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भाजपा के दलित एजेंडे पर फिरा पानी

अतुल चंद्रा | Updated on: 7 February 2017, 8:25 IST
QUICK PILL
  • उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के पहले बीजेपी की नजर राज्य के दलित और ओबीसी वोट बैंक पर है. 2011 की जनगणना के मुताबिक उत्तर प्रदेश में इनकी आबादी करीब 60 फीसदी है. 
  • हालांकि रोहित वेमुला की आत्महत्या और गुजरात के उना में दलितों की पिटाई के बाद पार्टी को इस वोट बैंक का नुकसान हो सकता है. 
  • गुजरात के उना में कथित गौरक्षकों की दलितों की पिटाई के बाद बीजेपी रक्षात्मक मुद्रा में है. उत्तर प्रदेश चुनाव में पार्टी को इसका नुकसान उठाना पड़ सकता है.

यूपी में होने वाले अगले साल के चुनावों में भाजपा ने दलितों (ओबीसी) से काफी उम्मीदें लगाई थीं. 2011 की जनगणना के अनुसार इनके वोट कुल वोटों का लगभग 60 फीसदी है, जिनसे भाजपा का एक दशक बाद सत्ता में लौटना पक्का हो सकता था.

पार्टी राज्य की छोटी-मोटी घटनाओं को संभालने में विफल रही. इससे दलितों को अपने पक्ष में करने की उनकी योजनाओं पर विराम लग गया. 

17 जनवरी 2016 को हैदराबाद विश्वविद्यालय के शोध छात्र रोहिथ वेमूला की आत्महत्या और 12 जुलाई 2016 को गुजरात के उना शहर में गौ रक्षकों ने जिस तरह चार दलित युवाओं की सरेआम पिटाई की, उससे लगता है, भगवा पार्टी पर दलितों का भरोसा नहीं रहा है. 

ऐसा हाल में यूपी की दो रैलियों में नजर आया. ये रैलियां भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने आयोजित की थीं. उनकी हवा तब निकल गई, जब इस साल 31 जुलाई को आगरा में दलित रैली को निरस्त करना पड़ा. रैली में उम्मीद के हिसाब से लोग नहीं थे. 40,000 लोगों के भीड़ की उम्मीद थी. भाजपा ने जिन बुद्ध धम्म यात्रा के लोगों को स्पॉन्सर किया था, उन्हें भी इस रैली में शामिल होना था.

भाजपा ने अधिकारिक रूप से कहा कि इस आयोजन का सारा मजा बारिश ने किरकिरा कर दिया. जबकि भाजपा पर नजर रखने वालों का कहना था कि दलित उनके दिवास्वप्न से बाहर आ गए हैं और बहुजन समाज पार्टी सुप्रीमो मायावती के साथ हो गए हैं. 

16 सितंबर को बसपा दलबदलू जुगल किशोर की एक अन्य रैली में इतने कम लोग थे कि अमित शाह रैली की जगह से तुरंत निकल गए. रैली का आयोजन लखनऊ के रामबाई रैली स्थल पर होना था.

अागरा में होने वाली रैली को बीजेपी को आखिरी समय में निरस्त करने के लिए मजबूर होना पड़ा.

ओबीसी नेता स्वामी प्रसाद मौर्य ने भी अपना प्रभाव दिखाने के लिए उसी स्थान पर 22 सितंबर को रैली रखी, जो अपेक्षाकृत बेहतर रही. ये वही मौर्य हैं, जिन्होंने विधानसभा में विपक्ष के नेता होने के बावजूद मायावती को छोड़ दिया था. भाजपा नेताओं ने कहा कि स्थान की साइज ऐसी है कि लोगों की मौजूदगी गौण लग रही थी.

जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर बद्री नारायण ने कहा कि रोहिथ वेमूला की आत्महत्या और उना की घटना ने दलित मतदाताओं को निराश किया है. वे अब जानते हैं कि उन्हें अगले चुनावों में किसे वोट करना है.

मौर्य की रैली को लेकर उनका कहना था कि जाति समान रूप से वोट नहीं करती, इसलिए उनका मायावती को छोडऩा बसपा के वोट बैंक पर कोई बड़ा असर नहीं डालेगा.

उन्होंने बसपा काडर की टिप्पणी कि पार्टी लीडर्स बनाने की फैक्टरी है. उन्होंने दुहराया कि मायावती को हाल में छोडऩे से उनकी संभावनाओं पर कोई गलत असर नहीं पड़ेगा. मायावती खुद मानती हैं कि समाज नेताओं को बनाता है. 

अमित शाह के दलितों से वोट पाने के फैसले से पहले ही कुंभ में भाजपा की उम्मीदों पर पानी फिरता नजर आया था.

भाजपा ने बाबासाहेब भीम राव अंबेडकर के सम्मान में पांच स्थानों को पंचतीर्थ के रूप में विकसित करने की घोषणा की थी. पंचतीर्थ इन जगहों पर बनने थे-अंबेडकर का जन्मस्थान महू, छात्र जीवन में लंदन में रहे वह स्थान , नागौर में ‘दीक्षा भूमि’, जहां उन्होंने शिक्षा पाई, दिल्ली में महापरिनिर्माण स्थल, और मुंबई में चैतन्य भूमि.

हैदराबाद और उना हादसों का आघात भाजपा के दलित एजेंडे पर भारी पड़ता नजर आ रहा है.

इस साल मई में भाजपा अध्यक्ष उज्जैन में थे और कुछ दलित संतों के साथ उन्होंने क्षिप्रा में डुबकी भी लगाई थी. इसे ‘समरसता स्नान’ नाम दिया गया. सामाजिक सद्भाव स्नान.

चुनावों से पहले दलितों के घर खाना खाना राजनीतिक फैशन हो गया है. शाह ने भी वाराणसी में दलितों के साथ दोपहर का खाना खाया. 

इन सब झलकियों से साफ है कि यूपी में भाजपा को दलितों के वोट शायद ही ल सकेंगे. हैदराबाद और उना हादसों का आघात भाजपा के फायदे पर भारी पड़ गया है, जो उन्हें शुरू में मिल सकता था. इस प्रक्रिया में सत्ता की दौड़ में बसपा भाजपा से आगे निकल गई है.

अप्रैल 2016 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नोएडा में स्टैंड अप इंडिया स्कीम शुरू की थी. स्कीम अनुसूचित जाति और औरतों के लिए है, जिन्हें अपना उद्यम शुरू करने के लिए 10 लाख से 1 करोड़ रुपए तक का ऋण मिल सकता है. इस स्कीम को शुरू करने के लिए प्रधानमंत्री ने बाबू जगजीवन राम की जयंती का दिन चुना, जो सालों कांग्रेस पार्टी में दलित चेहरा रहे.

First published: 25 September 2016, 7:25 IST
 
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