Home » इंडिया » BJP govt in Gujarat recommends Modi's schemes as PhD topics
 

पीएम मोदी की योजनाओं पर गुजरात में होगी पीएचडी

सुधाकर सिंह | Updated on: 28 April 2016, 14:24 IST

शिक्षा के हर क्षेत्र में अपनी पैठ बनाने के बीजेपी के प्रयासों को आगे बढ़ाते हुए अब गुजरात सरकार ने विश्वविद्यालय के छात्रों पर पीएचडी में थीसिस के विषयों को थोपने की शुरुआत की है.

गुजरात सरकार ने एक बेहद चौंकाने वाला फैसला लेते हुए राज्य के विश्वविद्यालयों में पीएचडी करने के लिये दाखिला लेने वाले छात्रों द्वारा लिखी जाने वाली डाॅक्टरेट थीसिस से संबंधित विषयों की एक पूरी सूची ही तैयार कर दी है.

अगर आप शोध करने के लिये राज्य के शिक्षा विभाग द्वारा सूचीबद्ध किये गए 82 विषयों पर एक सरसरी निगाह डालेंगे तो तस्वीर साफ हो जाएगी. यह सूची राज्य सरकार की शैक्षिक दायरे में अपनी योजनाओं को बढ़ावा देने की सोच सामने लाती है. इनमें से अधिकतर योजनाएं ऐसी हैं जिन्हें वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात का मुख्यमंत्री रहते प्रारंभ किया था या फिर उनका नाम बदला था.

पीएचडी छात्रों के अनुसंधान के लिये विषयों को सुझाना सरकार का काम नहीं है: प्रो.शाह

वास्तव में पीएचडी छात्रों के लिये थीम विषय के रूप में चुने गए 82 विषय गुजरात में मोदीराज की उन चुनिंदा कल्याणकारी योजनाओं पर आधारित हैं जो वर्ष 2001 यानि करीब 15 वर्षों से संचालित हो रही हैं.

इसके अलावा इस सूची में ‘‘मां अन्नपूर्णा’’ योजना जैसे कुछ अपवाद भी शामिल हैं जो यूपीए सरकार के खाद्य सुरक्षा अधिनियम का ही बदला हुआ स्वरूप है. इस योजना को लागू करने को लेकर राज्य सरकार के नकारात्मक रवैये पर सुप्रीम कोर्ट की कड़ी फटकार के बाद इसी वर्ष एक अप्रैल से गुजरात सरकार ने अपने यहां लागू किया है.

पढ़ें; उच्च शिक्षा की हालत सुधारने के लिए उच्चतर प्राथमिकता देने की जरूरत है

‘साॅयल हेल्थ कार्ड’, ‘सुजलाम सुफलाम योजना’, ‘मिड डे मील’, ‘मुख्यमंत्री अंतरिम योजना’, ‘चिरंजीवी योजना’, ‘गुणोत्सव’, ‘कन्या केल्वनी’, ‘महिला हेल्पलाइन’, ‘सोया आधारित गेहूं की भूमिका’, ‘108 आपातकालीन सेवा’ और ‘जल बचाओ अभियान’ गुजरात सरकार की उन चुनिंदा योजनाओं में से हैं जिन्हें गुजरात के विश्वविद्यालयों से पीएचडी करने वाले छात्रों के लिये विषयों के रूप में चुना गया है.

अधिकतर मामलों में रिसर्च का दायरा योजनाओं के ‘सामाजिक-आर्थिक लाभ’ का विश्लेषण करने पर केंद्रित है.

हालांकि कहीं भी इस सूची में यह नहीं कहा गया है कि छात्रों को सरकारी योजनाओं की तारीफ ही करनी है, लेकिन छात्रों को क्या लिखना है इस विषय में शायद ही किसी के मन में कोई संशय है.

बीजेपी के शासनकाल के दौरान हुए घोटालों और घपलों पर अनुसंधान किया जाए: कांग्रेस

जाहिर तौर पर गुजरात का समूचा शैक्षिक-बौद्धिक समुदाय पीएचडी जैसी महत्वपूर्ण शिक्षा के स्तर पर सरकार के हस्तक्षेप को लेकर काफी नाराज हैं.

2014 में गुजरात के विकास के दावों को लेकर एक अनुसंधानात्मक आलोचना लिखने वाले अर्थशास्त्री प्रोफेसर हेमंत शाह कहते हैं, 'इस प्रकार सरकार द्वारा विषयों की सूची तय करना विश्वविद्यालय प्रणाली की शैक्षणिक स्वायत्तता का स्पष्ट उल्लंघन है.'

पढ़ें: शिक्षा भगवाकरण के आठ नुस्खे

कैच से बातचीत में प्रो. शाह कहते हैं, ‘पीएचडी छात्रों के अनुसंधान के लिये विषयों को सुझाना सरकार का काम नहीं है.’ साथ ही वे राज्य के तमाम विश्वविद्यालयों को सरकार द्वारा दिये गए इस तुगलकी फरमान को न मानने का आह्वान भी करते हैं.

प्रो. शाह आगे बताते हैं कि विषयों की ये सूची अकादमिक स्वायत्तता और स्वतंत्रता का उल्लंघन है क्योंकि पीएचडी करने के लिये विषयों का चयन करना अनुसंधान करने वाले छात्र और उसके गाइड का विशेषाधिकार है.

बीजेपी सरकार का पक्ष लेने वाले शिक्षाविद अनुसंधान के लिये सरकार द्वारा 82 विषयों को सुझाने के फैसले का बचाव कर रहे हैं

गुजरात विश्वविद्यालय के सीनेट सदस्य और राज्य कांग्रेस के प्रवक्ता डा. मनीष दोशी कहते हैं कि इस प्रकार की सूची तय करना बीजेपी के शासनकाल में राज्य की शिक्षा व्यवस्था के पतन का साफ प्रतीक है.

डा. दोशी कहते हैं, ‘समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है कि गुजरात सरकार की योजनाओं का शोध करने के स्थान पर बीजेपी के शासनकाल के दौरान हुए घोटालों और घपलों पर अनुसंधान किया जाए.’

एक और शिक्षाविद नाम न छापने के अनुरोध पर कहते हैं कि 82 विषयों की यह सूची बकवास है. उनके मुताबिक सरकारी योजनाओं की सफलता पर कई शोध और अनुसंधान विभिन्न सरकारी पुस्तकालयों की शोभा पहले से ही बढ़ा रहे हैं.

पढ़ें: केजरीवाल की ऐतिहासिक शिक्षा नीति असल में ऐतिहासिक गलती है

लेकिन बीजेपी सरकार का पक्ष लेने वाले शिक्षाविद अनुसंधान के लिये सरकार द्वारा 82 विषयों को सुझाने के फैसले का बचाव कर रहे हैं. गुजरात विश्वविद्यालय के पूर्व उपकुलपति प्रो एयू पटेल का मानना है कि सरकारी योजनाओं के इस प्रकार से व्यवस्थित अध्ययन के जरिए हमें इन योजनाओ में मौजूद गड़बड़ियों और अच्छाइयों को जानने का मौका मिलता है.

वर्तमान कुलपति प्रो. एमएन पटेल छात्रों द्वारा अप्रासंगिक विषयों पर पीएचडी करने की प्रवृत्ति पर निराशा जताते हुए कहते हैं कि इस तरह से विषय तय करने से छात्रों को भविष्य में सिर्फ प्रसंगिक विषयों का चयन करने में काफी मदद मिलेगी.

First published: 28 April 2016, 14:24 IST
 
पिछली कहानी
अगली कहानी