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गोवा की बाज़ी हारती बीजेपी

समीर चौगांवकर | Updated on: 14 November 2016, 3:43 IST
QUICK PILL
  • कुछ महीने पहले तक दोबारा सत्ता वापसी को लेकर चैन की बांसुरी बजा रही भाजपा अब बेचैन है. वजह गोवा में आम आदमी पार्टी के बढ़ते कदम और संघचालक रहे सुभाष वेलिगंकर की बगावत है. 

मनोहर पर्रीकर के रक्षा मंत्री बनकर दिल्ली शिफ्ट होने और पारसेकर के सत्ता संभालने के बाद गोवा में भाजपा की ज़मीन कमज़ोर हुई है. भाजपा के लिए दूसरी मुसीबत आम आदमी पार्टी का बढ़ता जन समर्थन और वेलिंगकर की बगावत है. 

इसके अलावा गोवा सरकार को समाज के कई तबकों से नाराजगी का सामना करना पड रहा है. संघ गोवा सरकार की वादाखिलाफी से परेशान है. बीजेपी के नए समर्थक इसलिए परेशान हैं क्योंकि वह गांवों की क्षेत्रीय विकास योजना पर उनके साथ सलाह-मशविरा करने के वादे से मुकर गई है. 

मध्यम वर्ग की नाराज़गी की वजह यह है कि सरकार मंडोवी नदी पर तैरते चार कैसिनों को किसी दूसरी जगह ले जाने के इरादे से पलट गई है. वहीं आम जनता गोवा सरकार से इसलिए दुखी है क्योंकि सरकार ने 16,000 करोड़ रु के खनन घोटाले के मुजरिमों को पकडऩे की बात तो दूर सरकार ने उलटे मार्च 2015 में खदानें खोदने पर लगी पाबंदी भी उठा दी. 

टैक्सी ड्राइवर डिजिटल मीटर और रेंट-अ-कार सेवाओं से मिल रही प्रतिस्पर्धा के बाद सरकार के उनके प्रति उदासीन रूख से गुस्से में हैं. मछुआरे इसलिए भड़के हैं कि सरकार ने तब उनकी मदद नहीं कि जब वे व्यावसायिक मछुआरों के हाथों इस्तेमाल की जा रही एलईडी लाइटों और बुल ट्रॉलिंग के खिलाफ आंदोलन कर रहे थे.

2012 के चुनाव में भ्रष्टाचार के मुद्दे पर कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर चुकी भाजपा ने तब चुनाव महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी (एमजीपी) के साथ मिलकर लड़ा था और गोवा विधानसभा की 40 में से 24 सीटें जीती थीं. लेकिन इस बार महाराष्ट्र गोमांतक पार्टी का भाजपा से गठबंधंन अंतिम समय में टूट सकता है और एमजीपी ऐन वक्त पर वेलिंगकर के भारतीय भाषा सुरक्षा संघ के साथ चुनाव लड सकती है. हालांकि केन्द्रीय मंत्री और गोवा विधानसभा चुनाव के चुनाव प्रभारी नीतिन गडकरी का कहना है कि एमजीपी भाजपा के साथ ही लड़ेगी.

क्यों किया वेलिंगकर ने विद्रोह

गोवा में सरकार और संघ के बीच विवाद की जड़ 1990 के एक फैसले में निहित है जब महाराष्ट्र गोमांतक पार्टी सत्ता में थी. तब कोंकणी और मराठी माध्यम के स्कूलों को विशेष मदद देने का फैसला किया गया था जिसके बाद रातों-रात 126 अंग्रेजी माध्यम स्कूल, जिनमें ज्यादातर ईसाई संस्थान थे, कोंकणी माध्यम में बदल गए. यह नीति 2011 तक चलती रही. 

उस वक्त एक कथित सौदेबाजी के चलते दिगंबर कामत की कांग्रेस सरकार ने मदद की. इस नीति में अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों को भी शामिल कर लिया. इसका नतीजा यह हुआ कि तत्काल वे 126 स्कूल फिर से अंग्रेजी माध्यम में बदल गए.

मगर इसके खिलाफ भाजपा और संघ ने आंदोलन छेड दिया. वेलिंगकर इसके नेतृत्वकर्ता थे और पर्रिकर उनके मुख्य सहयोगी. वेलिंगकर ने इस उद्देश से भारतीय भाषा सुरक्षा मंच का भी गठन कर दिया. उनकी मांग थी कि कोंकणी और मराठी माध्यम में शिक्षा को बढावा देने के लिए उन स्कूलों से मदद वापस ले ली जाए जिन्होंने खुद को फिर से अग्रेजी माध्यम में बदल लिया था. 

फिर 2012 के विधानसभा चुनाव में यह भाजपा का प्रमुख मुद्दा बन गया. चुनावों में पर्रिकर की सियासी होशियारी और सुशासन के उनके अभियान के चलते भाजपा को ईसाईयों का भी खासा समर्थन हासिल हुआ. 

सत्ता में आते ही पर्रिकर अंग्रेजी माध्यम स्कूलों से सब्सिडी वापस लेने के फैसले पर टालमटोल करने लगे. जल्द ही यह वेलिंगकर से उनके टकराव का मुद्दा बन गया. पर्रिकर के दिल्ली जाने के बाद भी वेलिंगकर ने मुख्यमंत्री लक्ष्मीकांत पारसेकर के सामने मुद्दा उठाया लेकिन परसेकर ने पर्रिकर के रजामंदी के बगैर निर्णय करने में अपनी असमर्थता जता दी जिससे नाराज होकर संघ के संघचालक ने विद्रोह कर गोवा चुनाव में भाग लेने और भाजपा को सबक सिखाने की ठानी.

जानकारों का मानना है कि उत्तर गोवा में भाजपा वेलिंगकर के कारण मौजूदा 21 में से सात-आठ सीटें गंवा सकती है. शिवसेना ने वेलिंगकर के भारतीय भाषा सुरक्षा मंच के साथ चुनाव लडने की घोषणा की है.

खनन घोटाले ने डूबाई थी कांग्रेस की नैया

2012 के विधानसभा चुनाव में गोवा के ईसाई समुदाय ने भाजपा के पक्ष में मतदान किया था. इसके पहले ईसाई भाजपा से नाराज थे क्योंकि मुख्यमंत्री रहते मनोहर पर्रिकर ने 2002 में गुड फ्राइडे को सरकारी छुट्टियों की सूची से बाहर करने का प्रस्ताव किया था. हालांकि ऐसा हुआ नहीं लेकिन कैथोलिक समुदाय इससे नाराज हुआ था. लेकिन कांग्रेस सरकार के दौरान हुए खनन घोटालों ने गोवा की जनता को बेहद नाराज कर दिया था. 

कांग्रेस एनसीपी गठबंधन ने 2012 के चुनाव के दौरान टिकटों का बडा हिस्सा उन्हीं लोगों में बांट दिया जो लोग खनन भ्रष्टाचार में शामिल थे. कांग्रेस के 40 फीसदी टिकट अलेमाओं, राणे, मडकाइकर, नायक और मोसेरात परिवार जो घोटाले में शामिल थे, में ही बंट गए तो गोवा की जनता का धैर्य जवाब दे गया और कांग्रेस को हार का सामना करना पडा. भाजपा के टिकट पर भी पांच कैथोलिक उम्मीदवार पार्टी के टिकट पर चुनकर आए थे.

आप है मजबूत विकल्प

कांग्रेस से नाराज कैथोलिक समुदाय इस चुनाव में आम आदमी पार्टी को वोट दे सकता है. सूत्र बताते हैं कि आम आदमी पार्टी ने भी कैथोलिक समुदाय को अपने पाले में लाने की तैयारी शुरू कर दी है. बीते दिनों मदर टेरेसा को संत की उपाधि के कार्यक्रम में भाग लेने वेटिकन गए केजरीवाल ने गोवा के कथौलिक के प्रमुख के साथ कुछ समय एकांत में बिताया था. तभी से इस बात के कयास लगाए जा रहे हैं कि इस बार गोवा विधानसभा चुनाव में कैथोलिक समुदाय कांग्रेस और भाजपा का साथ छोड़कर आम आदमी पार्टी के साथ जा सकता है. जनगणना के 2011 के अनुसार गोवा की 25 प्रतिशत आबादी ईसाई है और यह आप का मजबूत वोट बैक बन सकता है.

First published: 14 November 2016, 3:43 IST
 
समीर चौगांवकर @catchhindi

विशेष संवाददाता, राजस्थान पत्रिका

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