ता ठप हो गई. 

लेकिन एक नाटकीय घटनाक्रम के तहत दोनों देशों के सुरक्षा सलाहाकारों ने छह दिसंबर को बैंकॉक में एक गुप्त बैठक आयोजित की. इसमें उन्होंने "शांति एवं सुरक्षा, नियंत्रण रेखा पर शांति की स्थापना, आतंकवाद और जम्मू एवं कश्मीर" समेत तमाम मुद्दों पर चर्चा की.

और अब, सुषमा स्वराज इस्लामाबाद का दौरा कर लौटी हैं. क्या उनकी इस यात्रा से कश्मीर कोई उम्मीद कर सकता है. कश्मीरी समाज के तमाम वर्गों के लोग इस बारे में क्या सोचते हैं?

मुफ्ती मोहम्मद सईद, मुख्यमंत्री

राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहाकार की बैंकॉक में हुई वार्ता का स्वागत करते हुए सईद कहते हैं कि यह मुलाकात भविष्य में दोनों देशों के बीच बातचीत का रास्ता साफ करेगी.

वो कहते हैं, "यह एक अच्छी शुरुआत है. मैं बहुत खुश हूं कि भारत और पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहाकारों के बीच द्विपक्षीय वार्ता चुपचाप आयोजित की गई."

उमर अब्दुल्ला, नेता विपक्ष

पूर्व मुख्यमंत्री ने ट्वीट करके अपनी राय जाहिर की, "अंततः अच्छाई की जीत हुई. इतनी बड़ी समस्या जब आपके घर में मौजूद है तो आप इसे नजरंदाज नहीं  कर सकते? आप कश्मीर की अनदेखी नहीं कर सकते."

हालांकि वो हैरानी जताते हुए पूछते हैं कि क्या भारत को कश्मीर पर बात करने के लिए मजबूर किया गया? क्योंकि उफा के बयान में इसका उल्लेख कहीं भी नहीं किया गया था. 

सत्तारूढ़ भाजपा का दावा है कि उफा में पाकिस्तान को आतंकवाद पर वार्ता के लिए मजबूर किया गया. जबकि बातचीत की प्रक्रिया कश्मीर के नेताओं से मुलाकात के कारण टूटी थी तो क्या माना जाय कि पाकिस्तान ने भारत को कश्मीर पर बात करने के लिए मजबूर कर दिया.

यासिन मलिक, जेकेएलएफ प्रमुख

"आजादी समर्थक" नेता आमतौर पर भारत और पाकिस्तान के बीच सुलह के पक्ष में हैं, लेकिन वे पूर्व के कड़वे अनुभवों के कारण इसके परिणामों को लेकर उलझन में हैं. 

मलिक कहते हैं भारत के हठवादी रवैए ने इस वार्ता प्रक्रिया से कश्मीरियों का विश्वास ही खत्म कर दिया है.

मलिक ने कैच को  बताया, "हालांकि हमे विश्वास है कि वार्ता के जरिये अंततः सभी मुद्दे हल हो सकते हैं, हकीकत यह है कि भारतीय की आक्रामक नीति के चलते 1947 से हमें चार पीढ़ियां खो चुके हैं. इसलिए हर ओर संदेह है और वार्ता से हमारा विश्वास उठ गया है."

उन्होंने कहा, "नई दिल्ली में नरेंद्र मोदी की मौजूदा सरकार शुरुआत से ही बहुत प्रतिक्रियाशील और आक्रामक रवैया अख्तियार कर रही है. इसने मीडिया से भी मुकाबला नहीं करने की संस्कृति विकसित की. यदि कश्मीरियों की प्राथमिक भागीदारी बातचीत में नहीं होगी तो ताजा बातचीत का भी हश्र भी पहले की ही तरह होगा."

सैयद अली शाह गिलानी, कट्टरपंथी हुर्रियत प्रमुख

यह बुजुर्ग नेता भी मलिक द्वारा व्यक्त बात का समर्थन करते हैं. स्थानीय मीडिया को उन्होंने बताया कि, "जब तक कश्मीर के समाधान के लिए भारत और पाकिस्तान कठोर कदम नहीं उठाते, तब तक हम किसी भी सफलता की उम्मीद नहीं कर सकते."

मीरवाइज उमर फारूक, उदारवादी हुर्रियत नेता

उन्होंने कहा कि वे वार्ता बहाली पर बहुत प्रसन्न हैं, लेकिन जोर दिया कि भारत और पाकिस्तान को कश्मीरी नेतृत्व को भी इसमें शामिल करना चाहिए और विवाद का "सौहार्दपूर्ण समाधान ढूंढ़ना" चाहिए. 

मीरवाइज ने कहा, "वार्ता हमेशा से ही एक सकारात्मक संकेत रहा है. हालांकि, कश्मीर के लोगों की राजनीतिक आकांक्षाओं का भी ध्यान रखना चाहिए. भारत और पाकिस्तान दोनों को कश्मीर के नेतृत्व को शामिल करना चाहिए. इसका कोई विकल्प भी नहीं है."

शेख शौकत हुसैन, अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ

प्रो. हुसैन मानते हैं कि केवल "गंभीर बातचीत" से ही कोई नतीजा निकल सकता है वर्ना यह एक निरर्थक कसरत होगी.

कश्मीर के केंद्रीय विश्वविद्यालय में विधि संकाय के प्रमुख हुसैन ने कैच को बताया, "अगर यह वार्ता केवल भारत के तथाकथित नर्म सत्ता के संबंध के आधार पर हैं, तो इनका परिणाम कुछ नहीं निकलेगा. यदि दोनों मुल्क गंभीर होंगे तभी बातचीत का और कश्मीर के मासले का कोई ठोस परिणाम सामने आएगा."

गुल वानी, राजनीतिक विश्लेषक

प्राख्यात राजनीतिक विश्लेषक वानी कहते हैं कि भारत और पाकिस्तान को नफरत और अविश्वास के बुनियादी ढांचे को कमजोर करने के लिए "शांति के बुनियादी ढांचे" को मजबूत करने की जरूरत है. 

प्रो. वानी ने कैच को बताया, "यह बातचीत वाकई शुभ संकेत हैं. उम्मीद करते हैं कि बीता हुआ वक्त एक दूसरे की समस्याओं को अच्छी तरह से समझने के लिए भारत और पाकिस्तान को एक और मौका देगा."

दोनों देशों को मीडिया सहयोग, व्यापार, सांस्कृतिक और शैक्षिक आदान-प्रदान के जरिये जनता की राय बदलने के लिए भी काम करना चाहिए

"यह बात भी साबित हो चुकी है कि भारत-पाक के बीच पर्दे के पीछे चलने वाली कूटनीतिक प्रक्रिया बहुत जरूरी है. दोनों ओर आक्रामक और कट्टरपंथी लोगों की बहुतायत है जो सिर्फ विवादों को आगे बढ़ाने की बात करते हैं. इसलिए दोनों देशों को शांति का वातावरण स्थापित करने के लिए प्रयास जरूर करना चाहिए."

प्रो. वानी ने यह भी कहा कि दोनों देशों को मीडिया सहयोग, व्यापार, सांस्कृतिक और शैक्षिक आदान-प्रदान के जरिये जनता की राय बदलने के लिए भी काम करना चाहिए. 

First published: 11 December 2015, 8:17 IST
 
गौहर गिलानी @catchnews

श्रीनगर स्थित पत्रकार, टिप्पणीकार और राजनीतिक विश्लेषक. पूर्व में डॉयचे वैले, जर्मनी से जुड़े रहे हैं.

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