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12 साल में आकाशीय बिजली करती है इस शिवलिंग को खंडित

कैच ब्यूरो | Updated on: 8 April 2016, 17:12 IST

इसे आप चमत्कार कहें या भगवान की महिमा लेकिन हकीकत कुछ ऐसी ही है जिसे एकबारगी मानना आसान नहीं है. हिमाचल प्रदेश में भगवान शिव का एक ऐसा मंदिर है जिसमें स्थापित शिवलिंग को हर 12वें साल आकाशीय बिजली खंडित कर देती है.

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हिमाचल प्रदेश के कुल्लू में बिजली महादेव का एक प्राचीन और अनोखा मंदिर है. यह ब्यास नदी और पार्वती नदी के संगम के नजदीक एक ऊंचे हरे भरे पर्वत के ऊपर बना हुआ है. मान्यता है कुल्लू घाटी एक विशालकाय सांप का रूप है जिसका वध भगवान शिव ने किया था. कुल्लू से बिजली महादेव की पहाड़ी की दूरी करीब 14 किलोमीटर है.

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इस मंदिर की सबसे हैरतअंगेज बात यह है कि इस मंदिर पर हर 12वें वर्ष आकाशीय बिजली गिरती आ रही है. यह भयंकर आकाशीय बिजली कुछ इस तरह मंदिर के ऊपर गिरती है जिससे यहां स्थापित शिवलिंग खंडित हो जाता है.

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यहां के पुजारी भी इस बात को बखूबी जानते हैं कि आकाशीय बिजली शिवलिंग को खंडित करेगी, इसलिए वो शिवलिंग के खंडित होने के बाद इससे निकले हिस्सों (टुकड़ों) को एकत्रित करते हैं और मक्खन लगाकर इसे फिर से जोड़ देते हैं. इसके कुछ ही माह बाद यह खंडित शिवलिंग पुनः ठोस रूप में परिवर्तित हो जाता है.

पौराणिक कथा

इस घटना के पीछे की मान्यता है कि प्राचीन काल में कुल्लू घाटी में कुलांत नाम का एक दैत्य रहता था. यह दैत्य कुल्लू के पास की नागरणधार से अजगर का रूप लेकर मंडी से होता हुआ लाहौल स्पीति से माथण गांव आ पहुंचा. 

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इसके बाद यह अजगर के रूप में यह दैत्य कुंडली मारकर ब्यास नदी के बहाव को रोक कर इस स्थान को पानी में डुबो देना चाहता था. उसकी मंशा थी कि इस स्थान के समस्त जीवजंतु पानी में डूबकर मर जाएं. हालांकि भगवान महादेव ने कुलांत दैत्य के इस विचार को भांप लिया.

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फिर तमम प्रयास कर महादेव ने कुलांत को अपने विश्वास में ले लिया. अजगर के रूप में ब्यास नदी के बहाव को रोके बैठे कुलांत के कान में महादेव ने कहा कि तुम्हारी पूंछ में आग लग गई है. पूंछ देखने के लिए कुलांत जैसे ही पीछे मुड़ा तभी महादेव ने उसके सिर पर त्रिशूल से वार कर उसका अंत कर दिया.

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कुलांत के अंत के साथ ही उसका शरीर एक विशालकाय पर्वत में बदल गया. कहा जाता है कि कुल्लू घाटी का बिजली महादेव से रोहतांग दर्रा और उधर मंडी के घोग्घरधार तक की घाटी कुलांत के शरीर से ही बनी थी. कुलांत से ही इसका नाम कुलूत और फिर कुल्लू पड़ा.

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कुलांत के अंत के बाद महादेव ने इंद्र से कहा कि वे हर 12वें साल इस स्थान पर बिजली गिराएं. बिजली इस शिवलिंग पर गिरने के पीछे की वजह यह है कि महादेव नहीं चाहते थे कि बिजली से जनमानस को नुकसान पहुंचे. जिसकी वजह से बिजली शिवलिंग पर गिरती है और इनका नाम बिजली महादेव है. 

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जिसके बाद से हर 12वें वर्ष आकाशीय बिजली गिरने और शिवलिंग के खंडित होन का सिलसिला जारी है. मंदिर के पुजारी भी मक्खन से शिवलिंग को पुनः जोड़ देते हैं और कुछ ही वक्त में यह शिवलिंग पुराने ठोस स्वरूप में आ जाता है.

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हर साल शिवरात्रि पर यहां भारी संख्या में श्रद्धालू आते हैं और महादेव की पूजा-अर्चना, जलाभिषेक करते हैं. हालांकि मंदिर तक पहुंचने के लिए कठिन चढ़ाई करनी पड़ती है. इस मंदिर के मुख्य आकर्षण में इसकी 60 फीट ऊंची ध्वज छड़ है. यह सूर्य की रोशनी में एक चांदी की सुई की तरह चमक बिखेरती है.

First published: 8 April 2016, 17:12 IST
 
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