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श्यामा प्रसाद मुखर्जी के बहाने नेहरू मेमोरियल से नेहरू पर निशाना

पाणिनि आनंद | Updated on: 10 February 2017, 1:48 IST
QUICK PILL
  • भारतीय जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी की स्मृति में एक विशेष प्रदर्शनी का आयोजन भाजपा के लिए जवाहरलाल नेहरू पर हमला करने का बहाना बन गया.
  • अमित शाह भाजपा अध्यक्ष के बजाय इतिहासविद की तरह बोलते नज़र आए. उन्होंने बताया कि कैसे नेहरू की नीतियों से खिन्न श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने एक झटके में कैबिनेट से इस्तीफा दिया और अपने प्राण देकर कश्मीर को भारत से अलग रखने वाले कानून को हटाने के लिए केंद्र की नेहरू सरकार को बाध्य किया.

भारतीय जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी की स्मृति में एक विशेष प्रदर्शनी का आयोजन भाजपा के लिए जवाहरलाल नेहरू पर हमला करने का बहाना बन गया. इस बहाने भाजपा ने एकबार फिर से निशाना साधा. वही नेहरू, जिसने कभी श्यामा प्रसाद मुखर्जी को अपनी पहले मंत्रिमंडल में शामिल किया.

इस हमले के लिए भाजपा ने जिस जगह को चुना, वो था दिल्ली स्थित नेहरू संग्रहालय. यहां श्यामा प्रसाद मुखर्जी रिसर्च फाउंडेशन की ओर से बुधवार को एक प्रदर्शनी का आयोजन किया गया और व्याख्यान का कार्यक्रम भी रखा गया. 

प्रदर्शनी का उद्धाटन किया भाजपा के अध्यक्ष अमित शाह ने और व्याख्यान दिया त्रिपुरा के गवर्नर तथागत रॉय ने. कार्यक्रम की अध्यक्षता नागरिक उड्डयन और संस्कृति मंत्रालय का स्वतंत्र प्रभार देख रहे केंद्रीय मंत्री महेश शर्मा ने.

भाजपा के लिए यह एक अद्भुत अवसर था. पार्टी के नेताओं से लेकर कार्यकर्ताओं के चेहरे पर नेहरू के घर में खड़े होकर नेहरू की आलोचना का मज़ा साफ दिखाई दे रहा था. 

अमित शाह जब संबोधन के लिए उठे तो उनका संबोधन एक हंसी और सुखानुभूति से शुरू हुआ. इसकी वजह भाषण में आगे स्पष्ट हो गई. उन्होंने बार-बार दोहराया कि मुखर्जी की मौत रहस्यमय परिस्थितियों में हुई. उन्होंने जून 1953 के घटनाक्रम को याद करते हुए कहा कि जानबूझकर मुखर्जी को कश्मीर में प्रवेश करने दिया गया और फिर उन्हें गिरफ्तार करके ऐसी स्थितियों में रखा गया, जहां उनका जीवन कठिन हो गया.

एंबुलेंस की जगह एक छोटी सी जीप में श्यामा प्रसाद मुखर्जी को अस्पताल ले जाना, वहां उन्हें गायनेकोलॉजी वार्ड में रखा जाना और सही इलाज न देना, ऐसे कई कारण हैं जो पुख्ता संदेह पैदा करते हैं. खुद न कहते हुए उन्होंने कहा कि कई लोग मानते हैं कि जिन परिस्थितियों में श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मौत हुई, वो मौत नहीं हत्या है.

अमित शाह भाजपा अध्यक्ष के बजाय इतिहासविद की तरह बोलते नज़र आए. उन्होंने बताया कि कैसे नेहरू की नीतियों से खिन्न श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने एक झटके में कैबिनेट से इस्तीफा दिया और अपने प्राण देकर कश्मीर को भारत से अलग रखने वाले कानून को हटाने के लिए केंद्र की नेहरू सरकार को बाध्य किया.

कार्यक्रम के मुख्य वक्ता तथागत रॉय थे. उन्होंने भी नेहरू के सिर मुखर्जी की मौत का ठीकरा फोड़ते हुए कहा कि सुचेता कृपलानी ने श्यामा प्रसाद से कहा था कि अगर वो कश्मीर गए तो नेहरू उन्हें वापस नहीं आने देंगे. तथागत श्यामा प्रसाद मुखर्जी की जीवनी के लेखक भी हैं.

हालांकि मुख्य वक्ता होते हुए भी तथागत 20 मिनट बोले और अमित शाह 30 मिनट. इन 30 मिनटों में श्यामा प्रसाद मुखर्जी को महानायक बनाया जाता रहा और नेहरू को खलनायक. 

अमित शाह ने कहा, “इस देश में पहले अंग्रेज़ों ने इतिहास को तोड़-मरोड़ कर पेश किया और फिर वामपंथियों ने. यह एक अक्षम्य अपराध है.”

उन्होंने आगे कहा, “आज अगर हिंदुओं के पास पश्चिम बंगाल है तो इसका श्रेय मुखर्जी को जाता है. आज अगर कश्मीर में प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति जैसे पद नहीं हैं, कोई भी भारतीय बिना सरकारी अनुमति लिए वहां जा सकता है तो इसका श्रेय मुखर्जी को जाता है. आज अगर 10 लोगों की पार्टी और वैकल्पिक राजनीति देश में खड़ी हो सकी है और 11 करोड़ सदस्यों के साथ दुनिया का सबसे बड़ा राजनीतिक दल बनकर उभरी है तो इसका श्रेय मुखर्जी को जाता है.”

नेहरू बनाम मुखर्जी

दरअसल, श्यामा प्रसाद मुखर्जी के बहाने नेहरू पर हमला करके भाजपा एक राजनीतिक और वैचारिक युद्ध जीतने की कोशिश कर रही है. इतिहास को अपनी सुविधा के हिसाब से सुना-सुनाया जा रहा है और राजनीतिक युद्ध सतत चलाया जा रहा है. भाजपा की भाषा इस कार्यक्रम के ज़रिए नेहरू को उनके घर में घेरने और बदला लेने वाली रही.

कार्यक्रम में भाजपा के करीब 10 मंत्री और सांसद मौजूद थे. कई विचारक और राजनीतिक कार्यकर्ता भी थे. पार्टी के अन्य पदाधिकारी थे. लेकिन बार-बार नेहरू पर हमला करते हुए भी किसी ने यह नहीं कहा कि श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मौत के कारणों की जांच की जानी चाहिए. यह प्रश्न जब मंच पर बैठे भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (आईसीसीआर) के अध्यक्ष प्रोफ़ेसर लोकेश चंद्र से किया गया तो उन्होंने कहा कि अब इसकी आवश्यकता नहीं है.

केंद्र में भाजपा की सरकार है, कश्मीर में भाजपा समर्थित सरकार है बावजूद इसके कार्यक्रम में मौजूद एक भी वक्ता ने मुखर्जी की मौत के कारणों की जांच की मांग नहीं की. 

यह बताता है कि नेहरू के बरक्श मुखर्जी को रखकर भाजपा राजनीति करना चाहती है दो बड़े नेताओं के बीच द्वंद्व खड़ा कर ओछी राजनीति की मंसा रखती है. वरना यही वो सरकार जो सुभाषचंद्र बोस से संबंधित तमाम दस्तावेजों का खुलासा करने में अतिरिक्त दिलचस्पी ले रही है.

लोकेश चंद्र ने कैच को बताया, “इतिहास केवल बीता हुआ कल नहीं है, आने वाला कल भी है. भविष्य पुराण भी है. हमें शांति चाहिए. इस तरह की जांच से कितना विवाद उठ खड़ा होगा. मुख्य बात शांति बनाए रखना है.” लोकेश चंद्र खुद नेहरूवादी इतिहासकार रहे हैं और अब भाजपा की पसंद बनकर परिषद के अध्यक्ष बन चुके हैं. वो नेहरू के राष्ट्रबोध से बाहर निकलने की सलाह तक दे डालते हैं. उन्होंने कहा, “इंडिया हैज़ टू चेंज. इट इज़ नो लॉन्गर द वर्ल्ड ऑफ नेहरू.” यानी भारत को बदलना होगा. यह नेहरू का दौर नहीं है.

तो क्या मुखर्जी से नेहरू की कोई व्यक्तिगत रार थी. क्या नेहरू वाकई श्यामा प्रसाद मुखर्जी का इतना बुरा चाहते थे. कम से कम भाजपा ने जो वक्तव्य दिए उससे तो यही धारणा पुष्ट होती है. 

लेकिन इतिहासकार दिलीप सेमियन कहते हैं, “नेहरू ने मुखर्जी को अपने कैबिनेट में स्थान दिया. वो किसी पार्टी की सरकार नहीं बना रहे थे. वो एक राष्ट्रीय सरकार बनाना चाहते थे. इसीलिए उनके या कांग्रेस के विरोधियों को भी उन्होंने बराबर स्थान दिया. अंबेडकर नेहरू के धुर विरोधियों में सबसे अग्रणी थे. पटेल के साथ उनकी गहरी असहमतियां थीं. लेकिन अंबेडकर संविधान सभा के प्रमुख बने. कानूनमंत्री बने.”

कुछ अन्य इतिहासकार इस ओर भी इशारा करते हैं कि उसी नेहरू संग्रहालय में पटेल के संकलित पत्रों का भाग-6 पटेल और मुखर्जी के बीच पत्राचार का ब्यौरा है. यह ब्यौरा बताता है कि कैसे पटेल, गांधी की हत्या से नाराज़ थे और किस प्रकार मुखर्जी हिंदू महासभा का पक्ष ले रहे थे.

इतिहासबोध और इतिहास का सच साक्ष्यों पर आधारित होता है. विचारधारा अपनी सुविधा के हिसाब से तथ्यों को सामने रखती हैं और उनसे खेलती हैं. इतिहासबोध इससे परे है. 

श्यामा प्रसाद मुखर्जी के बहाने भाजपा अपनी वैचारिक सुविधा के इतिहास का बखान कर रही है और इसी में उसकी राजनीतिक और वैचारिक जीत निहित है. अभी नेहरू कई बार और खलनायक बनाए जाएंगे क्योंकि नेहरू इतिहास से ज़्यादा एक राजनीतिक पहचान हैं और पहचान पर हमले की राजनीति ऐसा करती रहेगी.

First published: 30 June 2016, 7:52 IST
 
पाणिनि आनंद @paninianand

सीनियर असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़. बीबीसी हिन्दी, आउटलुक, राज्य सभा टीवी, सहारा समय इत्यादि संस्थानों में एक दशक से अधिक समय तक काम कर चुके हैं.

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