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कलाम: ऐसे वैज्ञानिक जिन्होंने जीवन राष्ट्र को समर्पित कर दिया

कैच ब्यूरो | Updated on: 15 October 2016, 10:02 IST
(एजेंसी)

देश के पूर्व राष्ट्रपति, 'मिसाइल मैन' और महान वैज्ञानिक अबुल पाकिर जैनुलाबदीन अब्दुल कलाम का जन्म 15 अक्टूबर 1931 को तत्कालीन मद्रास के पम्बन द्वीप पर रामेश्वरम में हुआ था, जो बाद में तमिलनाडु राज्य बना.

उनके पिता जैनुलअाबदीन एक नाविक थे और स्थानीय मस्जिद के इमाम भी थे. उनकी माता अशींमा गृहिणी थी. उनके पिता ने एक नाव खरीद रखी थी, जो रामेश्वरम आने वाले हिंदू तीर्थयात्रियों को एक छोर से दूसरे छोर पर छोड़ते थे.

कलाम अपने चार भाइयों में सबसे छोटे थे और उन्हें एक बहन भी थी. कलाम का बचपन बड़ी ही गरीबी में गुजरा. उन्हें पढ़ाई और परिवार की मदद के लिए के छोटी से उम्र में अखबार बांटने का काम करना पड़ा.

कलाम बचपन से मेधावी छात्र थे. वे घंटो तक पढाई करते थे. खास कर के गणित का अध्ययन. उनकी शुरुआती शिक्षा रामनाथपुरम के स्कूल से हुई. उच्च शिक्षा के लिए कलाम ने तिरुचिराप्पल्ली के सैंट जोसफ कॉलेज में एडमिशन लिया और फिर वहां से 1954 में भौतिक विज्ञान में स्नातक की उपाधि ली.

साल 1955 में कलाम ने मद्रास मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी में अन्तरिक्ष प्रौद्योगिकी अभियांत्रिकी की पढाई की. साल 1960 में कलाम ने मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी से इंजीनियरिंग की पढाई पूरी की.

मद्रास इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी से इंजीनियरिंग की पढाई पूरी करने के बाद कलाम ने रक्षा अनुसन्धान और विकास संगठन (डीआरडीओ) में वैज्ञानिक के तौर पर भर्ती हुए. कलाम ने अपने कैरियर की शुरुआत भारतीय सेना के लिए एक छोटे हेलीकाप्टर का डिजाइन बना कर किया.

डीआरडीओ में कलाम को उनके काम से संतुष्टि नहीं मिल रही थी. कलाम पंडित जवाहर लाल नेहरु द्वारा गठित ‘इंडियन नेशनल कमेटी फॉर स्पेस रिसर्च’ के सदस्य भी थे. इस दौरान उन्हें प्रसिद्ध अंतरिक्ष वैज्ञानिक विक्रम साराभाई के साथ कार्य करने का अवसर मिला.

साल 1969 में उनका स्थानांतरण भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) में हुआ. यहां वो भारत के सॅटॅलाइट लांच व्हीकल  परियोजना के निदेशक के तौर पर नियुक्त किये गए थे. इसी परियोजना की सफलता के परिणामस्वरूप भारत का प्रथम उपग्रह ‘रोहिणी’ पृथ्वी की कक्षा में साल 1980 में स्थापित किया गया.

इसरो में शामिल होना कलाम के कैरियर का सबसे अहम मोड़ था और जब उन्होंने सैटलाइट लांच व्हीकल परियोजना पर कार्य आरम्भ किया तब उन्हें लगा जैसे वो वही कार्य कर रहे हैं जिसमें उनका मन लगता है.

साल 1963-64 के दौरान उन्होंने अमेरिका के अन्तरिक्ष संगठन नासा की भी यात्रा की. परमाणु वैज्ञानिक राजा रमन्ना, जिनके देख-रेख में भारत ने पहला परमाणु परिक्षण किया. कलाम को साल 1974 में पोखरण में परमाणु परीक्षण देखने के लिए भी बुलाया था.

70 और 80 के दशक में अपने कार्यों और सफलताओं से डॉ कलाम भारत में बहुत प्रसिद्ध हो गए और देश के सबसे बड़े वैज्ञानिकों में उनका नाम गिना जाने लगा. उनकी ख्याति इतनी बढ़ गयी थी की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अपने कैबिनेट के मंजूरी के बिना ही उन्हें कुछ गुप्त परियोजनाओं पर कार्य करने की अनुमति दी थी.

भारत सरकार ने महत्वाकांक्षी ‘इंटीग्रेटेड गाइडेड मिसाइल डेवलपमेंट प्रोग्राम’ का प्रारम्भ डॉ कलाम के देख-रेख में किया. वह इस परियोजना के मुख कार्यकारी थे. इस परियोजना ने देश को अग्नि और पृथ्वी जैसी मिसाइलें दी है.

जुलाई 1992 से लेकर दिसम्बर 1999 तक डॉ कलाम प्रधानमंत्री के वैज्ञानिक सलाहकार और रक्षा अनुसन्धान और विकास संगठन (डीआरडीओ) के सचिव थे. भारत ने अपना दूसरा परमाणु परीक्षण इसी दौरान किया था. उन्होंने इसमें एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. आर. चिदंबरम के साथ डॉ कलाम इस परियोजना के समन्वयक थे.

साल 1998 में डॉ कलाम ने ह्रदय चिकित्सक सोमा राजू के साथ मिलकर एक कम कीमत का ‘कोरोनरी स्टेंट’ का विकास किया. इसे ‘कलाम-राजू स्टेंट’ का नाम दिया गया.

एक रक्षा वैज्ञानिक के तौर पर उनकी उपलब्धियों और प्रसिद्धि के मद्देनज़र एनडीए सरकार ने उन्हें साल 2002 में राष्ट्रपति पद का उमीदवार बनाया. उन्होंने अपने प्रतिद्वंदी लक्ष्मी सहगल को भारी अंतर से पराजित किया और 25 जुलाई 2002 को भारत के 11वें राष्ट्रपति के रूप में शपथ लिया.

डॉ कलाम देश के ऐसे तीसरे राष्ट्रपति थे जिन्हें राष्ट्रपति बनने से पहले ही भारत रत्न ने नवाजा जा चुका था. इससे पहले डॉ राधाकृष्णन और डॉ जाकिर हुसैन को राष्ट्रपति बनने से पहले ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया जा चुका था.

उनके कार्यकाल के दौरान उन्हें ‘जनता का राष्ट्रपति’ कहा गया. अपने कार्यकाल की समाप्ति पर उन्होंने दूसरे कार्यकाल की भी इच्छा जताई पर राजनैतिक पार्टियों में एक राय की कमी होने के कारण उन्होंने ये विचार त्याग दिया.

12वें राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल के कार्यकाल के समाप्ति के समय एक बार फिर उनका नाम अगले संभावित राष्ट्रपति के रूप में चर्चा में था परन्तु आम सहमति नहीं होने के कारण उन्होंने अपनी उम्मीदवारी का विचार त्याग दिया.

राष्ट्रपति पद से सेवामुक्त होने के बाद डॉ कलाम शिक्षण, लेखन, मार्गदर्शन और शोध जैसे कार्यों में व्यस्त रहे और भारतीय प्रबंधन संस्थान, शिलांग, भारतीय प्रबंधन संस्थान, अहमदाबाद, भारतीय प्रबंधन संस्थान, इंदौर, जैसे संस्थानों से विजिटिंग प्रोफेसर के तौर पर जुड़े रहे. इसके अलावा वह भारतीय विज्ञान संस्थान बैंगलोर के फेलो, इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ स्पेस साइंस एंड टेक्नोलॉजी, थिरुवनन्थपुरम के चांसलर, अन्ना यूनिवर्सिटी चेन्नई में एयरोस्पेस इंजीनियरिंग के प्रोफेसर भी रहे.

उन्होंने आई. आई. आई. टी. हैदराबाद, बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी और अन्ना यूनिवर्सिटी में सूचना प्रौद्योगिकी भी पढाया था.

कलाम हमेशा से देश के युवाओं और उनके भविष्य को बेहतर बनाने के बारे में बातें करते थे. इसी सम्बन्ध में उन्होंने देश के युवाओं के लिए “व्हाट कैन आई गिव’ पहल की शुरुआत भी की जिसका उद्देश्य भ्रष्टाचार का सफाया है.

देश के युवाओं में उनकी लोकप्रियता को देखते हुए उन्हें 2 बार (2003 और 2004) ‘एम.टी.वी. यूथ आइकॉन ऑफ़ द ईयर अवॉर्ड’ के लिए मनोनीत भी किया गया था. साल 2011 में प्रदर्शित हुई हिंदी फिल्म ‘आई ऍम कलाम’ उनके जीवन से प्रभावित है.

शिक्षण के अलावा डॉ कलाम ने कई पुस्तकें भी लिखी जिनमे प्रमुख हैं, ‘इंडिया 2020: अ विज़न फॉर द न्यू मिलेनियम’, ‘विंग्स ऑफ़ फायर: ऐन ऑटोबायोग्राफी’, ‘इग्नाइटेड माइंडस: अनलीशिंग द पॉवर विदिन इंडिया’, ‘मिशन इंडिया’, ‘इंडोमिटेबल स्पिरिट’ आदि.

देश और समाज के लिए किये गए उनके कार्यों के लिए, डॉ कलाम को अनेकों पुरस्कारों से सम्मानित किया गया. लगभग 40 यूनिवर्सिटीज ने उन्हें मानद डॉक्टरेट की उपाधि दी और भारत सरकार ने उन्हें पद्म भूषण, पद्म विभूषण और भारत के सबसे बड़े नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से अलंकृत किया था.

डॉ कलाम का 27 जुलाई 2015 को शिलांग के इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ मैनेजमेंट में भाषण देने के दौरान शाम तकरीबन 6:35 के आस-पास पोडियम के पास गिरने से मौत हो गई.

तमिलनाडु के रामेश्वरम में 30 जुलाई 2015 को युवाओं के राष्ट्रपति डॉ कलाम का के पी करुम्बू मैदान में पूरे राजकीय सम्मान के अंतिम संस्कार किया गया.

First published: 15 October 2016, 10:02 IST
 
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