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दलितों पर राजनाथ सिंह का बयान दरअसल समस्या की अनदेखी और संकट को आमंत्रण है

पाणिनि आनंद | Updated on: 7 February 2017, 8:23 IST

केंद्र सरकार के गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने संसद में दलित उत्पीड़न के मुद्दे पर बोलते हुए कहा कि विपक्ष इस बात का प्रमाण दे कि दलित उत्पीड़न के मामले बढ़े हैं. राजनाथ सिंह ने कहा कि दलितों के साथ अत्याचार के मामलों में बढ़ोत्तरी हुई है, ऐसी बातें निराधार हैं. राजनाथ सिंह भले ही गृहमंत्री की हैसियत से ऐसा कह रहे हों, लेकिन राजनीतिक रूप से ये बयान उनकी पार्टी के लिए उल्टा पड़ा है.

खासकर ऐसे समय में जबकि प्रधानमंत्री मोदी को खुद दलित उत्पीड़न के मामले में यह बयान देना पड़ा कि किसी दलित भाई को मारने के बजाय उन्हें गोली मार दें. प्रधानमंत्री का बयान भले ही गौरक्षकों के खिलाफ किसी सख्त कदम की बात नहीं करता और न ही उन्हें चेतावनी देता है, लेकिन ऐसा बयान यह ज़रूर स्थापित करता है कि प्रधानमंत्री तक को दलितों के खिलाफ हो रहे अत्याचार के प्रति बयान देने के लिए विवश होना पड़ा है.

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राजनाथ सिंह दरअसल ऐसा कहकर अपने अगड़ों के वोटबैंक को संभाले रखना चाहते हैं. वो इस मसले पर झुकने को तैयार नहीं है और न ही खुद अपने मंत्रालय के स्तर पर किसी कमी या अक्षमता को स्वीकार करना चाहते हैं. संघ और विश्व हिंदू परिषद के कुछ वरिष्ठों ने जिस तरह गौरक्षकों के मसले पर मोदी को नसीहत तक दे डाली थी, राजनाथ उसी भाषा में सदन को संबोधित करते दिखाई दिए.

राजनाथ सिंह इस तरह अगड़ों के बीच कमज़ोर पड़ने से बच रहे हैं. यह एक स्तर पर उनकी पार्टी और विचारधारा की समर्थक अगड़ी जातियों के लिए सही बैठने वाला पैतरा भी है. लेकिन यह सत्ता के अंदरूनी भ्रम और अस्पष्टता को भी दर्शाता है. राजनाथ सिंह के बयान से साफ हो गया कि दलित उत्पीड़न के मामलों पर प्रधानमंत्री का सुर अलग है और गृहमंत्री का अलग. दोनों के बीच किसी तरह का सामन्जस्य नज़र नहीं आता.

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तो क्या यह सरकार खुद ही भ्रम की स्थिति में है या फिर मोदी के बयान के बाद अगड़ों के बीच और हिंदुत्ववादियों के बीच शुरू हुई आलोचना का जवाब तलाशा जा रहा है. इस भ्रम में सरकार की और किरकिरी हो रही है.

दूसरी बात यह है कि मोदी जिस दलित समर्थन का माहौल पिछले ढाई साल से बनाने के लिए दिन रात लगे हैं और अंबेडकर को साधने का जो एजेंडा संघ और मोदी दोनों की सूची में सबसे बड़ी प्राथमिकताओं के रूप में शामिल है, राजनाथ सिंह का बयान उसे चोट पहुंचा रहा है. दलित पहले ही केंद्र सरकार और भाजपा से खासा नाराज़ है और इस तरह की बेरुखी और दलित उत्पीड़न की घटनाओं की अनदेखी उनके घावों को और कुरेदने का काम कर रही है.

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दरअसल भाजपा के साथ यही धर्मसंकट है कि एक साधने के क्रम में दूसरे नाराज़ होने लगता है. वो दयाशंकर सिंह को निकालते हैं कि दलितों को जो ठेस पहुंची है उसकी भरपाई हो, तो अगड़ों में रोष भर जाता है. वो अगड़ों के लिए फिर से अपनी पुरानी भाषा बोलना शुरू करते हैं तो सारा सोशल इंजीनियरिंग धरा रह जाता है. जातियों के बीच झूलने का यह क्रम तबतक खत्म नहीं हो सकता जबतक कि जातियों के बीच जारी संघर्ष खत्म नहीं होते.

राजनाथ सिंह ऐसे समय में शुतुरमुर्ग की तरह आंख मूंदकर संसद में बयान दे रहे हैं जब महाराष्ट्र, गुजरात, उत्तर प्रदेश और पंजाब में उनकी अपनी पार्टी दलितों के कोप का केंद्र बनती जा रही है. यहां की ज़मीन में भाजपा का पांव टिकाने के लिए दलितों के वोट की खासी ज़रूरत है और इसीलिए मोदी सावरकर से ज़्यादा अंबेडकर की बात पिछले दो साल से करते आ रहे हैं. लेकिन राजनाथ सिंह जो बोल रहे हैं, उससे मोदी के घड़ियाली आंसुओं का सच भी खुलकर सामने आ रहा है और भाजपा का जातीय चरित्र भी.

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हालांकि भाजपा के पास राष्ट्रवाद, हिंदुत्व और मुस्लिम बनाम दलित जैसे और भी पैतरे हैं जिनका वो समय समय पर इस्तेमाल करके दलितों को अपनी ओर लुभाने का प्रयास करती है, लेकिन दलितों को जो चोट गौरक्षकों के उन्माद से पहुंच रही है, उसके घाव ऐसे भाषणों से भरने वाले नहीं हैं और इसे जल्दी भुलाया नहीं जा सकेगा.

राजनाथ सिंह जिस समय संसद में अपना वक्तव्य दे रहे थे, दलितों का मार्च गुजरात का आसमान ताने हुए आगे बढ़ रहा था. अभी राजनाथ सिंह ने अपने बयान से दलितों को ठेंगा दिखाया है. लेकिन यही अगर आगामी चुनावों में उल्टा हो गया, तो भाजपा को दलितों का ठेंगा काफी भारी पड़ेगा.

First published: 13 August 2016, 12:34 IST
 
पाणिनि आनंद @paninianand

सीनियर असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़. बीबीसी हिन्दी, आउटलुक, राज्य सभा टीवी, सहारा समय इत्यादि संस्थानों में एक दशक से अधिक समय तक काम कर चुके हैं.

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