Home » इंडिया » Bihar's new liquor prohibition law, Is it Nitish's good faith or political stunt
 

बिहार का नया शराबबंदी कानून, नीतीश की नेकनीयती या चुनावी पैंतरा

चारू कार्तिकेय | Updated on: 5 October 2016, 7:50 IST

बिहार में शराबबंदी की कहानी अभी खत्म नहीं हुई है. राज्य सरकार हाईकोर्ट के निर्णय से मिले झटके से उबर रही है. फैसले के दो दिन बाद ही उसने बिहार मद्यनिषेध एवं आबकारी कानून-2016 की अधिसूचना जारी कर दिया है. हालांकि यह भरपाई अस्थाई ही है क्योंकि होटल वाले व रेस्त्रां मालिक दशहरे के तत्काल बाद नए अधिनियम को चुनौती देने की घोषणा कर चुके हैं. हाईकोर्ट के आदेश का आधार बनी पिछली याचिकाएं भी उन्हीं के फेडरेशन व कुछ अन्य लोगों ने दायर की थीं.

नया अधिनियम अधिक सख्त है और इसमें कई ऐसे प्रावधान हैं जो आमतौर पर कठोर बताए जा रहे हैं. इसमें दस वर्ष तक के कारावास, दस लाख रुपए तक का जुर्माना, सम्पत्ति जब्त करने, परिवार के सभी वयस्क सदस्यों को अपराध में शामिल मानकर उनके खिलाफ कार्रवाई करने, सामुदायिक दण्ड, आजीवन कारावास और मृत्युदण्ड का प्रावधान शामिल है.

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार स्वयं कई बार इन प्रावधानों का बचाव कर चुके हैं. उनका कहना है कि ये प्रावधान कानून के उल्लंघन कर्ताओं को अपने कार्यों के लिए सीधे तौर पर उत्तरदायी बनाते हैं. एनडीटीवी के लिए लिखे अपने एक लेख में मुख्यमंत्री ने इन सख्त प्रावधानों के बचाव के लिए कम से कम छह मुख्य कारण गिनाए हैं. ये कुछ इस तरह हैं.

चुनावी वादा:

उनका कहना है कि वे केवल मतदाताओं से किया गया अपना यह चुनावी वादा निभा रहे हैं कि यदि वे सत्ता में आए तो शराबबंदी लागू करेंगे.

महात्मा गांधी भी ऐसा चाहते थे:

कुमार के अनुसार, शराब पर प्रतिबंध लगाने की बात आई तो गांधीजी ने भी इसे अपना पहला एजेण्डा बनाया था. उन्होंने गांधी द्वारा 1931 में लिखे एक लेख से उद्धरण देते हुए लिखा कि ‘यदि मुझे एक घंटे के लिए पूरे देश का तानाशाह नियुक्त कर दिया जाए तो पहला काम मैं यही करूंगा कि शराब की सभी दुकानें बिना मुआवजा दिए बंद कर दूंगा.'

संविधान में भी उल्लेख:

संविधान के भाग चतुर्थ के तहत राज्य के नीति के निर्देशक तत्वों में राज्यों से मद्यनिषेध के प्रयास का अनुरोध किया गया है.

सुप्रीम कोर्ट ने किया नीति निर्माताओं का ध्यान आकर्षित

कुमार के अनुसार सुप्रीम कोर्ट भी कह चुका है कि नशे की वस्तुओं का व्यापार-धंधा कोई मौलिक अधिकार नहीं है. राज्य को अपने नियामक अधिकारों के तहत नशे से संबंधित हर गतिविधि पर, इसके उत्पादन, भंडारण, निर्यात, आयात, बिक्री व इन्हें अपने पास रखने पर पूरी तरह रोक लगा देने का अधिकार है.

लोगों ने अभियान को समर्थन दिया है:

नीतीश कुमार का मानना है कि बिहार की जनता, खासकर महिलाएं शराबबंदी से काफी प्रसन्न हैं. उनका कहना है कि उत्तरप्रदेश व झारखण्ड जैसे दूसरे राज्यों की जनता ने भी शराबबंदी की उनकी अपीलों का स्वागत किया है. उन्होंने इसे जनता की इच्छा बताया.

शराबबंदी सख्ती से ही लागू होगी

सख्त प्रावधानों के समर्थन में उनका तर्क है कि यदि शराबबंदी अच्छी है तो इसका पूरे दिल से समर्थन करना होगा. इस मामले में किसी भी तरह की प्रशासनिक ढिलाई को सख्ती से रोकना होगा.

जहां तक चुनावी वादे का तर्क है तो कुमार साफ तौर पर इसे बहाने के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं क्योंकि जिन लोगों ने महागठबंधन के पक्ष में वोट दिया था उनमें भी अधिकांश के बीच शराबबंदी काफी अलोकप्रिय है.

गांधी को ढाल के रूप में इस्तेमाल करना भी पाखण्डपूर्ण है क्योंकि राष्ट्रपिता की तमाम खूबियों के बावजूद उन्हें गांधी की उस बात में ही एक खूबी नजर आई जिसमें उन्होंने तानाशाही की एक छद्म इच्छा प्रदर्शित की है.

राज्य की नीति निर्देशक तत्व सदैव एक लोकतांत्रिक बाधा बने रहे हैं. गोहत्या पर रोक और सामान्य सिविल कोड जैसी कई वर्तमान बहसों में यह दिखाई देता रहा है. कुमार समेत अन्य कोई राजनेता नीति के उन निर्देशक सिद्धान्तों को छूते तक नहीं जिनमें न्यायोचित समाज, व्यवस्थाएं, आय की असमानता को कम करना, सम्पत्ति के केंद्रीकरण को रोकना, आजीविका के समान अवसर, पुरुषों व महिलाओं के लिए समान कार्य के लिए समान वेतन, निशुल्क कानूनी सहायता, काम के अधिकार, प्रबंधन में श्रमिकों की भागीदारी जैसे अनेक अन्य विषय शामिल हैं.

जनता द्वारा किसी अभियान की सराहना करना एक दुधारी तलवार है. यह ठीक वैसा ही बहाना है जिसका उपयोग करके कोई संघीय सरकार पड़ोसी देश पर हमला कर दे. यह एक खतरनाक तर्क है और किसी भी नीति की लोकतांत्रिक साख की जांच के लिए इसे पैमाना नहीं बनाया जा सकता.

फिर बात अधिनियम के कड़े प्रावधानों की भी है. थिंक टैंक पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च ने व्यापक रूप से विश्लेषण किया है कि यह अधिनियम कई स्थानों पर समस्यामूलक है.

  1. यह धारणा संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन कर सकती है कि परिवार के सदस्यों तथा भूमि व भवन के मालिकों और रहवासियों को यह जानकारी होती है कि वहां कोई गैरकानूनी गतिविधि चल रही है.
  2. इस अधिनियम में एक धुंधला सा लेकिन खतरनाक प्रावधान भी है कि अधिनियम के उल्लंघन पर जब्त किसी भी सम्पत्ति के बारे में कोई आदेश पारित करने का अधिकार किसी भी अदालत को नहीं होगा. यदि अधिनियम किसी पीड़ित व्यक्ति को न्यायिक उपचार का मार्ग उपलब्ध नहीं कराता है तो इससे अधिक कठोर कुछ नहीं होगा.
  3. अधिनियम में जिस तरह के दण्डों का प्रावधान किया गया है वह भी अपराध की तुलना में काफी अधिक दिखाई देते हैं. उदाहरण के तौर पर भारतीय दण्ड संहिता में तेजाब के हमलों व बाल तस्करी जैसे अपराधों में दस साल की सजा का प्रावधान है, इसलिए मृत्युदण्ड को क्रियान्वित करने को लेकर मुश्किलें सामने आने की बात को अतिरंजित नहीं कहा जा सकता.

इन सब ज्यादतीपूर्ण प्रावधानों की ओर ध्यान दिलाए जाने के बावजूद कुमार अपने अभियान को जारी रखने पर अड़े हुए हैं. क्या वे एसा केवल इसलिए कर रहे हैं क्योंकि राष्ट्रीय राजनीति में आने के लिए वे कोई नया मुद्दा बनाने की स्थिति में नहीं हैं?

इस सवाल का जवाब केवल उन्हीं के पास है. अभी तो केवल एक बात साफ है कि शराब की लत को उन्होंने सरकारी दमन के लिए बहाने में बदल दिया है. यदि उनके इरादे नेक हैं तो स्पष्ट है कि वे दिशाभ्रमित हैं. यदि इसके पीछे देश के सर्वोच्च पद का चुनाव जीतने का इरादा ही काम कर रहा है तो साफ है कि वे इससे ज्यादा आगे नहीं देख पा रहे.

First published: 5 October 2016, 7:50 IST
 
चारू कार्तिकेय @CharuKeya

Assistant Editor at Catch, Charu enjoys covering politics and uncovering politicians. Of nine years in journalism, he spent six happily covering Parliament and parliamentarians at Lok Sabha TV and the other three as news anchor at Doordarshan News. A Royal Enfield enthusiast, he dreams of having enough time to roar away towards Ladakh, but for the moment the only miles he's covering are the 20-km stretch between home and work.

पिछली कहानी
अगली कहानी