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बीजेपी आलाकमान से नाराज असम बीजेपी ईकाई

कैच ब्यूरो | Updated on: 25 February 2016, 23:21 IST
QUICK PILL
  • अहोम, मटोक, शोतिया, कोच राजबंधी और टी ट्राइब्स समेत छह समुदाय एसटी का दर्जा दिए जाने की मांग कर रहे हैं. हालांकि बीजेपी आलाकमान अभी तक इस बारे में कोई फैसला नहीं कर पाई है.
  • राज्य बीजेपी ईकाई चाहती है कि सरकार असम विधानसभा चुनाव से पहले यह बिल संसद में पेश करे या फिर इस बारे में अध्यादेश लाकर स्थिति साफ करे. असम बीजेपी को लगता है कि सरकार इस बिल की मदद से असम की राजनीति में बड़ा बदलाव ला सकती है.

असम बीजेपी का एक धड़ा पार्टी आलाकमान से बिलकुल भी खुश नहीं है. कारण यह है कि सरकार राज्य के छह मूल समुदाय को एसटी का दर्जा दिलाए जाने की प्रक्रिया में देरी कर रही है. 

राज्य बीजेपी ईकाई चाहती है कि सरकार असम विधानसभा चुनाव से पहले यह बिल संसद में पेश करे या फिर इस बारे में अध्यादेश लाकर स्थिति साफ करे. असम बीजेपी को लगता है कि सरकार इस बिल की मदद से असम की राजनीति में बड़ा बदलाव ला सकती है.

अहोम, मटोक, शोतिया, कोच राजबंधी और टी ट्राइब्स समेत छह समुदाय एसटी का दर्जा दिए जाने की मांग कर रहे हैं. बीजेपी के एक बड़े पदाधिकारी ने कहा, 'प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दो बार कह चुके हैं कि वह छह समुदायों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देंगे. कई बार हमने केंद्रीय नेतृत्व को इस मसले की अहमियत के बारे में बताया है लेकिन ऐसा लगता है कि इसका कोई असर नहीं हो रहा है.'

बढ़ रहा दबाव

19 जनवरी को मोदी ने गुवाहाटी में इस समुदाय के प्रतिनिधिमंडल को चुनाव से पहले 'अच्छी खबर' सुनने का भरोसा दिया था. मामले का अध्ययन करने के लिए चार सांसदों की कमेटी बनाई गई थी जिसे अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपने का आदेश दिया गया था.

लेकिन करीब एक महीने बाद भी सरकार की तरफ से इस दिशा में कोई पहल नहीं की गई है. 22 फरवरी को करीब 5,000 से अधिक कार्यकर्ताओं ने कोकराझाड़ में रेलवे ट्रैक  को बाधित कर दिया था ताकि केंद्र सरकार पर अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिए जाने को लेकर दबाव बनाया जा सके. 

सरकार के सुस्त रवैये को देखते हुए ऊपरी असम के इलाके में अहोम, मोरान और मटोक समुदाय की तरफ से होने वाले विरोध की आशंका से खारिज नहीं किया जा सकता. बीजेपी के एक गुट का मानना है कि कांग्रेस राजनीतिक फायदे के लिए इन समुदायों को आंदोलन के लिए भड़का सकती है.

कैसे होगा बदलाव ?

बीजेपी के अन्य कार्यकर्ताओं का भी यही मानना है. मामले की तरफ ध्यान खींचे हुए एक पूर्व सांसद ने कहा कि इन समूहों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिए जाने से बीजेपी को दुहरा फायदा होगा. क्योंकि इससे उन समुदायों की मांग पूरी होगी वहीं दूसरी तरफ बांग्लादेशी घुसपैठ की समस्या से निपटने में मदद मिलेगी.

अगर इस मांग को स्वीकार कर लिया जाता है तो जमीन की खरीद बिक्री को नियंत्रित करने में मदद मिलेगी जैसा कि अन्य राज्यों मसलन मेघालय, नागालैंड, मिजोरम और अरुणाचल प्रदेश में है. मणिपुर और त्रिपुरा में भी आदिवासियों की जमीन की खरीद बिक्री पर पाबंदी लगी है.

सरकार की सुस्ती

असम में जिस प्रावधान की मदद से विदेशी घुसपैठियों की पहचान कर उन्हें वापस भेजा जाना था, वह अभी भी कागजों पर ज्यादा है. करीब 30 पहले केंद्र सरकार और ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन के बीच इसे लेकर समझौता हुआ था.

2001 और 2011 की जनगणना में बांग्लादेश की सीमा से लगे इलाकों में मुस्लिमों की आबादी में अप्रत्याशित बढ़ोतरी हुई है. 1998 में असम के पूर्व लेफ्टिनेंट जनरल एस के सिन्हा ने जनसंख्या में हो रहे बदलावों को रोकने के लिए तत्काल उपाए किए जाने की दिशा में राष्ट्रपति को 41 पन्नों की रिपोर्ट सौंपी थी.

हालांकि रिपोर्ट पर अभी तक कोई कार्रवाई नहीं की गई है. 3 जनवरी को गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने भी गुवाहाटी में कहा था कि उनके पास ऐसी किसी रिपोर्ट की जानकारी नहीं है. 

शुरुआत में उल्फा के बातचीत के समर्थक धड़े के अगुआ अरबिंद राजखोआ ने भी इस तरह की मांग रखी थी. नई दिल्ली में कई दौर की बातचीत में शामिल रहे उल्फा के नेता ने कहा कि केंद्र ने इस बारे में अपना वादा पूरा करने का आश्वासन दिया था.

राजनाथ सिंह ने आदिवासी मामलों के मंत्री से पिछले साल मुलाकात की थी. सूत्रों के मुताबिक मंत्रालय ने असम के इन समुदायों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिए जाने की मांग को लेकर आपत्ति जताई है. 

केंद्र सरकार और उल्फा  के बातचीत समर्थक धड़े के बीच होने वाली बातचीत में इस मसले के उठने की संभावना है. वहीं उल्फा के महासचिव अनूप चेतिया ने साफ कहा कि 'उल्फा केंद्र सरकार के साथ समझौते को लेकर जल्दबाजी में नहीं है.'

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First published: 25 February 2016, 23:21 IST
 
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