Home » इंडिया » दिल्ली उच्च न्यायालय ने जेनरिक एंटी-डायबिटिक की बिक्री पर रोक लगाई
 

डायबिटीज दवा की कीमतों पर शिकंजा कसकर दिल्ली हाईकोर्ट किसका भला कर रही है?

विशाख उन्नीकृष्णन | Updated on: 15 November 2015, 15:43 IST
QUICK PILL
  • 5.07 करोड़ मधुमेह रोगियों के साथ भारत दुनिया की मधुमेह राजधानी है. जबकि \r\nचीन में इनकी संख्या 4.23 और यूनाइटेड स्टेट्स में 2.68 करोड़ है.
  • अनुमान है कि 2035 तक 59.20 करोड़ हिंदुस्तानी मधुमेह से पीड़ित होंगे. उस वक्त हर छह सेकेंड में मधुमेह से एक भारतीय की मौत होगी.

आज 14 नवंबर को विश्व मधुमेह दिवस और बाल दिवस साथ-साथ है. तो शायद इन आंकड़ों से रूबरू होने के लिए यह सही मौका है.

5.07 करोड़ मधुमेह रोगियों के साथ भारत दुनिया की मधुमेह राजधानी है. जबकि चीन में इनकी संख्या 4.23 और यूनाइटेड स्टेट्स में 2.68 करोड़ है.

इंटरनेशनल डायबिटीज फेडरेशन के मुताबिक भारत में प्रतिवर्ष मधुमेह से करीब 10 लाख लोगों की मौत हो जाती है. जो किसी भी अन्य देश की तुलना में काफी ज्यादा है.

एक अनुमान है कि 2035 तक 59.20 करोड़ हिंदुस्तानी मधुमेह से पीड़ित होंगे. यानी औसतन हर तीसरा आदमी डायबिटीज का मरीज होगा. तब सालाना इससे मरने वालोंं का आंकड़ा 51 लाख तक पहुंच जाएगा.

यह चौंकाने वाले आंकड़े देखते हुए उम्मीद की जानी चाहिए कि सरकार इस स्वास्थ्य संकट से निपटने के लिए पूरी तरह चौक चौबंद होगी. विशेषरूप से इस बीमारी से लड़ने वाली सस्ती जीवन रक्षक दवाओं की उपलब्धता बनाए रखने के लिए.

इन सबके लिए नेशनल फार्मास्यूटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (एनपीपीए) ने सिर्फ इतना किया है कि 11 नवंबर को मधुमेह समेत विभिन्न रोगों के इलाज में इस्तेमाल की जाने वाली 18 दवाओं की कीमत निर्धारित कर दी है. इनमें सिप्ला, मर्क, फ्रैंको इंडियन, एलेंबिक फार्मा और यूनीकेम जैसी प्रमुख दवा कंपनियों द्वारा निर्मित दवाएं शामिल हैं.

यह वास्तव में न्यायपालिका द्वारा मधमुेह रोगियों को सस्ती दवाएं उपलब्ध कराने के प्रयासों के लिए एक झटका है.

न्यायालय ने क्या किया?

बीते माह की शुरुआत में दिल्ली उच्च न्यायालय ने मुंबई की ग्लेमार्क फार्मा को उनकी एंटी-डायबिटिक दवा जीटा और जीटा मेट की बिक्री, वितरण या निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया था. इसका कारण यह था कि कंपनी ने यूएस की मर्क शार्प और डोह्मे कॉर्प के पेटेंट का उल्लंघन किया था.

2013 में लॉन्च की गई ग्लेनमार्क की दवा मर्क शार्प की जेनुइन दवा का सस्ता और जेनेरिक विकल्प है. अदालत ने पाया कि मर्क शार्प द्वारा खोजे और पेटेंट कराए गए अणु सिटाग्लिप्टिन पर आधारित यौगिक सीटाग्लिप्टिन फॉस्फेट मोनोहाइड्रेट का इस्तेमाल कर ग्लेनमार्क जीटा और जीटा मेट दवा बना रही है.

और क्योंकि बिना सीटाग्लिप्टिन का उत्पादन किए ग्लेनमार्क इस यौगिक को नहीं बना सकती, इसलिए अदालत ने फैसला सुनाया कि कंपनी मर्क शार्प की दवा के जेनेरिक वर्जन नहीं निर्मित कर सकती. हालांकि कंपनी पहले से जिन दवाओं का उत्पादन कर रही थी, उनकी बिक्री जारी रख सकती है.

ग्लेनमार्क ने तर्क दिया था कि वो सीटाग्लिप्टिन को फॉस्फेट के साथ इस्तेमाल कर रही है, जो एक अलग तत्व होने के साथ ही उनकी दवाओं को मर्क द्वारा पेटेंट कराई गई दवा से रासायनिक और भौतिक गुणों में पर्याप्त रूप से अलग बनाता है.

वहीं, दूसरी ओर मर्क द्वारा इंडियन पेटेंट्स एक्ट 1970 की धारा 48 का तर्क दिया गया. जिसमें पेटेंट कराने वाली कंपनी के पास "किसी तीसरे पक्ष को उसके उत्पाद को बनाने, इस्तेमाल करने, बिक्री करने, बिक्री की पेशकश करने या भारत में आयात करनेे से रोकने" के विशेष अधिकार दिए गए हैं. हालांकि, राष्ट्रीय स्वास्थ्य की आपात स्थिति में इस पेटेंट को रद्द किया जा सकता है.

मर्क के प्रवक्ता ने कहा कि अदालत के फैसले से कंपनी बहुत खुश है. वैसे ग्लेनमार्क पर पेटेंट उल्लंघन के लिए जुर्माना तो नहीं लगाया गया लेकिन उसे मर्क को मुकदमेबाजी में खर्च हुई रकम का भुगतान करना होगा.

रोगियों के लिए इसके मायने

अदालत के फैसले का सबसे प्रत्यक्ष प्रभाव कीमत पर पड़ेगा. मर्क द्वारा बेची जा रही 43 रुपये की दवा की तुलना में जीटा 50 ग्राम टेबलेट की कीमत 14 रुपये है. यानी अब हिंदुस्तानी मधुमेह मरीजों को महंगी दवा खरीदने के लिए मजबूर होना पड़ेगा.

इस मुद्दे को भी अदालत के समक्ष उठाया गया लेकिन पीठ ने फैसले में कहा कि यह कोई आधार नहीं है जिसपर किसी निर्माता को सस्ती जेनेरिक दवा बनाने की अनुमति दी जाए.

यह मरीजों को कैसे प्रभावित करेगा? ज्यादातर डॉक्टरों का दावा है कि एंटी-डायबिटिक ड्रग चाहे वो जेनेरिक हों या नहीं, ज्यादातर मरीज इनकी कीमत चुकाने में असमर्थ हैं.

फोर्टिस में सी-डॉक (मधुमेह केंद्र) के प्रमुख डॉ. अनूप मिश्रा कहते हैं, "खुराक के हिसाब से हर मरीज का मासिक खर्च 900-1600 रुपये है. जो इसे अधिकांश हिंदुस्तानी मरीजों से दूर करती है. क्योंकि हर मधुमेह रोगी को जीवनभर दवाएं लेनी होती हैं, इसलिए सस्ती दवाएं उनके लिए काफी मददगार साबित होंगी."

बौद्धिक संपदा अधिकारों का मतलब

इस फैसले से बौद्धिक संपदा अधिकारों का समर्थन करने वाले काफी उत्तेजित हैं. कोलकाता स्थित राष्ट्रीय न्यायिक विज्ञान विश्वविद्यालय में आईपी चेयर के संस्थापक शमशाद बशीर कहते हैं, "मूल्य नियंत्रण के लिए पेटेंट निर्णयों की आड़ नहीं ली जानी चाहिए. यदि सरकार समझती है कि दाम ज्यादा हैं तो वो मूल्य नियंत्रण कर कीमत तय कर सकती है."

आईपी वकीलों ने इस फैसले का स्वागत करते हुए तर्क दिया कि यह बहुराष्ट्रीय फार्मा कंपनियों को आश्वासन देगा कि भारत में पेटेंट उल्लंघन के मामलों से निपटने के लिए आईपी संस्था काफी सख्त है. यूएस और यूरोपीय संघ वहां के फार्मा दिग्गजों के लाभ के लिए भारत पर काफी लंबे वक्त से अपने पेटेंट कानून बदलने के लिए दबाव बना रहे हैं.

इंडियन फार्मास्यूटिकल अलायंस (आईपीए) के महासचिव डीजी शाह कहते हैं, "अदालत के इस फैसले से सरकार और आईपीए को यूएस समेत तमाम आलोचकों को यह जवाब देने का मौका मिला है कि भारत की आईपी संस्था आईपी अधिकारों के संरक्षण और लागू करने में किसी तरह का समझौता नहीं करती."

आईपीए ने हाल ही में वाणिज्य मंत्री निर्मला सीतारमण को पत्र लिखकर आग्रह किया था कि अमेरिका के दबाव में आकर सरकार आईपी संस्था पर शिकंजा न कसे.

बौद्धिक संपदा संबंधी मामलों को संभालने वाली कानूनी फर्म टीएमटी के प्रबंधकीय साझेदार अभिषेक मल्होत्रा ने कहा, "यह मामला कंपनियों को फिर से आश्वस्त करेगा कि दीवानी मामलों को भी शीघ्रता से निपटाया जा सकता है. इस मामले को दाखिल करने से लेकर निपटाने तक में हाईकोर्ट ने केवल दो साल का वक्त लिया."

यह सबकुछ बड़ी फार्मास्यूटिकल कंपनियों के लिए तो सही है, लेकिन क्या यह रोगियों के लिए बेहतर साबित होगा?

First published: 15 November 2015, 15:43 IST
 
विशाख उन्नीकृष्णन @sparksofvishdom

A graduate of the Asian College of Journalism, Vishakh tracks stories on public policy, environment and culture. Previously at Mint, he enjoys bringing in a touch of humour to the darkest of times and hardest of stories. One word self-description: Quipster

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