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बिपन चंद्रा की एनबीटी वाली किताब के 14 अंश, जिन्हें आरएसएस नहीं पढ़ाना चाहता

प्रणेता झा | Updated on: 9 September 2016, 8:18 IST
(बिपेन चंद्रा एनबीटी बुक)

मार्च 2015 में जब बलदेव भाई शर्मा नेशनल बुक ट्रस्ट के अध्यक्ष बने, तब उन्होंने कहा था कि वे ‘एनबीटी के काम में किसी तरह का विवाद या राजनीति नहीं लाना चाहते.’ लेकिन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के ‘पांचजन्य’ समाचार पत्र के पूर्व संपादक शर्मा के लिए अपनी बात पर कायम रहना संभव नहीं हो सका.

इसके मात्र सोलह महीने बाद, नौ अगस्त को एनबीटी ने प्रसिद्ध दिवंगत इतिहासकार बिपन चंद्र की समाजशास्त्र की महत्वपूर्ण किताब- ‘कम्यूनलिज्म: अ प्राइमर’ के हिंदी संस्करण की प्रतियां छापने के 49 लाख रुपए का ऑर्डर बिना किसी अधिकारिक खुलासे के अचानक रोक दिया.

किताब के हिंदी संस्करण, ‘सांप्रदायिकता: एक प्रवेशिका’ न केवल सांप्रदायिकता के वैचारिक चरित्र के बारे में है, बल्कि यह आरएसएस और उसकी राजनीतिक पार्टी भारतीय जनता पार्टी की भी तीखी आलोचना करती है. केवल एक समाचार पत्र ने 3,000 कॉपी के प्रिंट ऑर्डर निरस्त करने के एनबीटी के निर्णय को इसके तीन हफ्ते बाद छापा. समाचार पत्र में यह भी कहा गया है कि अंग्रेजी और उर्दू संस्करण को भी रोकने के प्रयास किए गए.

बिपन चंद्रा भी 2004 से 2012 तक एनबीटी, दिल्ली के अध्यक्ष रहे हैं. एनबीटी मानव संसाधन विकास मंत्रालय के अधीन एक शीर्ष स्वायत्त संस्था है. 1957 में स्थापित एनबीटी अंग्रेजी और हिंदी सहित 31 भाषाओं में विभिन्न विषयों से संबंधित किताबें कम कीमत पर छापता है.

भारत में समाजवादी विचारधारा के प्रमुख इतिहासकार चंद्र अगस्त 2014 में 86 वर्ष की उम्र में नहीं रहे, जब नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी सरकार को जनादेश के साथ सत्ता में आए महज 3 महीने हुए थे.‘कम्यूनलिज्म: अ प्राइमर’ से कुछ अंश यहां प्रस्तुत हैं. शायद इससे आप जान सकें कि आरएसएस क्यों नहीं चाहता कि आप इस किताब को पढ़ें.

1- सांप्रदायिकता का प्रसार

‘यह (सांप्रदायिकता) अब स्थानीय और क्षेत्रीय तथ्य नहीं रहा है. राष्ट्रीय सच बन गया है, जो बीजेपी की चुनावी सफलता और पिछले कुछ सालों में आरएसएस के दूसरे मुख्य संगठनों की बढ़ती ताकत से स्पष्ट है. बीजेपी और उसकी जन्मदात्री संस्था आरएसएस अपने कैडर्स की नियुक्ति बहुत ही सख्त और स्पष्ट सांप्रदायिक विचारधारा के आधार पर करती हैं.’

2- रामजन्मभूमि का मुद्दा

‘बीजेपी और उनके साथी संगठन वीएचपी और बजरंग दल, सभी पर आरएसएस का बहुत ही चौकस नियंत्रण है, जो राम जन्मभूमि मुद्दे और उसके धार्मिक अपील से काफी संख्या में हिंदुओं के जेहन में जगह बनाने में सफल रहे और उन्हें सांप्रदायिकता पर लाकर कमजोर कर दिया.’

3- 2012 की गुजरात तबाही

‘जिन लोगों ने हत्याएं और लूटमार की उनकी जबरदस्त निंदा की गई थी और उनके विरुद्ध एक कठोर कार्रवाई की जरूरत थी, पर उस मार-काट के पहले, जिन्होंने सांप्रदायिकता के विरोध में प्रचार किया, उनके ही विरुद्ध कार्रवाई की गई.

यहां तक कि इसके विरोध में सही कदम नहीं लेने, या दंगाइयों का साथ देने के लिए मोदी तक की आलोचना की गई थी, पर इसके महीनों और सालों पहले सांप्रदायिक नफरत का माहौल पैदा किया गया, जिसकी वजह से जनजाति के लोगों ने हत्याकांड में सक्रियता से हिस्सा लिया. किसी ने भी इस बात पर सवाल नहीं उठाया कि नरसी मेहता, गांधी और मोरारजी देसाई के गुजरात को किस ने सांप्रदायिक बना दिया.’

4- बीजेपी के धर्मनिरपेक्ष बनने की संभावना नहीं

‘धर्मनिरपेक्षता की दिशा में बीजेपी के सुधार की बात करना निरर्थक है, क्योंकि बीजेपी के शुरुआती अवतार जनसंघ के संदर्भ में 1977-78 में कइयों ने इसकी कोशिश की थी. या बीजेपी के एनडीए के कई सहयोगी भी मानते थे कि वे ऐसा कर सकते थे, या आरएसएस से अपना अल्पसंख्यक विरोधी नजरिया छोड़ने के लिए, या यह सुझाव देने के लिए कि बिना सांप्रदायिकता के बीजेपी बनी रहेगी. पर ऐसा नहीं हुआ. बिना सांप्रदायिकता के बीजेपी ‘पूरी तौर पर सही’ नहीं रहेगी. यह राजनीतिक धरातल पर जीरो हो जाएगी, और बेजीपी नेता इससे वाकिफ हैं.’

5- अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवाणी

‘जब बीजेपी सत्ता (1998) में आई, मैंने कइयों को यह कहते सुना था कि अटल बिहारी वाजपेयी संजीदा, मृदुभाषी और शालीन व्यक्ति हैं और उनके नेतृत्व में बीजेपी मानवीय बन गई है और अब कम सांप्रदायिक है, खासकर इसलिए क्योंकि वह गठबंधन सरकार में काम करना सीख रही है. पिछली सदी के नब्बे के दशक में, यही तर्क हम एलके आडवाणी के बारे में सुनते थे. यह मत न केवल सहज है बल्कि खतरनाक भी क्योंकि नेता और पार्टियों को उस विचारधारा से अलग नहीं कर सकते, जिसके आधार पर वे आम लोगों के बीच काम करते हैं.

यह आडवाणी की 1990 की रथयात्रा से स्पष्ट है जब उनकी और वाजपेयी की विचारधारा अत्यंत कठिन दौर में थी, खासकर मोदी और गुजरात के नृशंस हत्याकांड और बीजेपी की शिक्षा के सांप्रदायिकरण की नीति को मुरली मनोहर जोशी द्वारा लागू करने के संदर्भ में.’

6- छद्म निरपेक्षवाद’ और ‘अल्पसंख्यकवाद’ के आरोप

‘आरएसएस और बीजेपी द्वारा धर्मनिरपेक्षवाद पर प्रमुख हमले से धर्मनिरपेक्षवाद का वर्णन ‘छद्म निरपेक्षवाद’ और ‘अल्पसंख्यकवाद’ के रूप में किया गया. सांप्रदायिक प्रचार का महत्वपूर्ण हिस्सा, जो आमतौर पर अप्रत्यक्ष रूप से जुबानी किया जाता है, कि धर्मनिरपेक्ष पार्टियां और लोग अल्पसंख्यकों का पक्ष लेकर हिंदुओं को दोयम दर्जे का नागरिक बनाने के लिए कर रहे हैं.लक्ष्य था हिंदुओं के मन में अल्पसंख्यकों द्वारा हावी होने का डर पैदा करने का, जो जनसंख्या का 80 फीसदी हैं. छद्म धर्मनिरपेक्षवाद शब्द में यह निहित है कि जो धर्मनिरपेक्ष बनते हैं, वे सच में नहीं हैं, पर सही मायने में वे हिंदु-विरोधी या मुस्लिम के पक्ष में है. ‘अल्पसंख्यकवाद’ के आरोप में यह निहित है कि वे सच में अल्पसंख्यकों के पक्ष में हैं और हिंदुओं को महत्व नहीं देकर उनका ध्यान रख रहे हैं और हिंदुओं को नीचा दिखा रहे हैं. यह ‘हिंदुओं के विरुद्ध पक्षपात’ और ‘अल्पसंख्यकों का पक्षपातवाद’ नेहरु युग के बाद से लगातार जारी था. धर्मनिरपेक्ष ताकतों की ‘मुस्लिम तुष्टिकरण’ के लिए बराबर आलोचना की जाती रही है.’

7- मुस्लिम तुष्टिकरण’ बस कल्पनाभर

‘तथाकथित ‘मुस्लिम तुष्टिकरण’ के बावजूद, जीवन का कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं है, जहां मुस्लिमों का पक्ष लिया गया हो, न सरकारी सेवाओं में, न ही शिक्षण संस्थाओं, सेना, मीडिया, निजी व्यवसाय या पब्लिक सेक्टर में. वास्तव में मुस्लिमों को मुस्लिमों के तौर पर भी कोई लाभ नहीं मिला. उनका शैक्षिक, आर्थिक और सामाजिक पिछड़ापन पहले जैसा ही बना हुआ है. मसलन सरकारी सेवाओं में मुस्लिमों का प्रतिनिधित्व पहली और दूसरी श्रेणी में 4.5 फीसदी और तीसरी और चौथी श्रेणी में 6 फीसदी है. कारपोरेट सेक्टर में उनके रोजगार का शेयर और भी कम है.’

8- राष्ट्रीयता के नाम पर सांप्रदायिकता

‘सांप्रदायिकता के विरुद्ध वास्तविक संघर्ष राष्ट्रीयता के धरातल पर होगा, क्योंकि संप्रदायवादी खुद को राष्ट्रवादी होने का दावा करते हैं और संप्रदायवादी राष्ट्रवाद का स्वांग भरते हैं.’

9- सांप्रदायिकता के लिए धर्म का शोषण

‘धर्म को आस्था के तौर पर सांप्रदायिकता से अलग करना आवश्यक है, जो आर्थिक और राजनीतिक उद्देश्यों के लिए धार्मिक पहचान की विचारधारा है. दोनों बिलकुल भिन्न हैं. हालांकि धर्म का रास्ता सांप्रदायिकता, धार्मिक संकीर्णता, कट्टरता और रूढ़िवाद की ओर नहीं जाता.

10- ‘भगवा’ को बदनाम किया

‘भगवा, भगवाकरण, संघ परिवार आदि शब्दों को भी नजरअंदाज करना चाहिए. मसलन भगवा हिंदू पुराणों में पवित्र रंग है. यह शिवाजी के झंडे का भी रंग था. भगत सिंह जैसे क्रांतिकारियों ने भगवा झंडे से जयजयकार की. हिंदू संत आमतौर पर भगवा वस्त्र पहनते हैं. हिंदू संप्रदायवादी भगवा को अपनाना चाहें तो उन्हें क्यों सौंपा जाए?’

11- ‘परिवार’ को बदनाम किया

‘इसी तरह ‘परिवार’ शब्द ऐसा है, जो अभीष्ट को दर्शाता है, वह जिसका हम सब हिस्सा बनना चाहेंगे, वह जिसे हम प्यार करते हैं. बीजेपी, बजरंग दल, वीएचपी, हिंदू महासभा आदि परिवार का हिस्सा नहीं हैं और इसलिए उनका उस तरह वर्णन नहीं किया जाना चाहिए. वे आरएसएस के मुख्य संगठन हैं, आरएसएस की सार्वजनिक, राजनीतिक विचारधारा के माध्यम हैं, और उनका इसी तरह से बेहतर वर्णन किया गया है.’

12- धार्मिक-सांस्कृतिक व्यक्तियों और त्योहारों का सांप्रदायिकरण

‘...राम और कृष्ण जैसे सार्वभौमिक रूप से पूजनीय, जिनका हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई सब सम्मान करते हैं, का सांप्रदायिकरण किया गया है. यही हाल दशहरा, दीवाली, होली, देवी-देवताओं और फकीरों के स्थानीय पूजन, मुहर्रम, ईद, शब-ए-बारात, क्रिसमस और गुरु नानक और अन्य सिख गुरुओं की जयंती जैसे धार्मिक, सांस्कृतिक-सामाजिक उत्सवों का है और हाल तक भारत के कई कस्बों और गांवों में, और अब भी कई क्षेत्रों में है, विभिन्न धर्मावलंबियों के बीच सामाजिक सौहार्द का माहौल था, जो एक दूसरे के उत्सव में, शादियों में और अन्य घरेलू अवसरों में शरीक होते थे और अपने सुख-दुख बांटते थे.’

13- बीजेपी सदस्य

‘बीजेपी के अधिकांश सदस्य उदार संप्रदायवादी हैं, कट्टर संप्रदायवादी नहीं. हालांकि आरएसएस के प्रशिक्षित विचारक और संगठन बाद वाली श्रेणी के हैं.’

14- पहले भी अनदेखा किया सांप्रदायिकता का वैचारिक चरित्र

‘कई धर्मनिरपेक्ष लोग और पार्टियां सांप्रदायिक विचारधारा का विरोध करते रहे हैं. इसका एक अच्छा उदाहरण है जिस तरह जनता पार्टी (1977-79) के धर्मनिरपेक्ष और समाजवादी खंड ने जनसंघ के आरएसएस खंड को शैक्षिक संरचना और सरकारी मीडिया में हस्तक्षेप और नियंत्रण करने की अनुमति दी थी. हालांकि अंत में चंद्रशेखर, मधु लिमये और अन्य ने विरोध किया था. इसी तरह से एनडीए में बीजेपी के धर्मनिरपेक्ष सहयोगियों ने आरएसएस-बीजेपी के गठबंधन खंडों को संस्कृति, शिक्षा, युवाओं से जुड़े मामलों से जुड़े मंत्रालय, नौकरशाही और इंटेलिजेंस सर्विसेज से जुड़े ऑल इंडिया रेडियो, दूरदर्शन को भी गृह मंत्रालय को अधिकार में लेने को कहा था.’

First published: 9 September 2016, 8:18 IST
 
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