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जम्मू बनाम कश्मीर: एक और जमीन का हस्तांतरण बना विवाद की जड़

कैच ब्यूरो | Updated on: 4 July 2016, 7:57 IST
QUICK PILL
  • राज्य राजस्व मंत्रालय द्वारा प्रस्तावित संशोधन में ये मांग की गयी है कि स्थांतरित संपत्ति पर किसी भी तरह का निर्माण कार्य नहीं किया जा सकता जब तक़ कि वो देश के कानून के अंतर्गत पंजीकृत न हो.
  • प्रस्तावित संशोधन में कश्मीर प्रान्त की जगह राज्य शब्द का प्रयोग किया गया है. इससे ये कानून पूरे राज्य पर लागू हो जाएगा.

जम्मू-कश्मीर में एक बार फिर भूमि हस्तांतरण का मुद्दा राजनैतिक विवाद की वजह बन रहा है. लेकिन इस बार विरोध 2008 अमरनाथ भूमि विवाद की तरह भूमि हस्तांतरण को लेकर नहीं बल्कि दूसरे राज्य के लोगों को लीज पर जमीन देने से रोकने वाले बिल का है. और इस बार विरोध के स्वर कश्मीर से नहीं बल्कि जम्मू से उठ रहे हैं.

सरकार में शामिल मुख्य पार्टी बीजेपी, जो पहले इस बिल को मंजूरी दे चुकी थी वो अब इसको खत्म करना चाहती है, क्यूंकि उसके जनाधार वाले क्षेत्रों में इसका भारी विरोध हो रहा है.

23 जून को पीडीपी और बीजेपी के मंत्रियों वाली कैबिनेट ने, चल रहे विधानसभा सत्र में जम्मू और कश्मीर संपत्ति हस्तांतरण अधिनियम में संशोधन वाले बिल को लाने का फैसला किया था. इस कानून के तहत दूसरे राज्य के निवासी जम्मू में भूमि या कोई और संपत्ति नहीं खरीद सकते.

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राज्य राजस्व मंत्रालय द्वारा प्रस्तावित संशोधन में ये मांग की गयी है कि स्थांतरित संपत्ति पर किसी भी तरह का निर्माण कार्य नहीं किया जा सकता जब तक़ कि वो देश के कानून के अंतर्गत पंजीकृत न हो.

दिलचस्प बात यह है कि कश्मीर वाले हिस्से में ये सारे प्रतिबंध पहले से ही लगे हुए हैं. राज्य संपत्ति हस्तांतरण अधिनियम के अनुसार कोई भी व्यक्ति, कश्मीर प्रान्त में स्थांतरित या अनुबंधित किये गए भूमि पर तब तक कुछ भी निर्माण नहीं कर सकता, जब तक़ वो स्थांतरण, सम्पति हस्तांतरण अधिनियम के खण्ड 138 के उपखण्ड (1) और (3) के प्रावधान के अंतर्गत वैध न हो.

प्रस्तावित संशोधन में कश्मीर प्रान्त की जगह राज्य शब्द का प्रयोग किया गया है. इससे ये कानून पूरे राज्य पर लागू हो जाएगा.

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इस बिल का पारित होना लगभग तय लग रहा था, लेकिन जब बिल पर वोटिंग की बात आई तो बीजेपी पीछे हट गयी

गौर करने वाली बात ये है कि शुरुआत में बीजेपी इस संशोधन का समर्थन कर रही थी, जिसकी वजह से सदन में इस बिल का पारित होना लगभग तय लग रहा था. लेकिन जब बिल पर वोटिंग की बात आई तो बीजेपी पीछे हट गयी. जम्मू बार एसोसिएशन द्वारा संशोधन का विरोध और जम्मू के अखबारों में छप रही तीखी आलोचना वाली ख़बरों ने पार्टी को तुरंत इसपर दोबारा से सोचने को मजबूर कर दिया.

30 जून को जब राज्य कानून मंत्री सईद बशारत बुखारी ने सदन में बिल रखा था, उस वक्त बीजेपी विधायक आरएस पठानिया और देविंदर कुमार मनियाल ने बिल को हड़बड़ाहट में पास न करने की सलाह देते हुए, बिल को सेलेक्ट कमेटी के पास भेजने की मांग की थी. कमेटी (जिसका चुनाव स्पीकर द्वारा किया गया है) को अगले विधानसभा सत्र में रिपोर्ट देने को कहा गया है.

बहरहाल नेशनल कॉन्फ्रेंस और कांग्रेस ने बिना किसी शर्त के बिल का समर्थन किया था. अब वे बीजेपी के इस कदम का विरोध कर रहे हैं. यहां तक कि पीडीपी विधायक अल्ताफ बुख़ारी ने विपक्ष के बिल पर वोटिंग की मांग को सही माना था. इसके बावजूद भी बिल सिलेक्ट कमेटी को भेज दिया गया.

बीजेपी के लिए काफी मायने रखता है जम्मू

यहां सवाल उठता है कि आखिर बीजेपी, कैबिनेट में पारित होने के बावजूद भी बिल की समीक्षा की बात क्यों कर रही है. हालांकि पार्टी ने बिल के हाईकोर्ट के निर्देशों के खिलाफ होने की बात कहने के अलावा कोई सफ़ाई नहीं दी है. इससे राज्य के लोगों के बीच भ्रम की स्थिति पैदा हो गयी है.

मंत्रिमंडल में बिल को स्वीकृति दिए जाने की वजह से बीजेपी को जम्मू सिविल सोसाएटी के तरफ से काफी कड़े विरोध का सामना करना पड़ रहा था. बीजेपी इस विरोध को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकती क्यूंकि जम्मू राजनीतिक लिहाज से बीजेपी के लिए बहुत मायने रखता है.

इस बिल को लेकर लोगों में एक धरणा ये पैदा हो चुकी है कि इसके पारित होने के बाद जम्मू में दूसरे राज्य के निवासियों को कोई भी संपत्ति स्थांतरित नहीं की जा सकेगी. ये धारा 370 के उस प्रावधान जैसा है जिसमे दूसरे राज्यों के लोगों को कश्मीर में बसने की इजाजत नहीं है. बीजेपी शुरुआत से ही धारा 370 को खत्म करना चाहती थी.

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जम्मू और कश्मीर के लोगों के बीच शुरू से ही भूमि, पहचान और राजनैतिक मुद्दों को लेकर टकराव की नौबत रहती आई है. दोनों हिस्सों के लोगों की परेशानियों को, भूमि स्थांतरण बिल के ऊपर पैदा हुई इस राजनीतिक लड़ाई से अलग नहीं रखा जा सकता है. 

कश्मीरी हमेशा से धारा 370 और दूसरे राज्य के लोगों को सम्पति स्थांतरण न करने के कानून को और मज़बूत बनाने की मांग करते रहे हैं. उनके हिसाब से ऐसे कानूनी रुकावटों का मजबूत होना इसलिए ज़रूरी है ताकि भारत के एकमात्र मुस्लिम बहुमत राज्य में जनसंख्या के तौर पर कोई बदलाव ना आये. वहीं जम्मू (जहां बीजेपी की अच्छी पकड़ है) में हमेशा से ऐसे कानूनी रुकावटों को खत्म करने की मांग की जाती रही है.

यहां समझने वाली बात ये है कि जैसे जम्मू में मुस्लिम समुदाय की संख्या कम है, वैसे है कश्मीर में सैनिक और कश्मीरी पंडित उपेक्षित वर्ग है. इस बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक राजनीतिक अंतर की वज़ह से दोनों हिस्सों के लोगों के मन में हमेशा एक असुरक्षा का डर बना रहता है.

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इस राजनैतिक शोर शराबे के बीच राज्य की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने मुद्दे को सकारात्मक दिशा देने की पहल की है

शायद जम्मू के लोगों के मन से इस डर को हटाने के लिए बीजेपी ने काफ़ी जल्दबाज़ी दिखाते हुए कानून में बदलाव करने के अपने फ़ैसले को वापस ले लिया है. पीडीपी का जनाधार कश्मीर में है और इसलिए जम्मू के लिए इसके दुरुपयोग की आशंका है.

इस राजनैतिक शोर शराबे के बीच राज्य की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने मुद्दे को सकारात्मक दिशा देने की पहल की है. उन्होंने ये बयान दिया है कि, बिल को सिलेक्ट कमेटी के पास इसलिए भेज गया है ताकि जम्मू और कश्मीर के बीच के मतभेदों का समाधान निकाला जा सके.

उन्होंने कहा है कि कहीं न कहीं लोगों का ऐसा मानना है कि जो जम्मू के लिए सही है वो कश्मीर के लिए सही नहीं है और जो कश्मीर के लिए सही है वो जम्मू के लिए नहीं. बिल पर बीजेपी विधायकों की राय पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने कहा कि किसी एक मुद्दे पर लोगों के अलग अलग अनुभव होते हैं और इन सारे मतभेदों को खत्म करना उनके पिता मुफ्ती साहब का सपना था.

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इस मुद्दे पर नेशनल कॉन्फ्रेंस के मुखिया उमर अब्दुल्लाह ने काफी कड़ा रूख अपनाते हुए कहा कि बीजेपी, बिल को असफल करके महबूबा मुफ्ती को किनारे करने का राजनैतिक अवसर ढूंढ़ रही है. शुक्रवार को उन्होंने अपने एक प्रतिनिधिमंडल के साथ राज्यपाल एनएम वोहरा को दो ज्ञापन सौंपा हैं.

उमर ने पत्रकारों को बताया कि पहले ज्ञापन में भूमि हस्तांतरण बिल के साथ छेड़छाड़ करने की शिकायत की गई है. उसमें ये ज़िक्र किया गया है कि "कल हमने सदन में देखा कि पहली बार ऐसा हुआ है जब किसी मंत्री ने बिल को सदन में पेश किया, फिर उसी मंत्री के द्वारा बिल को सिलेक्ट कमेटी को भेजे जाने की सिफारिश की गई, जबकि बिल के पक्ष में बहुमत का समर्थन था.” 

उन्होंने कहा, "हम मानते हैं कि इससे सदन की विश्वसनीयता को चोट पहुंची है और ऐसा करना पीडीपी की पुरानी आदत रही है. उन्होंने पहले भी संपत्ति हस्तांतरण कानून में बदलाव करने की कोशिश की है और वो फिर से वही करना चाहते हैं.”

First published: 4 July 2016, 7:57 IST
 
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