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जन्मदिन विशेष: भारत रत्न मदन मोहन मालवीय ने इस देश को दी बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी

कैच ब्यूरो | Updated on: 25 December 2016, 12:11 IST
(एजेंसी)

महामना पंडित मदन मोहन मालवीय, जिन्हें राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने अपना बड़ा भाई बताते हुए कहा था कि मालवीय जी ‘‘भारत निर्माता‘‘ हैं. वहीं, देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें एक ऐसी महान आत्मा कहा, जिन्होंने आधुनिक भारतीय राष्ट्रीयता की नींव रखी.

मदन मोहन मालवीय भारत के महान राजनेता और शिक्षाविद थे. उन्होंने साल 1916 में बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी की स्थापना की.

मदन मोहन मालवीय का जन्म इलाहाबाद में 25 दिसंबर 1861 को हुआ था. वह अपने पिता पंडित बैजनाथ और माता मीना देवी के आठ बच्चों में से एक थे. पांच वर्ष की उम्र में उनकी शिक्षा प्रारंभ हुई और उन्हें महाजनी स्कूल भेज दिया गया.

मालवीय जी के पूर्वज मूलतः मालवा के निवासी थे, इसलिए ये मालवीय कहलाए. मालवीय जी धार्मिक विद्यालय चले गए जहां उनकी शिक्षा-दीक्षा हरादेव जी की देखरेख मेें हुई. यहीं से उनकी सोच पर हिंदू धर्म और भारतीय संस्कृति का प्रभाव पड़ा.

1868 में उन्होंने शासकीय हाईस्कूल में दाखिला लिया. 1879 में उन्होंने मूइर सेंट्रल कॉलेज (इलाहाबाद यूनिवर्सिटी) से मैट्रिक तक की पढ़ाई पूरी की.

1884 में उन्होंने कलकत्ता यूनिवर्सिटी से बीए किया और 40 रुपये मासिक वेतन पर इलाहाबाद जिले में ही शिक्षक बन गए. वह आगे एमए की पढ़ाई करना चाहते थे, लेकिन आर्थिक कारणों से ऐसा नहीं कर पाए.

16 वर्ष की उम्र में मदन मोहन मालवीय का विवाह मिर्जापुर की कुंदन देवी के साथ वर्ष 1878 में हो गया. उनकी पांच पुत्रियां और पांच पुत्र थे.

देश के महान राजनेता और स्वतंत्रता सेनानी के रूप में मदन मोहन मालवीय के जीवन की शुरुआत 1886 में कलकत्ता में दादाभाई नौरोजी की अध्यक्षता में आयोजित भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के दूसरे अधिवेशन में भाग लेने के साथ हुई.

इसी अधिवेशन में उनके द्वारा दिए गए भाषण को वहां मौजूद लोगों ने काफी सराहा. मदन मोहन मालवीय के भाषण का असर सभा में मौजूद महाराज श्रीरामपाल सिंह पर इतना गहरा पड़ा कि उन्होंने साप्ताहिक समाचार पत्र 'हिंदुस्तान' का संपादक बनने और उसका प्रबंधन संभालने की पेशकश की.

ढाई वर्ष तक 'हिंदुस्तान' के संपादक के पद की जिम्मेदारी संभालने के बाद वह एलएलबी की पढ़ाई के लिए इलाहाबाद वापस चले आए.

1891 में उन्होंने अपनी एलएलबी की पढ़ाई पूरी की और इलाहाबाद कोर्ट में प्रैक्टिस करनी शुरू कर दी. 1907 में मदन मोहन मालवीय ने ‘‘अभ्युदय‘‘ नामक हिंदी साप्ताहिक समाचार पत्र निकालना शुरू किया और 1915 में इसे दैनिक समाचार पत्र में तब्दील कर दिया. इस अवधि के दौरान उन्होंने कुछ मासिक पत्रिकाएं और अंग्रेजी में एक दैनिक पत्र भी निकाला.

1909 में पहली बार मदन मोहन मालवीय भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष बने. भारत में स्काउटिंग की स्थापना मदन मोहन मालवीय, जस्टिस विवियन बोस, पंडित ह्रदयनाथ कुंजरू, गिरजा शंकर बाजपेयी, एनी बेसेंट  और जॉर्ज अरुणदले के प्रयासों से हुई. 1913 से स्काउट में भारतीयों को प्रवेश मिलने लगा.

मदन मोहल मालवीय 1912 से 1926 तक इंपीरियल विधानपरिषद के सदस्य रहे. 1919 में इस परिषद को केंद्रीय विधान परिषद का नाम दिया गया.

बनारस में हुए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के 21वें अधिवेशन में मदन मोहन मालवीय ने एक हिंदू यूनिवर्सिटी की स्थापना का विचार सबके सामने प्रस्तुत किया.

1915 में बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी का विधेयक पास हो गया और 4 फरवरी 1916 को बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी की स्थापना हुई.

हालांकि शिक्षा और समाज कल्याण के लिए काम करने के लिए मदन मोहन मालवीय ने अपनी न्यायिक प्रैक्टिस 1911 में ही छोड़ दी थी, लेकिन उन्होंने चौरी-चौरा कांड में दोषी बताए गए 177 लोगों को बचाने के लिए कोर्ट में केस भी लड़ा, सभी को फांसी की सजा सुनाई गई थी. मालवीय जी के प्रयास से 177 में 156 को कोर्ट ने दोष मुक्त कर दिया.

उन्होंने महात्मा गांधी द्वारा 1920 में शुरू किए गए असहयोग आंदोलन में मुख्य भूमिका निभाई और भारतीय इतिहास की दिग्गज हस्तियों जैसे लाला लाजपत राय, जवाहरलाल नेहरू समेत कई अन्य के साथ साइमन कमीशन का विरोध किया.

30 मई 1932 को मालवीय जी ने घोषणा पत्र जारी करके ‘‘भारतीय  खरीदो/ स्वदेशी खरीदो‘‘ आंदोलन पर ध्यान केंद्रित करने की सिफारिश की. जब स्वतंत्रता लगभग मिलने ही वाली थी तब उन्होंने महात्मा गांधी को देश के विभाजन की कीमत पर स्वतंत्रता स्वीकार न करने की राय दी.

मालवीय जी ‘लखनऊ पैक्ट’ के तहत मुस्लिमों के लिए पृथक निर्वाचक मंडल के पक्ष में नहीं थे और 1920 के दशक में खिलाफत आंदोलन में कांग्रेस की भागीदारी के भी विरोध में थे. 1931 में उन्होंने पहले गोलमेज सम्मेलन में भारत का प्रतिनिधित्व किया.

मालवीय जी ने बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी के कुलपति का पद जानेमाने शिक्षाविद सर्वपल्ली राधाकृष्णन के लिए छोड़ दिया, जो बाद में भारत के राष्ट्रपति भी बने. इस दौर में ‘‘हिंदुस्तान टाइम्स‘‘ अपने बुरे दिनों से गुजर रहा था.

मालवीय जी ने ‘‘हिंदुस्तान टाइम्स‘‘ को लोकप्रिय बनाने में अहम भूमिका निभाई. लाला लाजपत राय और एम. आर. जयकर जैसे राष्ट्रीय नेताओं और उद्योगपति घनश्याम दास बिरला के आर्थिक सहयोग से समाचार पत्र ‘‘हिंदुस्तान टाइम्स‘‘ को अपने अधिकार क्षेत्र में ले लिया.

1946 तक वह इसके अध्यक्ष पद पर रहे. मालवीय जी के प्रयास से 1936 में ‘‘हिंदुस्तान टाइम्स‘‘ का हिंदी संस्करण शुरू हो गया, वर्तमान में इस समाचार पत्र का स्वामित्व बिरला परिवार के पास है. इस महान सपूत का निधन लंबी बीमारी के बाद 12 नवंबर 1946 को बनारस में हुआ.

First published: 25 December 2016, 12:11 IST
 
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