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भाजपा का यूपी फार्मूला: दलित राजनीति में सेंध और सपा से सांठगांठ

अतुल चौरसिया | Updated on: 10 February 2017, 1:52 IST
QUICK PILL
  • अमित शाह 24 फरवरी को बहराइच में राजा सुहैल देव की स्मृति में आयोजित एक \r\nकार्यक्रम में हिस्सा लेंगे. इसके साथ ही पूरे राज्य में सुहैल देव से \r\nजुड़े कार्यक्रमों की शुरुआत की जाएगी.
  • भाजपा की दलित राजनीति का एक और मोर्चा 26 फरवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र \r\nमोदी बनारस में खोलेंगे. वहां मोदी दलितों के एक अन्य महापुरुष संत रविदास \r\nकी प्रतिमा का अनावरण करेंगे.

आजकल लखनऊ में भाजपा की दो बातों के लिए चर्चा हो रही है. एक तो 24 फरवरी को बहराइच में होने वाली अमित शाह की बड़ी रैली की और दूसरी मौजूदा विधानसभा के बजट सत्र में सरकार के प्रति भाजपा के उदासीन रवैए की.

केंद्र में सरकार बनने के बाद भाजपा की राजनीति ने जबर्दस्त राजनीतिक मोड़ लिया है. संघ प्रमुख (मोहन भागवत) से लेकर सरकार प्रमुख (नरेंद्र मोदी) तक गाहे-बगाहे आंबेडकर और दलितों को याद करते हैं. यह धारणा अब आम हो चली है कि संघ दलितों को अपने पाले में खींच कर एक ऐसा अकाट्य वोटबैंक तैयार करना चाहता है जिससे उत्तर प्रदेश में भाजपा को आगामी विधानसभा चुनाव में सरकार बनाने में सहूलियत हो सके.

अपनी दलित राजनीति के पहले चरण में अमित शाह ने उत्तर प्रदेश पर निगाहें गड़ा दी हैं. दलित जातियों में दो प्रमुख जातियों पासी और भर समाज पर भाजपा की निगाह है. इन दोनों जातियों के बीच राजा सुहेल देव नाम के एक ऐतिहासिक राजा की बड़ी प्रतिष्ठा है. भाजपा उसी विरासत पर धावा बोलने की फिराक में है. इस रणनीति के तहत भाजपा पासी और भर समुदाय को गैर जाटव और गैर चमार गुट से अलग करने की नीति पर काम कर रही है.

राजा सुहेल देव की स्मृति में भाजपा ने ताबड़तोड़ रैलियों और कार्यक्रमों की योजना तैयार की है. अमित शाह 24 फरवरी को बहराइच में राजा सुहैल देव की स्मृति में आयोजित एक कार्यक्रम में हिस्सा लेंगे. इसके साथ ही पूरे राज्य में सुहैल देव से जुड़े कार्यक्रमों की शुरुआत की जाएगी.

2007 में बसपा ने जब यूपी में सरकार बनायी थी तब कई जिलों में राजा सुहेल प्रतिमाएं स्थापित की गईं थीं

राजा सुहैल देव की प्रतिष्ठा एक बड़े दलित नायक की है. 2007 में बसपा ने जब यूपी में सरकार बनायी थी तब कई जिलों में राजा सुहेल प्रतिमाएं स्थापित की गईं थीं.

गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश में दलित आबादी करीब 20 फीसदी है. इसमें करीब 65 फीसदी हिस्सा जाटव और चमार जाति का है. यह बसपा सुप्रीमो मयावती की अपनी जाति भी है और परंपरागत रूप से बसपा के साथ रही है.

भाजपा की रणनीति बाकी बची 35 फीसदी गैरजाटव और दूसरी दलित जातियों को अपने पाले में लाने की है. इनमें पासी और भर की आबादी कुल मिलाकर 16 फीसदी के आस पास है.

इस 16 फीसदी आबादी में भाजपा अगर सेंध लगाने में सफल रहती है तो विधानसभा में उसकी संभावनाएं कई गुना बढ़ जाएंगी.

इसी नीति के तहत भाजपा अध्यक्ष बहराइच में राजा सुहेल के नाम पर आयोजित कार्यक्रम में हिस्सा लेने जा रहे हैं. भाजपा की उत्तर प्रदेश इकाई से जुड़े एक नेता बताते हैं कि उन्हें लोकसभा चुनाव में इन दोनों जातियों का बड़ा समर्थन मिला था. लिहाजा विधानसभा चुनाव में भाजपा की कोशिश रहेगी कि उस समर्थन को और मजबूत कर लिया जाए.

सैय्यद की सेना को बहराइच के नजदीक राजा सुहैल ने न सिर्फ रोका बल्कि अपनी अदम्य वीरता के जरिए उन्हें पराजित भी किया

दलित वोटों में सेंध की जुगत में लगी भाजपा जल्द ही राजा सुहैल को एक बड़े हिंदुवादी प्रतीक के रूप में खड़ा करने की है. राजा सुहैल से जुड़ा इतिहास भी भाजपा को रास आता है.

कहानियां हैं कि 11वीं सदी में महमूद गजनवी की मौत के बाद उसके एक रिश्तेदार सैय्यद सालार महमूद ने अवध के आगे आकर राजा सुहैल की रियासत पर हमला किया था.

लगातार जीत दर्ज करती आ रही सैय्यद की सेना को बहराइच के नजदीक राजा सुहैल ने न सिर्फ रोका बल्कि अपनी अदम्य वीरता के जरिए उन्हें पराजित भी किया.

जाहिर है भाजपा को दलितों को रिझाने के लिए इससे बेहतर प्रतीक उत्तर प्रदेश में और क्या मिलेगा. सो जल्द ही राजा सुहैल भाजपा के हिंदुवादी प्रतीकों में शामिल हो सकते हैं.

भाजपा बसपा से राजनीतिक लड़ाई लड़ रही है वहीं दूसरी तरफ सपा से निपटने की उसकी रणनीति एकदम अलग है

भाजपा की दलित राजनीति का एक और मोर्चा 26 फरवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बनारस में खोलेंगे. वहां मोदी दलितों के एक अन्य महापुरुष संत रविदास की प्रतिमा का अनावरण करेंगे.

एक तरफ तो भाजपा बसपा से राजनीतिक लड़ाई लड़ रही है वहीं दूसरी तरफ सपा से निपटने की उसकी रणनीति एकदम अलग दिख रही है.

इस समय उत्तर प्रदेश की विधानसभा का बजट सत्र चल रहा है. लेकिन भाजपा सदन के भीतर और बाहर दोनों जगह नदारद है. राज्यपाल के अभिभाषण पढ़ने के दौरान भाजपा सदन में शांत दिखी. जबकि उसके 48 पास विधायक हैं.

ले देकर सपा के खिलाफ सदन में बसपा के विधायक सरकार के खिलाफ मोर्चा खोले नजर आ रहे थे. सपा सरकार के क्रियाकलापों को लेकर बसपा ने राज्यपाल से कड़ा प्रतिरोध दर्ज करवाया, सरकार को कटघरे में खड़ा किया जबकि भाजपा ब्रिगेड शांत बैठी रही.

ऐसा नहीं है कि सूबे में जनता से जुड़े मुद्दे खत्म हो चुके हैं. गोरखपुर से लगे पूर्वांचल के बड़े इलाके में साल दर साल जापानी इंसेफलाइटिस बुखार से सैंकड़ों नौनिहाल मौत के मुंह में समा जा रहे हैं. सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी है. और भाजपा इस मुद्दे को सरकार को घेरने लायक भी नहीं पा रही है.

पूर्वांचल के बड़े इलाके में साल दर साल जापानी इंसेफलाइटिस बुखार से सैंकड़ों नौनिहाल मौत के मुंह में समा जा रहे हैं

उत्तर प्रदेश के 52 जिलों को सरकार ने सूखाग्रस्त घोषित कर दिया है. बीते साल पहली बार पश्चिमी उत्तर प्रदेश के इलाके में किसानों की आत्महत्या की खबरें सामने आईं. इस इलाके को अपेक्षाकृत साधनसंपन्न माना जाता है. लेकिन इन मुद्दों पर भी भाजपा सपा सरकार के खिलाफ कहीं कोई आंदोलन या घेराव करती नजर नहीं आई. प्रदेश सरकार की तरफ से सूखा राहत योजनाओं का कोई हाल लेने वाला नहीं है.

मुद्दे और भी हैं, मसलन बुंदेलखंड इलाके को लें तो यहां लगातर तीसरे साल सूखे के कारण भूखमरी के हालात हैं. मीडिया में आई खबरें बताती हैं कि लोग यहां घास की रोटी खाने को मजबूर हैं इसके बावजूद भाजपा राज्य की अखिलेश यादव सरकार को घेर पाने में पूरी तरह से असफल रही है.

यूपी के 52 जिलों को सूखाग्रस्त घोषित किया गया है लेकिन भाजपा, सपा सरकार के खिलाफ कोई आंदोलन करती नजर नहीं आई

पार्टी कार्यकर्ताओं की सारी सक्रियता इन जनहित के मुद्दों से दूर अक्सर बेमलब के मुद्दों पर दिखाई देती है. मसलन ज्यादतर सांप्रदायिक तनाव के मुद्दों पर पार्टी के नेता बेलगाम बयानबाजी, घटनास्थल के दौरे और पंचायतें करते नजर आते हैं.

जाहिर है कि पार्टी की सपा को लेकर रणनीति जनता के मुद्दों पर केंद्रित न होकर भावनात्मक मुद्दों पर ज्यादा है. यह ऐसी रणनीति है जिस पर अमल कर अतीत में भाजपा और सपा दोनों को व्यापक फायदा मिला है. बुंदेलखंड में पानी या फिर पूर्वांचल में इंसेफेलाइटिस की समस्या पर भाजपा ने कोई बड़ा प्रदर्शन या आंदोलन आज तक नहीं किया लेकिन पार्टी लव जेहाद जैसे हवाई मुद्दों पर बड़ी रैलियां और पचायतें करती रही है.

2017 में जीत का सपना देख रही भाजपा फिलहाल उत्तर प्रदेश की विधानसभा में भी नहीं दिख रही है. सदन के अंदर सिर्फ सपा और बसपा आपस में गुत्थमगुत्था नजर आ रहे हैं.

इस चुप्पी के पीछे भाजपा नेताओं का तर्क है कि राज्यपाल का सम्मान करना जरूरी है. लेकिन सरकार के विरोध से भाजपा को किसने रोका है. इस सावल पर भाजपा नेता बगलें झांकने लगते हैं. जानकारों के मुताबिक सपा और भाजपा की सारी उम्मीदें आपसी अंडरस्टैंडिंग के जरिए आगामी चुनाव के सांप्रदायिक ध्रुवीकरण पर टिकी हुई हैं.

भाजपा की समस्या यह है कि उसके पास उत्तर प्रदेश में कोई धारदार तेवरों वाला नेता नहीं है

भाजपा की दूसरी समस्या यह है कि उसके पास उत्तर प्रदेश में कोई धारदार तेवरों वाला नेता नहीं हैं.  लिहाजा किसी प्रेरक नेतृत्व के अभाव में भाजपा बिखरी हुई है. मुद्दों को भुना सकने की काबिलियत भी नहीं दिख रही है या कहें कि पार्टी में मुद्दों के आधार पर आंदोलन खड़ा करने की नीयत ही नहीं बची है.

बदले हुए माहौल में भाजपा अब तेवरदार नेताओं से परहेज करने लगी है. आज मोदी-शाह के नेतृत्व में कल्याण सिंह या विनय कटियार जैसे तेवर वाले नेताओं के लिए पार्टी में जगह नहीं बची है, लेकिन सच यही है कि ऐसे नेताओं के दम पर ही भाजपा उत्तर प्रदेश में बड़ी ताकत बन सकी है.

तमाम अनुकूल परिस्थितियां होने के बावजूद भाजपा फिलहाल उत्तर प्रदेश में सपा की बी टीम के रूप में आगे बढ़ती दिख रही है.

First published: 3 February 2016, 11:36 IST
 
अतुल चौरसिया @beechbazar

एडिटर, कैच हिंदी, इससे पूर्व प्रतिष्ठित पत्रिका तहलका हिंदी के संपादक के तौर पर काम किया

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