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भाजपा राष्ट्रीय कार्यकारिणी: क्या नोटबंदी ने डिगा दिया है मोदी-शाह का आत्मविश्वास?

(पीटीआई)

अगर कोझिकोड में हुई भाजपा की राष्ट्रीय बैठक उरी में हुए आतंकी हमले से पैदा हुए माहौल के साये में हुई तो शनिवार को दिल्ली में ख़त्म हुई कार्यकारिणी बैठक पर नोटबंदी की सफलता को लेकर संदेह की छाया मंडराती रही.

दो दिनों तक चली बैठक में पारित हुए दो प्रस्तावों और तीन प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद जो बात सबसे मुखर होकर उभरी, वह यह कि पार्टी के अंदर ही नोट बैन और उसके चलते आगामी पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव पर पड़ने वाले संभावित नतीजों को लेकर गहरा संदेह बना हुआ है.

प्रधानमंत्री समेत जितने भी भाजपा के वरिष्ठ नेताओं ने दिल्ली में हुई राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक को संबोधित किया जिसमें भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह, वित्त मंत्री अरुण जेटली, मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर और अन्य शामिल हैं. हालांकि ऊपरी तौर पर सभी नेताओं ने नोटबंदी की तरफदारी और प्रशंसा की.

इस बात को समझना जरूरी है कि 60 दिन बाद भी पार्टी अपने कैडर को 500 और 1000 रुपए के नोटों को बंद किए जाने से हुए फायदों को गिनाने की जरूरत महसूस कर रही है. इसकी एक वजह शायद यह है कि पार्टी का आम कैडर भी नोटबंदी के नतीजों को लेकर बहुत निश्चिंत नहीं है.

नोटबंदी से घबराए?

भाजपा के किसी नेता ने यह स्वीकार नहीं किया कि पांच राज्यों में होने वाले चुनाव नोटबंदी पर जनमत संग्रह की तरह होंगे. अगर डिमोनेटाइजेशन की नीति इतनी सफल थी तब तो पार्टी इसको किसी तरह से चुनावी मुद्दा बनाने से पीछे नहीं रहती, जैसा कि उसने सर्जिकल स्ट्राइक के तुरंत बाद किया था. लेकिन पार्टी के नेता सिर्फ तरक्की और विकास को ही चुनावी मुद्दा बनाने की बात करते रहे. 

सच तो यह है कि उत्तर प्रदेश समेत दक्षिण के जिन राज्यों में चुनाव होने वाले हैं, वहां के कार्यकर्ताओं ने राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के साथ अपनी बैठकों में नोट बैन को लेकर अपनी चिंताएं बताई हैं. इसी तरह की ताजा बैठक दिसंबर में हुई थी.

नोटबंदी के कारण पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजों पर संभावित असर को लेकर शाह-मोदी असहज दिखे

भाजपा के एक वरिष्ठ राष्ट्रीय पदाधिकारी ने बातचीत में कैच को बताया, 'पहली बार ऐसा लगा की पार्टी और सरकार को चला रहे दोनों शीर्ष नेताओं - नरेंद्र मोदी और अमित शाह - का आत्मविश्वास डिगा हुआ है. नोटबंदी और इसके चलते आगामी पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजों पर इसके संभावित असर को लेकर दोनों नेता असहज दिखे. हालांकि उनके भाषणों में इस तरह की बातें नहीं थी लेकिन शारीरिक भाषा से इसका साफ संकेत मिल रहा था.'

इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह रही कि अमित शाह जिनकी छवि एक कठोर नेता की है, और जो संवेदनशीलता के लिए नहीं जाने जाते, उन्होंने पहली बार बेहद भावुक होकर भाषण दिया. उन्होंने कार्यकारिणी में मौजूद सभी सदस्यों से नोटबंदी का समर्थन करने, सरकार और पार्टी को मजबूत करने की अपील की. जबकि उन्हें एक आदेश देने वाले नेता के रूप में जाना जाता है.

एक और मुद्दा जिस पर कार्यकारिणी में साफ चिंता देखी गई वह यह थी कि सरकार का कार्यकाल लगभग तीन साल बीत चुका है, लेकिन अभी भी उसके पास नीतियों के स्तर पर कुछ ठोस हासिल नहीं हुआ है. भाजपा नेता के शब्दों में, 'सबकी चिंता यही थी कि सिर्फ दो साल बचे हैं. अगर इसमें कुछ दिखाने लायक नहीं कर पाए तो 2019 का चुनाव बहुत मुश्किल हो सकता है.'

ग़रीबी प्राथमिकता

नोटबंदी के बाद पार्टी की दो दिवसीय बैठक में सबसे अधिक बार जिस शब्द को दोहराया गया, वह है गरीबी. भाजपा के सभी वरिष्ठ नेता इन दो दिनों की प्रेस कान्फ्रेंस और भाषणों में यही दोहराते नजर आए कि गरीब और गरीबी ही भाजपा सरकार के केंद्र में हैं.

वरिष्ठ भाजपा नेता और कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के अपने भाषण में मोदी की इस बात को दोहराते देखे गए कि 'हमारी प्राथमिकता गरीब लोग हैं. मैं गरीबी में जन्मा हूं और मैंने गरीबी देखी है. भाजपा नेता इसकी ही बात करते रहे कि किस तरह से नोटबंदी से गरीबों को फायदा होने वाला है और कैसे अब वे इस साल को गरीब कल्याण दिवस के रूप में मना रहे हैं'.

मोदी की बात को नेता दोहराते रहे कि 'हमारी प्राथमिकता गरीब लोग हैं. मैं गरीबी में जन्मा हूं और गरीबी देखी है'

भाजपा की दिल्ली इकाई के अध्यक्ष मनोज तिवारी ने तो यहां तक दावा किया कि नोटबंदी को झुग्गी बस्तियों में भी भारी समर्थन मिला है. प्रेस कान्फ्रेंस में भी भाजपा नेता यह दावा करते नजर आए कि गरीबों के समर्थन के बूते ही पार्टी आने वाले पांच राज्यों के चुनाव में जीत दर्ज करेगी. लेकिन पार्टी ने अब तक एक भी दलील इस बारे में नहीं दी है कि कैसे नोट बैन से गरीबों को फायदा होगा. 

शनिवार की प्रेस कॉन्फ्रेंस में निर्मला सीतारमण भी वित्त मंत्री अरुण जेटली के हवाले से यह कहती नजर आईं कि इससे किसानों को बेहद फायदा हुआ है. लेकिन सीतारमण ने यह नहीं बताया कि कैसे किसानों को इससे फायदा हुआ, क्योंकि मीडिया में जो खबरें आई हैं उनमें तो यही बताया गया है कि कैसे नोट बैन के कारण पैदा हुई नकदी की किल्ल्त से किसानों को भारी नुकसान हुआ है.

सीतारमण ने वित्त मंत्री के हवाले से यह भी कहा कि कैसे नोटबंदी के कारण फिजूल खर्ची काफी हद तक कम हो गई. लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि कैसे जमीनी स्तर पर कार्यकर्ता इस तर्क के सहारे, जो कि काफी कुछ विपक्षी खेमे की तरफ से आए व्यंग्य की तरह लगता है, सरकार का संदेश किसानों तक ले जाएंगे!

राजस्व घटा

जो साफ़ है वह यह कि नोटबंदी के बाद कुछ राज्यों के राजस्व में गिरावट आई है. लेकिन सीतारमण फिर से जेटली के हवाले से यह कहते हुए सुनी गईं कि बड़े राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र में नोटबंदी से राजस्व में कोई गिरावट नहीं आई. लेकिन सीतारमण ने वित्त मंत्री के हवाले से यह जरूर बताया कि नोट बैन से पश्चिम बंगाल का राजस्व प्रभावित हुआ है. लेकिन दोबारा सीतारमण ने यह नहीं बताया कि छोटे राज्य जैसे केरल पर इसका क्या असर हुआ, जहां के वित्त मंत्री ने दावा किया है कि उनके राज्य का राजस्व डिमोनेटाइजेशन के कारण 30 प्रतिशत तक गिरा है.

अब कॉमेटी बनेगी

मोदी ने राष्ट्रीय कार्यकारिणी के मंच का इस्तेमाल विधानसभा और लोकसभा में साथ—साथ चुनाव के मुद्दे को उठाने में भी किया. जावडेकर ने बताया कि इस दिशा में आगे बढ़ने में जो बाधाएं आएंगी उनको दूर करने के लिए कौन से कदम उठाए जाएं इसका अध्ययन करने के लिए एक कमेटी का गठन किया जाएगा. साथ ही कमेटी यह भी बताएगी कि इस मुद्दे पर कैसे राष्ट्रीय सहमति कायम की जाए. उम्मीद की जानी चाहिए इस मुद्दे पर आने वाले दिनों में अभी और कदम उठाए जाएंगे.

इस दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यकारिणी बैठक से यह तो साफ़ हो गया कि कैसे पार्टी और मोदी खुद डिमोनेटाइजेशन पर हुई सरकार की भारी आलोचना से प्रभावित हैं. साल के अंत के अपने संबोधन में मोदी ने खुद भी यह स्वीकार कर लिया कि जनता ने तो बड़े पैमाने पर नोटबंदी का स्वागत किया है, लेकिन बुद्धिजीवियों ने नहीं. जानकारी के मुताबिक, मोदी ने राष्ट्रीय कार्यकारिणी की अपनी बैठक में भी यही कहा है कि आलोचना से मत घबराओ और अच्छे काम करते रहो.

First published: 8 January 2017, 8:04 IST
 
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