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पीएम बनने के चक्कर में सीएम की कुर्सी न खिसक जाए

भारत भूषण | Updated on: 10 February 2017, 1:50 IST

मीडिया में चर्चा होने लगी है कि 2019 के लोक सभा चुनाव में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में मौजूदा पीएम नरेंद्र मोदी के सामने होंगे.

हो सकता है कि ये केवल मीडिया की कल्पना हो लेकिन इसे हवा देने वालों में आरजेडी के मुखिया लालू यादव और उनके बेटे तेजस्वी यादव भी शामिल हैं. बिहार में जेडीयू, आरजेडी और कांग्रेस की गठबंधन सरकार है. तेजस्वी राज्य के उप-मुख्यमंत्री हैं.

नीतीश कुमार ने हाल ही में संघ-मुक्त भारत बनाने के लिए एक गैर-बीजेपी, गैर-आरएसएस राष्ट्रीय गठबंधन बनाने का आह्वान किया. जिससे इस कल्पना को और बल मिला. नीतीश हाल ही में जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने हैं.

संभव है कि नीतीश को लग रहा हो कि देश में गैर-बीजेपी दलों को एक करने के लिए पर्याप्त माहौल है. नरेंद्र मोदी के कामकाज से नाखुश कुछ और लोग नीतीश को छिपे रुस्तम के तौर पर देख रहे हैं.

ऐसे लोगों में केवल बीजेपी और मोदी के परंपरागत विरोधी ही नहीं हैं. उनके समर्थक माने जाने वाले कॉरपोरेट सेक्टर, मिडिल क्लास और युवाओं में मोदी की लोकप्रियता दरकी है.

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उदारवादी राजनीति के लिए सिकुड़ती जगह और कट्टर हिंदुत्ववादी राजनीति के बढ़ते असर से कई गैर-बीजेपी दल असहज हैं.

जनता को रोज नए तरीके से खुद को देश का देशभक्त नागरिक साबित करने के लिए कहा जा रहा है. विभिन्न राज्यों में हिंदू कट्टरपंथी राज्य सरकार की अल्पसंख्यक कल्याण की घोषणाओं को मुंह चिढ़ा रहे हैं. वहीं खुद को बेहतर प्रशासक साबित करने के लिए बस तिरंगा ओढ़ लेना काफी होता जा रहा है.

आम चुनाव से पहले जो कॉरपोरेट वर्ग पूरी तरह मोदी के साथ था अब निराश होता दिख रहा है. मोदी सरकार अपने दो साल पूरे कर चुकी है लेकिन अर्थव्यवस्था में ठोस सुधार का कोई लक्षण नहीं दिख रहा है. कुल मिलाकर एक गुजराती कारोबारी समूह और एक भगवा चोलाधारी व्यापारी के ही अच्छे दिन आते दिख रहे हैं.

ऐसे माहौल में नीतीश कुमार अगर खुद को नरेंद्र मोदी के विकल्प के रूप में पेश करने का सपना देखने लगे हों तो बड़ी बात नहीं होगी. जय प्रकाश नारायण के संपूर्ण क्रांति आंदोलन से निकले नीतीश अनुभवी नेता हैं. उनकी छवि कुशल प्रशासक की है. उन्होंने हाल ही में बिहार विधान सभा में नरेंद्र मोदी की बीजेपी को धूल भी चटाई थी.

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नीतीश की तुलना में राहुल गांधी अपरिपक्व, अस्थिर और ओजविहीन नजर आते हैं. अरविंद केजरीवाल भले ही खुद को लेकर बड़े बड़े ख्वाब पालते हों लेकिन उनकी छवि मनमानी करने वाले आत्ममुग्ध नेता की बनती जा रही है.

राहुल और केजरीवाल में से कोई भी ऐसा नहीं है कि जिसे 2019 में किसी संभावित बीजेपी विरोध गठबंधन के स्वाभाविक नेता के तौर पर देखा जा सके. इसके उलट नीतीश की छवि भरोसेमंद नेता की है. उन्होंने अपने चिर-प्रतिद्वंद्वी लालू यादव से हाथ मिलाकर अपने लचीलेपन का परिचय दिया है.

फिर भी नीतीश की संभावित राष्ट्रीय भूमिका की राह में दो बड़े सवाल हैं. एक, क्या कांग्रेस उनका नेतृत्व स्वीकार करेगी? दो, क्या नीतीश कुमार संभावित गठबंधन में शामिल क्षेत्रीय दलों के महत्वाकांक्षी नेताओं की आपसी टकराहट को रोक सकेंगेे?

क्या नीतीश अगले रामकृष्ण हेगड़े बनने से बच सकेंगे? 1986-87 में राजीव गांधी सरकार के राष्ट्रीय विकल्प के रूप में हेगड़े को देखा जाने लगा था लेकिन उनके सहयोगी दलों के नेताओं के अहम की टकराहट ने ऐसा होने नहीं दिया.

कई लोगों को लग रहा है कि कांग्रेस नीतीश को 2019 में समर्थन दे सकती है क्योंकि राहुल गांधी 2024 की तैयारी में हैं. वहीं कुछ लोग मान रहे हैं कि पिछले चुनाव में लोक सभा में 44 सीटों पर सिमट जाने के बाद उसके पास राष्ट्रीय गठबंधन के नेतृत्व का नैतिक आधार नहीं बचा है.

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लोक सभा की 44 सीटों से देश की राजनीति में कांग्रेस के जमीनी असर का अंदाज लगाना उचित नहीं होगा. 2014 का  लोक सभा चुनाव अनोखा था जिसकी काफी व्याख्या की जा चुकी है. नरेंद्र मोदी की चमक फीकी पड़ने के साथ ही 2019 में कांग्रेस की स्थित सुधरेगी.

गुजरात (26 लोक सभा सीटें), राजस्थान (25 लोक सभा सीटें ), महाराष्ट्र (48 लोक सभा सीटें), कर्नाटक (28 लोक सभा सीटें), मध्य प्रदेश (40), छत्तीसगढ़ (11 लोक सभा सीटें), पंजाब (13 लोक सभा सीटें), हरियाणा (10 लोक सभा सीटें), उत्तराखंड (5 लोक सभा सीटें) और हिमाचल प्रदेश (4 लोक सभा सीटें) में कांग्रेस और बीजेपी की कमोबेश सीधी टक्कर होती है. यानी कुल 210 लोक सभा सीटों पर कांग्रेस ही बीजेपी का मुख्य विकल्प होगी.

इनके अलावा तेलंगाना (17 लोक सभा सीटें), आंध्र प्रदेश (25 लोक सभा सीटें) में कांग्रेस मुख्य विपक्षी पार्टी है. केरल (20 लोक सभा सीटें) में वो सत्ता में है. इन तीन राज्यों में कुल 62 लोक सभा सीटें हैं.

अगर कांग्रेस को इन 272 सीटों में करीब 40 प्रतिशत (108 सीटें) पर भी जीत मिली तो वो सबसे बड़ी गैर-बीजेपी पार्टी होगी. अगर कांग्रेस इससे बेहतर प्रदर्शन करती है तब तो गैर-बीजेपी गठबंधन के नेतृत्व का उसका दावा और मजबूत हो जाएगा.

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बिहार में लोक सभा की 40 और झारखंड में 14 सीटें हैं. नीतीश कुमार को इनमें से 30-35 सीटों पर भी जीत मिल सकती है. ऐसे में दूसरे क्षेत्रीय नेता भले नीतीश का साथ दें मुलायम सिंह यादव कांग्रेस के साथ जाना पसंद करेंगे क्योंकि वहां उन्हें ज्यादा तवज्जो मिलेगी.

ये भी आशंका है कि जिस तरह 1989 के आम चुनाव से पहले रामकृष्ण हेगड़े के राजनीतिक मंसूबे दूसरे नेताओं की महत्वाकांक्षाओं की भेंट चढ़ गए थे, वैसा ही कुछ 2019 से पहले नीतीश के साथ हो सकता है.


याद रहे कि हेगड़े ने 1984 के आम चुनाव के बाद नैतिक आधार पर इस्तीफा दे दिया था. उस चुनाव में कांग्रेस को 405 लोक सभा सीटों पर जीत मिली थी. कर्नाटक की 28 में 24 लोक सभा सीटों पर कांग्रेस का झंडा लहराया था. 

हेगड़े ने इसे अपनी नैतिक हार मानते हुए मध्यावधि चुनाव की घोषणा कर दी थी. वो दोबारा अच्छे बहुमत से चुनकर सत्ता में आए. उन्हें 224 विधान सभा सीटों में से 145 पर जीत मिली थी. इस जीत के बाद उनका क़द और बढ़ गया था.

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अप्रैल 1987 में बोफोर्स घोटाला सामने आया. राजीव गांधी की साख गिरने लगी. वहीं, हेगड़े की लोकप्रियता बढ़ती जा रही थी. लेकिन जनता पार्टी के अंदर ही उनके विरोधी चंद्र शेखर और सुब्रमण्यम स्वामी को लगने लगा कि हेगड़े पीएम बनने की महत्वाकांक्षा रखते हैं. वो दोनों कांग्रेस से मिल गए ताकि हेगड़े को रोका जा सके.

हेगड़े को पहला झटका परिवार की तरफ से लगा. उनके बेटे पर मेडिकल कॉलेज की परीक्षा में घूस लेने का आरोप लगा. उसके बाद अरक बॉटलिंग के ठेके के मामले में हाई कोर्ट की तल्ख टिप्पणी के चलते हेगड़े को सीएम पद से इस्तीफा देना पड़ा. 

लेकिन उन्होंने तीन दिन बाद अपना इस्तीफा वापस ले लिया. उसके कुछ ही समय बाद राजनीतिक विरोधियों का फोन टैप कराने के आरोप में उन्हें फिर इस्तीफा देना पड़ा.

हेगड़े दिल्ली में बैठे पीएम बनने का ख्वाब देखने वालों की ताकत को भांप नहीं सके थे. नीतीश कुमार भी वही गलती करते नजर आ रहे हैं, खासकर यूपी के खिलाड़ियों को लेकर.

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यूपी के जिस नेता को नीतीश साथ लेना चाहते हैं वो आरएलडी के अजित सिंह हैं. अजित यूपी में बहुत मामूली राजनीतिक हैसियत रखते हैं. 80 लोक सभा सीटों वाले यूपी में असल खिलाड़ी मुलायम सिंह यादव और मायावती हैं.

इन दोनों में से किसी भी नेता ने यूपी में अच्छा प्रदर्शन किया तो उसकी लोक सभा में नीतीश से कम सीटें नहीं होंगी. ऐसे में वो पीएम उम्मीदवार के रूप खुद को पेश करने के बजाय नीतीश को समर्थन क्यों देंगे?

खबरों के अनुसार नीतीश कुमार गैर-बीजेपी गठबंधन में ममता बनर्जी और नवीन पटनायक को भी साथ लेना चाहते हैं. लेकिन क्या ये नेता भी आसानी से उन्हें नेता मान लेंगे?

नीतीश कुमार की अब तक सबसे बड़ी उपलब्धि बिहार विधान सभा में मोदी की बीजेपी को पटकनी देना ही माना जा रहा है. इस जीत में लालू यादव की भी बड़ी भूमिका रही थी. ऐसे में उन्हें पहले अपने घर में मजबूती से जमाना होगा तभी वो बाहर पैर फैला सकेंगे.

First published: 23 April 2016, 12:45 IST
 
भारत भूषण @Bharatitis

एडिटर, कैच न्यूज़. पत्रकारिता में 25 से ज्यादा सालों का अनुभव. इस दौरान मेल टुडे के संस्थापक संपादक, हिन्दुस्तान टाइम्स के कार्यकारी संपादक, द टेलीग्राफ, दिल्ली के संपादक, एक्सप्रेस न्यूज़ सर्विस के संपादक, इंडियन एक्सप्रेस के वॉशिंगटन संवाददाता, द टाइम्स ऑफ़ इंडिया के सहायक संपादक के रूप में काम किया.

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