Home » इंडिया » Catch Hindi: Bihar education system is fully failed
 

ये कैसा 'सुशासन' जिसमें छात्रों की होती है पिटाई और जेल

निवेदिता | Updated on: 10 February 2017, 1:49 IST
(कैच)

जो बच्चे अपनी कला विधाओं के जरिये दुनिया को नई सिम्त की ओर ले जाते, जो रंगों के संसार में दाखिल होते, आज वे जेल में अपराधियों की तरह बंद है. उन्हें उस गुनाह की सजा मिल रही है जो उन्होंने किया नहीं. 50 दिन किसी आंदोलन के लिए कम नहीं होते. 50 दिन किसी प्रशासन को निणर्य लेने के लिए कम नहीं होते.

न तो सरकारी महकमा और न ही विश्वविद्यालय को इसकी चिंता है. बिहार का एकमात्र कला एवं शिल्प महाविद्यालय आज पुलिस छावनी में तब्दील हो गया है. काॅलेज में ताला जड़ा हुआ है और बच्चे काॅलेज के गेट पर आमरण अनशन कर रहे हैं.

बिहार: 10वीं बोर्ड परीक्षा में आधे से ज्यादा छात्र फेल

काॅलेज के आठ बच्चों को निष्कासित कर दिया गया है और सात बच्चे बेउर जेल में बंद हैं. ये कैसा दृश्य है? क्या दृश्य दोहराया जा रहा है? देश के सबसे बडे विश्वविद्यालय जेएनयू में चल रहे छात्रों के आंदोलन को जिस बर्बरता से कुचलने की कोशिश की गयी क्या बिहार उसी इतिहास को दुहरा रहा है.

अगर ये सच नहीं है तो इस महाविद्यालय के छात्र नीतीश कुमार ने आत्महत्या करने की कोशिश क्यों की. ये कौन लोग हैं जो जिन्दगी से भरे नौजवानों को मौत के मुंह में धकेल रहे हैं! जो अपनी जड़ मान्यताओं के साथ बरसों से विश्वविद्यालय के तंग गलियारों में धूनी रमाये बैठें हैं. जिन लोगों ने अपने इतिहास को नहीं जाना जिन्होंने समाज के भीतर झांकने की कोशिश नहीं की वे दूसरों के लिए परिभाषा गढ़ने में लगे हैं.

सृजनात्मक आनंद

जाने माने वैज्ञानिक प्रो. यशपाल कहते हैं, 'हमें अपने बच्चों को समझ का चस्का लगने देना चाहिए जिससे उन्हें सीखने में मदद मिले और जब वे कतरों और बिंबों में संसार को देखें और जिंदगी की लेन-देन में दाखिल हों तो अपने मुताबिक ज्ञान का रूपांतर कर पाएं. ज्ञान का ऐसा स्वाद हमारे बच्चों के वर्तमान को पूर्णतः सृजनात्मक और आनंदप्रद बना सके.'

काश की यशपाल की तरह हमारी सरकारें सोच पाती तो आज शिक्षा का परिदृश्य इतना भयावह नहीं होता. क्या यह शर्मनाक नहीं है कि किसी कुलपति को अपने बच्चों के बीच जाने के लिए सुरक्षा गार्ड का सहारा लेना पड़े. पटना विश्वविद्यालय के कुलपति अपना बाॅडी गार्ड रखते हैं और कहते हैं कि वे छात्रों से बिना सुरक्षा गार्ड के नहीं मिलते उन्हें हमले का खतरा रहता है.

बिहार टॉपर्स कांड: मुख्य अभियुक्त बच्चा राय गिरफ्तार

इसलिए जब पिछले 23 मई को आर्ट काॅलेज के छात्र वीसी से मिलने गए तो उनके सुरक्षा गार्डो ने गोलियां चलाई. कई राउंड हवाई फायर किए गये. मिलने गए छात्र-छात्राओं को बुरी तरह पीटा गया. उन सभी छात्रों पर आपराधिक मुकदमे दर्ज किये गए.

सवाल उठता है कि अगर छात्रों को कोई समस्या होगी तो वह अपनी शिकायत कहां दर्ज करें. आर्ट काॅलेज के छात्रों की यही गलती थी कि काॅलेज के ठेकेदार की मनमानी के खिलाफ शिकायत दर्ज करने जब अपने प्रधानाचार्य के पास गए तो ठेकेदार ने उनकी मौजूदगी में ही छात्रों को पीटा.

इस देश में ठेकेदार सबसे ज्यादा मजबूत होता है.यह अघोषित सत्य है कि सभी शैक्षिणक संस्थानों में भारी कमीशन देकर ये ठेकेदार काम करते हैं. फिर उनके खिलाफ किसकी आवाज उठेगी? अगर काॅलेज के प्रभारी प्राचार्य डा. चन्द्रभूषण श्रीवास्तव चाहते तो इस मामले को सुलझा सकते थे. छात्रों को विश्वास में ले सकते थे. पर उन्होंने ठेकेदार के पक्ष में छात्र को पिटने दिया.

जातीय भेदभाव

चंद्रभूषण श्रीवास्तव पर पहले भी छात्रों ने जातीय भेदभाव करने और अराजक स्थिति पैदा करने का आरोप लगाया था. उसी काॅलेज के छात्र नीतीश कुमार ने एक साल पहले प्राचार्य पर जातिगत भेदभाव करने और प्रताड़ित करने का आरोप लगाते हुए बुद्धा काॅलोनी थाने में मुकदमा दर्ज कराया था. 

पुलिस ने इस मामले में कोई कार्रवाई नहीं की. नीतीश दलित हैं और काफी गरीब परिवार से आते हैं. वे गहरे सदमे में हैं. उसके गले पर मौत के गहरे निशान मौजूद हैं. उसे बचा लिया गया. लेकिन जो सवाल रोहित बेमुला की मौत से उपजे थे वे हवा में तैर रहे हैं. अगर हमारी सरकार और शिक्षा का वातावरण संवेदनशील होता तो ना ही हम रोहित को गंवाते न नीतीश आत्महत्या का चुनाव करते.

बिहार शिक्षामंत्री: 'बीपीएससी मुख्य परीक्षा की तारीख बढ़ा सकती है बिहार सरकार'

हमारे देश में शिक्षा को लेकर जो परिदृश्य है वह काफी खतरनाक है. आंकड़े बताते हैं कि सरकारी विश्वविद्यालयों में एक तिहाई कुलपतियों के पास पीएचडी डिग्री नहीं है और उनमें से कई लोगों के पास आवश्यक शैक्षणिक योग्यता नहीं है.

1964 में कोठारी आयोग ने सिफारिश की थी कि सामान्य तौर पर कुलपति एक जाना-माना शिक्षाविद् होना चाहिए अपवाद को छोड़कर. पर सच यह है कि अधिकतर उन्हीं लोगों को विश्वविधालयों के ऊंचे पदों के लिए चुना जा रहा है जिसके तार शिक्षा माफिया से जुड़े हैं. बिहार में टाॅपर घोटाला उसका ताजा उदाहरण है. 

शिक्षकों का अभाव

पटना विश्वविद्यालय में 2003 के बाद शिक्षकों की कोई नियुक्ति नहीं हुई है. लंबे आंदोलन के बाद आर्ट काॅलेज में 18 साल बाद 2011 में शिक्षकों की बहाली हुई. अभी तक स्थायी प्रिंसपल की नियुक्ति नहीं हुई है. अधिकांश काॅलेज में शिक्षकों के अभाव में पढ़ाई ठप्प है. ये हाल विश्वविद्यालयों का है सरकारी स्कूलों का हाल और भी बुरा है.

पिछले एक साल में देश भर में एक लाख सरकारी स्कूल बंद हो चुके हैं. इसमें 17 हजार स्कूल राजस्थान के हैं. कई दूसरे राज्यों में भी स्कूल बंद करने की तैयारी हो रही है. ये आंकड़े हमारी सरकार को डराते नहीं. वे जानते हैं, आज के समय में जिनके पास पैसा व ताकत है वे ज्ञान खरीद सकते हैं. सरकारी स्कूल और काॅलेज तो रोहित बेमुला, नीतीश कुमार और कन्हैया जैसे लोगों के लिए है.

विनोद बिहारी, नंद लाल बसु, पटना कलम समेत कई नायाब पेंटिंग गायब हो चुकी है, पर सुध लेने वाला कोई नहीं

सरकार खुद को शिक्षा की पूरी जिम्मेदारी से मुक्त करना चाहती है. आर्ट काॅलेज के छात्र मुख्यमंत्री से लेकर राज्यपाल तक को अपनी मांगे बता चुके हैं पर अबतक कोई सुनवाई नहीं हुई है. शिक्षा मंत्री अशोक चौधरी भी अपना पल्ला झाड़ चुके हैं.

यूपीएससी और बिहार लोक सेवा आयोग की तारीखों के टकराव से छात्र परेशान

आर्ट काॅलेज के प्राचार्य से इस मसले पर लगातार बात करने की कोशिश की गयी पर उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया. एआईएसएफ के राष्ट्रीय महासचिव विश्वजीत कहते हैं कि जब तक सरकार छात्रों का निंलबन और मुकदमा वापस नहीं लेती तबतक आंदोलन जारी रहेगा. 

आर्ट काॅलेज के छात्र गौरव कहते हैं, 'हम काफी उम्मीद लेकर आए थे. पर काॅलेज के हालात इतने बुरे हैं कि 240 छात्रों में से 60 छात्र काॅलेज छोड़ चुके हैं. हम कभी पुस्तकालय नहीं गए. उसे कभी छात्रों के लिए खोला नहीं गया. कंप्यूटर लैब पिछले तीन सालों से बंद पड़ा है.'

काॅलेज में बड़े-बड़े कलाकारों की पेंटिंग सड़ रही है. उसे देखने वाला कोई नहीं है. विनोद बिहारी, नंद लाल बसु, पटना कलम समेत कई नायाब पेंटिंग गायब हो चुकी है, पर सुध लेने वाला कोई नहीं.

एक तरफ पूंजिपतियों के करोड़ों रुपए के कर्ज माफ किए जा रहे हैं दूसरी तरफ विश्वविद्यालय के खर्चों में कटौती हो रही है. कैसे एक विश्वविद्यालय को हिंसा की ओर धकेला जा रहा है. कैसे ज्ञान के उजाले को अंधकार में बदलने की तैयारी है.

First published: 18 June 2016, 12:10 IST
 
पिछली कहानी
अगली कहानी