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जन्मदिन विशेष: गालिब से रूबरू होना है तो पढ़िए उनकी ये उम्दा शायरी

कैच ब्यूरो | Updated on: 27 December 2017, 13:33 IST

गूगल ने उर्दू के महान शायर मिर्जा गालिब का डूडल बनाकर उन्हें 220वां जन्मदिन विश किया है. गालिब का असली नाम मिर्जा असद-उल्लाह बेग खान था. गालिब का जन्म 27 दिसंबर 1797 को मुगल शासक बहादुर शाह के शासनकाल में हुआ था. मिर्जा गालिब आगरा के एक सैन्य परिवार से ताल्लुक रखते थे.

मिर्जा गालिब के साथ एक समय ऐसा भी आया था जब उन्‍हें मुसलमान होने का टैक्‍स भी देना पड़ता था. बताया जाता है कि इस टैक्‍स को उस समय अंग्रेज हुकूमत लगाती थी. एक बार गालिब के पास पैसे नहीं थे और वह पाई-पाई के लिए मोहताज हो गए थे. इस दौरान टैक्स से बचने के लिए गालिब कई हफ्तों तक कमरे में बंद पड़े रहते थे.

 

आपका बता दें कि आगरा की जिस हवेली में मिर्जा गालिब पैदा हुए थे, वह हवेली आज भी है लेकिन अब वहां इंद्रभान इंटर कॉलेज चलता है. आगरा के कालामहल इलाके की ये हवेली गालिब के नाना ने बनवाई थी. हालांकि इस हवेली में उनका बचपन बीता था और 13 साल की उम्र में दिल्ली चले गए. यहां उनके लिए रहना काफी मुश्किलों भरा था.

दरअसल मुस्लिम होने के नाते उन्हें दारोगा से परमिट के लिए टैक्स देना पड़ता था. 'गालिब के खत' नामक किताब
में गालिब ने इस परेशानी का जिक्र भी किया है. ये भी सच है जो परेशानियों का सामना करते हैं वो एक दिन नाम करते हैं. कुछ ऐसा ही गालिब के साथ हुआ. गालिब आज भी अपने अलफाज़ों के जरिए आपके हमारे बीच जिंदा हैं.

मिर्जा गालिब को लोग आम आदमी का शायर भी कहते हैं. इसके पीछे कारण ये है कि हम रोजाना की जिंदगी में कई ऐसे बातें और शेर ऐसे बोल जाते हैं जो उन्हीं की देन हैं. गालिब के कुछ चुनिंदा शेरों आज हम आपको रूबरू कराएंगे. 

हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मेरे अरमां, लेकिन फिर भी कम निकले

तुम सलामत रहो हजार बरस
हर बरस के हों दिन पचास हजार

निकलना ख़ुल्द से आदम का सुनते आए हैं लेकिन
बहुत बे-आबरू हो कर तिरे कूचे से हम निकले

दिल-ए-नादां, तुझे हुआ क्या है
आखिर इस दर्द की दवा क्या है

आह को चाहिए इक उम्र असर होते तक
कौन जीता है तिरी ज़ुल्फ़ के सर होते तक

न था कुछ तो ख़ुदा था कुछ न होता तो ख़ुदा होता
डुबोया मुझको होने ने न होता मैं तो क्या होता

मोहब्बत में नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का
उसी को देख कर जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले

रंज से खूंगर हुआ इंसां तो मिट जाता है गम
मुश्किलें मुझपे पड़ीं इतनी कि आसां हो गईं

First published: 27 December 2017, 12:45 IST
 
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