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तो यही था भाजपा का कांग्रेस मुक्त भारत का तरीका?

पाणिनि आनंद | Updated on: 10 February 2017, 1:51 IST
QUICK PILL
  • केंद्र सरकार ने उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया है. वहां कांग्रेस के \r\nनेतृत्ववाली राज्य सरकार को असंवैधानिक बताते हुए राज्य में राष्ट्रपति \r\nशासन लागू करने की संस्तुति दी गई है.
  • भाजपा इससे पहले यही प्रयोग अरुणाचल प्रदेश में भी कर चुकी है. वहां \r\nकांग्रेस की सरकार गिराने में भाजपा की अहम भूमिका रही. कांग्रेस के सामने \r\nअगला संकट मणिपुर का है.

बीरबल का एक किस्सा बहुत लोकप्रिय है. अकबर ने दरबार में कहा कि लकीर को बिना मिटाए या काटे छोटा करो. सब परेशान थे लेकिन बीरबल ने उसके समानान्तर एक बड़ी लकीर खींच दी और साबित किया कि कैसे खुद को बड़ा करके भी दूसरों को छोटा किया जा सकता है. विडंबना यह है कि भारतीय जनता पार्टी ने शायद बीरबल की यह कहानी नहीं सुनी है या वह इसके लिए हरगिज़ तैयार नहीं है.

मामला उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन लागू करने का है. वहां कांग्रेस के नेतृत्ववाली राज्य सरकार को असंवैधानिक बताते हुए राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया है. भले ही इसके लिए ईधन कांग्रेस की अपनी अंतर्कलह से आया हो, लेकिन उस बगावत को हवा देना और फिर हरीश रावत के नेतृत्ववाली सरकार को भंग करके राष्ट्रपति शासन लागू करना भाजपा का ही खेल है.

बीजेपी कांग्रेस शासित प्रदेशों में आपसी कलह को हवा दे रही है. अरुणाचल प्रदेश के बाद उत्तराखंड की सरकार गिरी चुकी है

भाजपा इससे पहले यही प्रयोग अरुणाचल प्रदेश में भी कर चुकी है. वहां कांग्रेस की सरकार गिराने में भाजपा की अहम भूमिका रही. कांग्रेस के सामने अगला संकट मणिपुर का है. वहां भी कांग्रेस के असंतुष्टों को भाजपा की ओर से प्रश्रय मिल रहा है. ऐसी ही स्थितियां हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक में भी बनती नज़र आ रही हैं. भाजपा कांग्रेस के गढ़ों में खेल खेल रही है. उसकी मंशा पिछले दरवाजे से कांग्रेस शासित सूबों में काबिज होने की दिख रही है.

राजनीति में ऐसा होता है लिहाजा इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है. लेकिन यह तभी स्वीकार्य है जब संविधान और कानूनों के दायरे में हो. लेकिन क्या केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार का कांग्रेस मुक्त भारत का नारा इसी तरह साकार होगा जिस तरीके से वह एक के बाद एक कांग्रेस शासित सूबों को अस्थिर कर रही है? यह सवाल सिर्फ विपक्षी दल ही नहीं बल्कि खुद भाजपा और संघ के भीतर भी उठ रहे हैं.

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चिंता के मूल में सुरसा की तरह सिर उठाए खड़े पांच राज्यों के आगामी विधानसभा चुनाव हैं. इसके अलावा अगले एक में कई अन्य राज्यों के भी चुनाव होने हैं. फिलहाल पांच राज्यों में चुनाव प्रचार गति पकड़ चुका है. ये राज्य तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, पुडुचेरी, असम और केरल हैं. इसके तुंरत बाद ही पंजाब, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के लिए चुनावी राजनीति की कमाने तन जाएंगी. दिक्कत यह है कि इन सभी आठ राज्यों में भाजपा की हालत पतली है.

एक असम में भाजपा को जीत की उम्मीद है. वह भी 15 साल के कांग्रेस शासन से लोगों के मोहभंग पर निर्भर है. मोहभंग का नारा काम करेगा तो भाजपा को बढ़त मिलेगी लेकिन अभी तक के आकलन बताते हैं कि भाजपा को अति उत्साहित होने की ज़रूरत नहीं है और फिलहाल मुका़बला कांटे का है.

लेकिन बाकी राज्यों में भाजपा को अस्तित्व की लड़ाई लड़नी पड़ रही है. तमिलनाडु में भाजपा के पास ज़मीन का संकट है. केरल में कुछ वोट तो मिलेंगे पर सीटें दहाई को छू जायं तो बड़ी बात मानी जाएगी. पश्चिम बंगाल में भी कमोबेश स्थिति ऐसी ही बनती नज़र आ रही है. भाजपा के पास बचाव के लिए एक तर्क हो सकता है कि इन राज्यों में तो वो सत्ता में हैं भी नहीं और अधिकतर राज्य उनके गढ़ नहीं रहे.

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लेकिन पंजाब, उत्तराखंड के लिए ऐसा कह पाना भाजपा के लिए संभव नहीं होगा. इन सबसे बड़ी साख का मसला उत्तर प्रदेश का चुनाव होगा. सूबे की 80 संसदीय सीटों में से 73 भाजपा के पास हैं जो कि ऐतिहासिक है. लेकिन इस इतिहास पर विधानसभा चुनाव में पानी फिरने की प्रबल संभावना जताई जा रही है.

जिन पांच राज्य में अगले दो महीने में विधान सभा चुनाव होने वाले हैं उनमें कहीं भी बीजेपी मजबूत नहीं है

भाजपा इस मामले में रणनीतिक रूप से सुस्त और भटकी हुई दिख रही है. उत्तर प्रदेश में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष का मसला उसके गले की हड्डी बन गया है. पंजाब में भाजपा के सामने अकाली दल (बादल) के साथ बने रहने या अलग होने की दुविधा है.

उत्तराखंड की मौजूदा स्थिति भाजपा के लिए अलग किस्म की मुसीबत ला सकती है. मौजूदा विधानसभा का कार्यकाल एक साल से भी कम बचा था. वहां भाजपा ने तोड़फोड़ का षडयंत्र रच कर खुद को खलनायक की भूमिका में ला खड़ा किया है. जो सरकार कमज़ोर और अंतर्कलह का शिकार दिख रही थी उसे भंग कर भाजपा ने हरीश रावत को लोगों की सहानुभूति का पात्र बना दिया है.

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भाजपा और संघ के कुछ नेताओं का आकलन है कि "अगले कुछ महीनों में उत्तराखंड में चुनाव होना था. कांग्रेस के पास जीतने की गुंजाइश कम थी. लेकिन राष्ट्रपति शासन लगाकर भाजपा ने हरीश रावत को राजनीतिक लाभ की स्थिति में पहुंचा दिया है. रणनीतिक रूप से यह उल्टा पड़ सकता है.” संघ के अंदर यह सोच है कि ऐसी कोशिशें कोई दीर्घकालिक फायदा पहुंचाने का उपाय नहीं हैं.

संकट यह है कि राज्यों के मामलों को संभालने वाली जो टीम अमित शाह के पास है, उसे राज्यों में भाजपा के प्रदर्शन से ज़्यादा लाभ तोड़फोड़ करके, कांग्रेसी सरकारों को अस्थिर करके अपने कितने नंबर बढ़ाने से मिलता है. पार्टी के लिए भले ही यह तात्कालिक जीत हो लेकिन इससे अगले चुनाव में भाजपा को कोई बड़ा लाभ मिल सकता है, इसकी गुंजाइश कम है.

शार्टकट मुक्ति जनमानस में कोई सकारात्मक और अनुकूल संदेश नहीं भेजती बल्कि वह खुद पार्टी के लिए ही ख़तरा हो सकती है. ताकत के नशे में शायद भाजपा आज यह बात नहीं समझ रही है.

First published: 29 March 2016, 8:37 IST
 
पाणिनि आनंद @paninianand

सीनियर असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़. बीबीसी हिन्दी, आउटलुक, राज्य सभा टीवी, सहारा समय इत्यादि संस्थानों में एक दशक से अधिक समय तक काम कर चुके हैं.

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