Home » इंडिया » BJP is acting like a Parivar. It'll have a chilling effect on campuses: Mukul Kesavan
 

भाजपा का रवैया युनिवर्सिटी कैंपसों के लिए खतरनाक संकेत है: मुकुल केशवन

श्रिया मोहन | Updated on: 10 February 2017, 1:52 IST
QUICK PILL
जेएनयू छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार की गिरफ्तारी के एक दिन बाद कैच \r\nन्यूज ने इतिहासकार मुकुल केशवन से बातचीत कर इसके सामाजिक और \r\nसांस्कृतिक पहलू को समझने का प्रयास किया. क्या यह कैंपस राजनीति का नया \r\nरुप है?केशवन का तर्क यह है कि छात्र राजनीति पर नियंत्रण कोई नई \r\nबात नहीं है. बीजेपी एक परिवार की तरह काम कर रही है और पार्टी अपनी \r\nराजनीतिक शक्ति को मजबूत करना चाहती है, इसका कैंपसों पर बुरा \r\nप्रभाव पड़ेगा.

क्या राष्ट्रदोह के खिलाफ कोई कानून होना चाहिए? क्या कन्हैया पर यह लगाया जाना उचित है?

हाल में ही मैंने राष्ट्रद्रोह पर लारेंस लियेंग का एक आलेख पढ़ा है. इस लेख को पढ़ने के बाद मुझे लगा कि जो जेएनयू में हुआ वह राष्ट्रद्रोह नहीं है. छात्र अध्यक्ष के खिलाफ कोई भी साक्ष्य नहीं है जो इन आरोपों को सही ठहराता हो.

मुझे नहीं लगता है कि हमें धारा 124 ए की जरूरत है. अगर इस तरीके से लोगों को पकड़ने का अधिकार राज्य के पास है तो यह बेतुका कानून है. अधिकतर देशों में राष्ट्रद्रोह की जगह पर राजद्रोह का कानून है.

क्या यह सरकार विश्वविद्यालयों के प्रति संकीर्ण दृष्टिकोण अपना रही है? क्या विश्वविद्यालय सिर्फ नंबर और सिलेबस के लिए बने हैं या ये राजनीतिक और बौद्धिक स्तर के विकास के लिए बने हैं?

हाल ही के दो घटनाओं को देखें. दो महत्वपूर्ण केंद्रीय विश्वविद्यालयों में जो राजनीतिक हस्तक्षेप हुआ वह कैंपस की राजनीतिक का नतीजा है.

मैं यह नहीं कह सकता हूं कि बोलने की आजादी के स्तर को विश्वविद्यालयों में उठाया गया है.

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रामानुजम के निबंध के चलते कांग्रेस के राज्य में एबीवीपी के गुंडों ने दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग में हमला किया. उस समय केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी. पूर्व वीसी दिनेश सिंह ने रामायण से जुड़े निबंध को हटाने में मदद की.

हमेशा से केंद्र सरकार एक प्रकार या दूसरे प्रकार के गुंडों के सामने झुकती आ रही है. हालांकि, हाल में ही एबीवीपी, बीजेपी, मंत्री और एनडीए सरकार के बीच जो समन्वय है वो नया है. महानगरीय विश्वविद्यालयों में इस तरह के राजनीतिक संबंध को उजागर करना और उन लोगों को निशाना पर लेना जो उनके राजनीतिक प्रतिद्वंदी हैं यह अपने आप में नया है.

आखिर क्यों कैंपस की राजनीति केंद्र के लिए खतरा बन गई है?

ऐसा प्रतीत होता है कि हैदराबाद और जेएनयू में बीजेपी एक परिवार की तरह व्यवहार कर रही है जिसमें परिवार का एक सदस्य दूसरे को मदद कर रहा है.

मुझे लगता है कि वे अपने आप को केंद्र की राजनीति से जोड़ कर देखते हैं. संघ परिवार के सभी संगठन एक साथ मिलकर काम कर रहे हैं.

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जब हम यह सवाल करते हैं कि क्या असहिष्णुता बढ़ रही है? तो हम इस सवाल के महत्व को कम कर देते हैं. विरोधियों के आवाज को दबाने की बहस में हमलोग तमिलनाडु में जो जयललिता के द्वारा हुआ, जो यूपी में समाजवादी पार्टी के द्वारा हुआ और पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के द्वारा हुआ, शामिल कर लेते हैं. आप बहुत सारे विश्वविद्यालय में झूठे हस्तक्षेप देखेंगे.

मैं कलकत्ता विश्वविद्यालय गया हुआ था जहां कि एक मात्र राजनीतिक पोस्टर एसएफआई का लगा हुआ था. यहां सिर्फ एसएफआई की ही राजनीति चलती है. इसीलिए विश्वविद्यालय की राजनीति को नियंत्रित करने का प्रयास नई बात नहीं है.

देखने का नजरिया नया है. वे लोग असामान्य तरीके से अपने निशाने को चुन रहे हैं. बीजेपी वेमुला और कन्हैया जैसे लोगों का पीछा कर रही है. जिन्हें गरीब कहा जा सकता है और वे गरीबों के प्रतीक हैं, जो बीजेपी के लिए चालाकी वाला कदम नहीं है. क्योंकि यह महत्वपूर्ण वे कौन हैं. मैं यह देखकर आश्चर्यचकित हूं कि बीजेपी लापरवाहीपूर्वक काम कर रही है.

आप इस मुद्दे में क्या गंभीरता देखते हैं?

मैं यह सोचता हूं कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि जनता यह सोच रही है कि युनिवर्सिटी कैंपस में क्या कहना चाहिए और क्या नहीं कहना चाहिए. इसका 'डरावना प्रभाव' होगा.

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जो लोग विश्वविद्यालय में हैं उन्हें बिना किसी राजनीति के अभिव्यक्ति के स्वतंत्रता को बचाने का प्रयास करना चाहिए. मुझे बहुत आश्चचर्य हुआ कि बीजेपी ने कैंपस के अंदर पुलिस को भेजकर वाइंस चांसलर को धमकाया. जो फायदा उन्हें छोटे समय में मिल रहा है, आगे चलकर उन्हें घाटा होगा. लोग नहीं चाहते हैं कि विश्वविद्यालक की जगह को इस तरीके से फेंका जाए.

First published: 15 February 2016, 12:28 IST
 
श्रिया मोहन @shriyamohan

एडिटर, डेवलपमेंटल स्टोरी, कैच न्यूज़

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