श्रीकांत बोला: बिना रोशनी की इस कहानी में बहुत उजाले हैं

कैच ब्यूरो | Updated on: 27 May 2016, 10:39 IST
(एजेंसी)

श्रीकांत बोला की आंखें जन्म से नहीं हैं. जब उनका जन्म हुआ था तो लोगों ने उनके माता-पिता को सलाह दी की बोला को किसी अनाथालय में दान कर दें क्योंकि वह जन्मजात अंधे थे.

मगर श्रीकांत के माता-पिता ने समाज की बातों को ठुकराते हुए उनको पाला और बेहतर शिक्षा भी उपलब्ध कराई. आज श्रीकांत ने समाज के सामने अपने अभिवावकों के फैसले को सही ठहराते हुए हैदराबाद में 50 करोड़ से ज्यादा रुपये की संपत्ति वाला कारोबार अपने बल पर खड़ा किया है.

श्रीकांत बोला जिस कंपनी के सीईओ हैं, उसका नाम है बोलांट इंडस्ट्रीज. यह कंपनी अशिक्षित और अपंग लोगों को नौकरी देती है. इस कंपनी के आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक के यूनिटों में पत्तियों और इस्तेमाल किए गए कागजों से ईको-फ्रेंडली पैकेजिंग बनती है.

श्रीकांत के साहस को सलाम करते हुए रतन टाटा ने उनकी कंपनी में इंवेस्ट किया है. हालांकि टाटा ने यह नहीं बताया कि उन्होंने बोला की कंपनी में कितनी पैसा इंवेस्ट किया है.

श्रीकांत की कंपनी के बोर्ड में पीपुल कैपिटल के श्रीनिराजू, डा. रेड्डी लैबोरेटरीज के सतीश रेड्डी और रवि मंथा जैसे बड़े दिग्गज शामिल हैं. लेकिन श्रीकांत के लिए यहां पहुंचना आसान नहीं था. बोला को स्कूल के दिनों में हमेशा रिजेक्शन ही मिलता था. इसके बावजूद उनके माता-पिता ने उन्हें स्पेशल चिल्ड्रन के स्कूल में दाखिला दिलाया. वहां बोला ने हमेशा टॉप किया. 

श्रीकांत बोला पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम के साथ 'लीड इंडिया प्रोजेक्ट' में काम भी कर चुके हैं. बोला को 10वीं में 90 फीसदी अंक हासिल करने के बाद भी उन्हें विज्ञान विषयों में दाखिले के लिए छह महीनों तक इंतजार करना पड़ा था.

इसके बाद किसी तरह उनका एडमीशन 12वीं में हुआ और ऑडियो क्लासेज की मदद से बोला ने 98 फीसदी अंक हासिल किया. श्रीकांत बोला ने साल 2009 में आईआईटी में प्रवेश के लिए परीक्षा दी. लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली. बोला ने हार नहीं मानी और उन्हें लगातार प्रयास करने के कारण मेसाच्यूसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एमआईटी) में प्रवेश मिल गया.

वहां से अध्ययन के बाद भारत लौटने पर श्रीकांत बोला ने 450 कर्मचारियों के साथ अपनी कंपनी शुरू की. श्रीकांत कहते हैं किसी की सेवा करने का मतलब यह नहीं है कि आप ट्रैफिक लाइट के पास बैठे हुए भिखारी को एक सिक्का दें और आगे बढ़ जाएं. सेवा का मतलब होता है कि आप उसे जिंदगी जीने के मौके प्रदान करें.

First published: 27 May 2016, 10:39 IST
 
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