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असम भाजपा का चुनावी पैंतरा: हिंदू विस्थापित बनाम मुस्लिम विस्थापित

कैच ब्यूरो | Updated on: 28 February 2016, 22:17 IST
QUICK PILL
  • बोडो समूहों में इस बात का भय है कि लंबी अवधि के बाद यहां रहने वाले बाहरी लोग नागरिकता की मांग करने लगेंगे. यहां पर बंगाली भाषा बोलने वाले हिंदुओं की भी एक बड़ी आबादी है जो बांग्लादेश में हो रहे उत्पीड़न के चलते यहां आकर बस गई हैं.
  • वहीं बीजेपी भी लगातार अवैध अप्रवासी कहकर बांग्लाभाषी मुसलमानों की मौजूदगी का \r\nविरोध करती आई है. आदिवासी और अन्य स्थानीय लोगों के कई समूह लगातार इस बात\r\n को उठाते आए हैं कि राज्य में बाहरी लोगों के लिये कोई ‘स्थान’ नहीं है

देश में इस वर्ष जिन पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं उनमें सिर्फ असम ही ऐसा राज्य लग रहा है जहां पर एक पार्टी के रूप में बीजेपी अपनी उपस्थिति दर्ज करवाती दिख रही है. साथ ही पूर्वोत्तर भारत का प्रवेशद्वार माना जाने वाला यह राज्य संघ परिवार के लिये रणनीतिक रूप से भी बेहद महत्वपूर्ण है.

79 वर्षीय तरुण गोगोई के नेतृत्व में राज्य में सत्ता का सुख भोग रही कांग्रेस पार्टी पिछले 15 वर्षों से सत्ता में रहने के चलते सत्ता विरोधी लहर का भी सामना कर रही है. हालांकि बीजेपी के स्थानीय नेताओं के बीच इस बात की आशंका जताई जा रही है कि केंद्र सरकार के कुछ कदम असम में उनके नए समर्थकों को विमुख भी कर सकती हैं.

बीजेपी के स्थानीय नेताओं के बीच इस बात की आशंका जताई जा रही है कि केंद्र सरकार के कुछ कदम असम में उनके नए समर्थकों को विमुख भी कर सकती हैं

राज्य में बीजेपी के कुछ सहयोगी दल इस बात की ओर भी इशारा कर रहे हैं कि पार्टी वर्ष 2014 के लोकसभा चुनावों में अपने चुनावी घोषणापत्र में किये गए वायदों पर खरा उतरने में नाकामयाब रही है.

बोडो का प्रतिरोध

बेहद प्रभावशाली बोडो संगठन, ऑल बोडो स्टूडेंट्स यूनियन के युवा अध्यक्ष प्रमोद बोडो कहते हैं, ‘‘हमनें 2014 के चुनावों में बीजेपी का समर्थन किया था और इसी के बूते वे सात सीट जीतने में कामयाब भी रहे. लेकिन इसके बावजूद उन्होंने हमारे लिये कुछ नहीं किया.’’

छात्र नेता समझाते हैं कि किस तरह बोडो समूहों ने राज्य में चल रहे विभिन्न आदोलनों को बंद करवाकर माहौल सौहार्दपूर्ण बनाने में मदद की. वे कहते हैं, ‘‘अब हर कोई इनसे निराश है.’’ बोडो टेरिटोरियल एडमिनिस्ट्रेटिव कौंसिल, जो निचले असम के कुछ सबसे अस्थिर क्षेत्रों में शामिल है ने बीते कुछ वर्षों में भीषण हिंसा का सामना किया है.

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बोडो लगातार यहां रहने वाले बांग्लाभाषी मुसलमानों और देश के विभिन्न हिस्सों से आकर यहां बसने वाले लोगों के साथ हिंसक व्यवहार करते रहे हैं. चूंकि बाहर से यहां आकर बसने वाले यह लोग चाय के बागानों में काम करते आए है इसलिये इन्हें चाय जनजाति कहा जाता है.

बोडो लगातार यहां रहने वाले बांग्लाभाषी मुसलमानों और देश के विभिन्न हिस्सों से आकर यहां बसने वाले लोगों के साथ हिंसक व्यवहार करते रहे हैं

बोडो अपने लिये एक अलग राज्य चाहते हैं.इसके अलावा बोडो केंद्र सरकार द्वारा जारी की गई उस अधिसूचना से भी काफी नाराज हैं जिसमें उन्होंने सताये हुए अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को देश में रहने के लिये लंबी अवधि के परमिट जारी करने का फैसला किया है. बोडो समूहों में इस बात का भय है कि लंबी अवधि के बाद यह लोग यहां की नागरिकता की मांग करने लगेंगे. यहां पर बंगाली भाषा बोलने वाले हिदुओं की भी एक बड़ी आबादी है जो बांग्लादेश में हो रहे उत्पीड़न के चलते यहां आकर बस गई हैं.

दूसरी तरफ बीजेपी लगातार अवैध अप्रवासी कहकर बांग्लाभाषी मुसलमानों की मौजूदगी का विरोध करती आई है. आदिवासी और अन्य स्थानीय लोगों के कई समूह लगातार इस बात को उठाते आए हैं कि राज्य में बाहरी लोगों के लिये कोई ‘स्थान’ नहीं है और इनके चलते पहले से ही उनकी जमीन और संसाधनों का जबर्दस्त दोहन हो चुका है. इसके चलते स्थानीय लोग निरंतर गरीबी के दलदल में फंसे हुए हैं.

राज्य में बाहरी लोगों के चलते पहले से ही उनकी जमीन और संसाधनों का जबर्दस्त दोहन हो चुका है

पूर्व सांसद और प्रतिष्ठित साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित यूजी ब्रह्मा कहते हैं, ‘‘सीमापार से आकर यहां बसने वाले ही एकमात्र समस्या नहीं हैं. इसके साथा ही बोडो लोगों को देश के विभिन्न हिस्सों से यहां आकर जमीनों पर कब्जा करने वालों से भी दिक्कत है.’’

ब्रह्मा कहते हैं, ‘‘हम लगातार बीजेपी को आगाह करते आए हैं कि वह अवैध रूप से घुस आने वाले धर्म विशेष के समूहों को विशेष अधिकार देने जैसे वायदे करके लोगों को आपस में बांटना बंद करे.’’

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इसके अलावा बांग्ला भाषी मुसलमान भी सरकार द्वारा इस प्रकार के विभाजित करने वाले कामों से हैरान हैं. वे बदरुद्दीन अजमल के एआईयूडीएफ का मूल जनाधार हैं. समाज के प्रमुख हिस्सों में इन फैसलों के खिलाफ उठ रही आवाज के को देखते हुए बीजेपी को इन चुनावों में ध्रुवीकरण का प्रयास उल्टा भी पड़ सकता है.

अहोम समुदाय की नाराजगी

जाने-माने उपन्यासकार और मूल निवासी अहोम समुदाय के एक महत्वपूर्ण संगठन, असोम साहित्य सभा के अध्यक्ष ध्रुबाज्योति बोरा कहते हैं कि इस मुद्दे को लेकर ब्रहम्पुत्र घाटी में विरोध-प्रदर्शन हो रहे हैं. असम साहित्य सभा, ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन, यहां के मध्यम वर्गीय मूल निवासियों वाली असम गण परिषद और कुछ अन्य संगठन मिलकर इस फैसले का विरोध कर रहे हैं.

बीजेपी के खिलाफ प्रचार की अगुवाई कर रहे कार्यकर्ता से राजनीतिज्ञ बने अखिल गोगोई कहते हैं, ‘‘यह निर्णय असम समझौते की मूल भावना के खिलाफ है.’’

वे बताते हैं कि कैसे केंद्र की सत्ता मे आने के बाद अपनी असम-विरोधी गतिविधियों के चलते बीजेपी जनाधार खोती जा रही है. वे कहते हैं, ‘‘उन्होंने बागान श्रमिकों को दिया जाने वाला राशन कम कर दिया, पूर्वोत्तर की औद्योगिक नीति समाप्त कर दी, विशेष श्रेणी का दर्जा वापस ले लिया और अब इन्होंने उन बड़े बांधों के निर्माण को समर्थन देना शुरू कर दिया है जिनके विरोध में ये पहले हुआ करते थे.’’

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बोरा इस बात की ओर भी ध्यान दिलाते हैं कि यहां बराक वैली में रहने वाले कई निवासियों के रिश्तेदार सीमापार रहते हैं लेकिन यह कभी बड़ा मुद्दा नहीं बना है. बराक घाटी वह क्षेत्र है जहां सबसे अधिक प्रवासी रहने के लिये आते हैं.हालांकि उन्हें इस बात का अंदेशा है कि जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आएंगे यह मुद्दा ब्रह्मपुत्र घाटी में बड़ा होता जाएगा.

वे कहते हैं, ‘‘आपको इस बात से सहमत होना ही होगा कि बीते कुछ वर्षों में पड़ोसी बांग्लादेश में पलायन करके आने वालों में मुसलमानों के मुकाबले हिंदुओं की संख्या अधिक रही है.’’ साथ ही वे यह भी कहते हैं कि इसका एक कारण यह है कि क्षेत्र में हुई आर्थिक प्रगति का लाभ अल्पसंख्यकों को नहीं मिल पाया है जिसके चलते वे पलायन को मजबूर हुए हैं.

बोरा के अनुसार स्थानीय लोगों में इस बात का भी डर है कि अगर लोगों को आने की अनुमति देने वाली यह नीति लगातार जारी रही तो पलायन किसी भी सूरत में नहीं रुकेगा और ऐसे में प्रवासी आबादी स्थानीय और मूल निवासियों के अस्तित्व के लिये खतरा बन जाएगी.

ये संगठन लगातार यह मांग उठाते आ रहे हैं कि इन प्रवासियों या शरणार्थियों, जैसा कुछ लोगों द्वारा इन्हें पुकारा जाता है, को आने भी दिया जाए तो उसके लिये एक स्पष्ट नीति हो. बोरा कहते हैं, ‘‘अबतक इस बात के लेकर कोई स्पष्ट नीति या तंत्र नहीं है.’’ बोरा स्पष्ट करते हैं, ‘‘ऐसी बात नहीं है कि हम इस प्रकार से परेशान लोगों को प्रश्रय देने के मानवीय कदम के खिलाफ हैं. लेकिन ऐसा करने के लिये भी एक उचित तंत्र होना चाहिये.’’

स्थितियां बेकाबू

इस बीच बीजेपी ने अपने स्तर पर विभिन्न माध्यमों से इन समूहों के इस डर को यह कहते हुए दूर करने का प्रयास किया हैं कि इन लोगों को सिर्फ शरण दी गई है और ये नागरिकता के अधिकारों से महरूम हैं. सूत्र कहते हैं, ‘‘बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता ने इन संगठनों से संपर्क स्थापित किया और इन्हें यह समझाने का प्रयास किया कि नागरिकता एक बेहद उलझा हुआ विषय है जिसमें वर्षों का समय लगता है.’’

हालांकि बीजेपी के इस तर्क से कम ही लोग सहमत हैं. बोडो कहते हैं, ‘‘अगर वे अपने किये हुए वायदों से पलटते हैं तो हम किसी भी सूरत में उनका समर्थन नहीं करेंगे.’’

First published: 28 February 2016, 22:17 IST
 
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