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बिहार टॉपर्स घोटाला: मान्यता देने के लिए 4 लाख और टॉपर्स का रेट 20 लाख

निहारिका कुमारी | Updated on: 25 June 2016, 8:16 IST

बिहार टॉपर घोटाले में नित नए-नए खुलासे हो रहे हैं. इस घोटाले की जांच के लिए बने बिहार पुलिस के विशेष जांच दल (एसआईटी) के मुताबिक नकल के रैकेट से बिहार विद्यालय शिक्षा समिति (बीएसईबी) के पूर्व अध्यक्ष लालकेश्वर प्रसाद सिंह ने अकूत संपत्ति खड़ी कर ली है.

पुलिस सूत्रों के मुताबिक सिंह और उनकी पत्नी ऊषा सिन्हा ने बोर्ड में गड़बड़ी और अनियमितताओं का पूरा जाल खड़ा कर रखा था. ऊषा सिन्हा सत्तारुढ़ जनता दल (यूनाइटेड) की पूर्व विधायिका हैं और कुछ वक्त पहले तक पटना के गंगा देवी कॉलेज में प्रिंसिपल थीं.

अधिकारियों के मुताबिक स्कूलों और इंटर कॉलेजों को मान्यता दिलाने के काम को दोनों ने मिलकर धंधा बना दिया था. कॉलेजों की मान्यता के लिए मोटी रकम वसूली जाती थी. इसी तरह किसी भी क्लास में टॉपर बनाने के लिए अलग से सौदा होता था.

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यह सब बेहद संगठित तरीके से बीएसईबी के बीतर संचालित होता था. मसलन 10वीं और 12वीं कक्षा में एक निश्चित नंबर दिलाने के लिए भी अलग-अलग कीमतें तय थीं. पुलिस अधिकारियों की मानें तो स्कूलों और इंटर कॉलेजों को मान्यता दिलाने के लिए 4-5 लाख रुपये प्रति आवेदन लिये जाते थे. वहीं, फर्स्ट डिवीजन (60 फीसदी से ऊपर) नंबर दिलाने के लिए प्रति छात्र 40-50 हजार रुपये लिये जाते थे.

एसआईटी की पूछताछ में लालकेश्वर प्रसाद ने घोटाले का सारा ठीकरा बोर्ड के तत्कालीन सचिव हरिहरनाथ झा पर फोड़ा है

इसी तरह टॉपर बनाने के लिए 15-20 लाख रुपये में सौदा होता था. पुलिस सूत्रों के मुताबिक खुद को बचाए रखने के लिए लालकेश्वर सीधे पैसा नहीं लेता था.

इस बारे में किसी भी तरह का लेनदन या सौदेबाजी लालकेश्वर प्रसाद का दामाद और उनके बेटे का साला करता था. लालकेश्वर की पत्नी भी इस गड़बड़ी में बराबर की हिस्सेदार रही. निजी स्कूलों और कॉलेजों के अधिकारी पहले इन दोनों से संपर्क साधते थे. पैसे मिलने के बाद ये दोनों अपना हिस्सा काटकर सिंह को रकम का भुगतान किया करते थे. फिर वे जरूरी कागजात तैयार करते थे, जिस पर तत्कालीन अध्यक्ष की मंजूरी मिलती थी.

पुलिस अधिकारियों के मुताबिक करीबी रिश्तेदार होने के बावजूद सिंह पैसे मिलने के बाद ही आगे काम करता था. इस पैसे को वह रियल एस्टेट में लगाता था. बीते दिनों जब पुलिस ने सिंह के घर पर छापा मारा था, तो उसे पटना, नालंदा, दिल्ली, गुड़गांव और दूसरे शहरों में जमीन और फ्लैट के कागजात मिले थे.

बीएसईबी के आंकड़ों की मानें तो बीते एक साल में बोर्ड ने 100 इंटर कॉलेजों को मान्यता दी है. साथ ही, 200 से ज्यादा स्कूलों को भी बोर्ड की तरफ से 10वीं तक की शिक्षा के लिए मान्यता इसी अवधि के दौरान दी गई है. राज्य सरकार ने अब इन सभी कॉलेजों और स्कूलों की फिर से जांच कराने का आदेश दे दिया है.

शिक्षा मंत्री अशोक चौधरी ने बताया, “हम इन सभी कॉलेजों और स्कूलों की जांच कर रहे हैं. जिनमें भी कमी पाई जाएगी, उनकी मान्यता तुरंत रद्द कर दी जाएगी.”

जहां तक अंकों की बात है, तो निजी स्कूलों और कॉलेजों के छात्रों पर जमकर नंबर लुटाए गए. मिसाल के तौर पर इस घोटाले के केंद्र में स्थित विशुन राय कॉलेज में इस साल भी किसी को 60 फीसदी से कम अंक नहीं आए हैं.

एसआईटी के एक अधिकारी की मानें तो प्रसाद ने अपने पद का इस्तेमाल बेटे राहुल राज को फायदा पहुंचाने में भी किया. राज यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया में मैनेजर के पद पर काम कर रहे हैं. सूत्रों के मुताबिक बोर्ड का अकाउंट इलाहाबाद बैंक में है, लेकिन अपने बेटे को फायदा पहुंचाने के लिए प्रसाद ने अपने बेटे की शाखा में ही अकाउंट खुलवा लिया.

बीएसईबी के आंकड़ों की मानें तो बीते एक साल में बोर्ड ने 100 इंटर कॉलेजों को मान्यता दी है

साथ ही, अकाउंट खुलवाने के अगले ही दिन उसमें 54 करोड़ रुपये भी जमा कर दिए गए. इस वजह से राज को बैंक में सबसे ज्यादा कारोबार दिलाने वाले बैंकर के रूप में सम्मानित भी किया गया. दिलचस्प बात यह है कि सम्मानित करने के लिए बैंक अधिकारियों ने ऊषा सिन्हा को ही आमंत्रित किया था.

प्रसाद और सिन्हा अभी भी खुद को इस मामले में पाक-साफ बता रहे हैं. एसआईटी की पूछताछ में प्रसाद ने घोटाले का सारा ठीकरा बोर्ड के तत्कालीन सचिव हरिहरनाथ झा पर फोड़ा है. उसके मुताबिक सारी फाइलें झा ही लेकर आते थे. अब एसआईटी इस मामले में झा को भी हिरासत में लेने की तैयारी कर रही है. वहीं, सिन्हा के रुख ने तो एसआईटी को सन्न कर दिया है.

एसआईटी प्रमुख और पटना के एसएसपी मनु महराज ने जब उनसे पूछताछ की कोशिश की तो उन्होंने टका सा जबाव दिया, “आज आपका दिन है एसएसपी साहब, एक दिन मेरा भी आएगा. याद रखिएगा.”

इस घोटाले ने बिहार की शिक्षा व्यवस्था में सड़न को सबके सामने लाकर रख दिया है. पटना विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर एनके चौधरी कहते हैं, “नीतीश शासन में शिक्षा व्यवस्था की हालत कितनी खराब हुई, अब यह बात सबके सामने आ गई है. हालांकि, अब भी शासन व्यवस्था का पूरा जोर इस मामले की गहराई से जांच करने पर नहीं है.”

First published: 25 June 2016, 8:16 IST
 
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