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उत्तर प्रदेश: अमित शाह ने की राजनाथ सिंह को साधने की पहल

अतुल चंद्रा | Updated on: 15 March 2016, 22:58 IST
QUICK PILL
  • उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी ने साफ कर दिया है कि वह इस बार उत्तर प्रदेश के बड़े नेताओं को नजरअंदाज करने का जोखिम नहीं उठाएगी.
  • पार्टी ने राज्य में छह बड़ी रैलियों का कार्यक्रम बनाया है जिसे पार्टी के नेशनल प्रेसिडेंट अमित शाह और गृहमंत्री राजनाथ सिंह संयुक्त तौर पर संबोधित करेंगे.

तुष्टिकरण की यह नीति महज रैलियों में दिए जाने वाले भाषण तक ही सीमित रहेगी या फिर इसका असर टिकटों के बंटवारे पर भी देखने को मिलेगा? क्या इस बात की संभावना है कि बीजेपी अपनी तरफ से मुख्यमंत्री के पद का उम्मीदवार भी पेश करेगी?

उत्तर प्रदेश बीजेपी के चीफ और मुख्यमंत्री के तौर पर राजनाथ सिंह का कार्यकाल विफल रहा है. ऐसे में उत्तर प्रदेश का मामला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी प्रेसिडेंट अमित शाह के लिए बेहद मुश्किलों भरा रहने वाला है.

जातीय संघर्ष

अमित शाह केंद्रीय पर्यटन मंत्री महेश शर्मा को आगे बढ़ा रहे हैं और राज्य में उन्हें अच्छा खासा सियासी महत्व भी मिला है लेकिन पार्टी राजनाथ सिंह को नाराज करने का जोखिम नहीं उठना चाहती. 

पार्टी नेतृत्व को इस बात का पता है कि सिंह अभी राज्य बीजेपी ईकाई में बेहद मजबूत दखल रखते हैं. इसके अलावा राजा भैया और चुलबुल सिंह जैसे ठाकुर नेताओं से उनके अच्छे संबंध हैं.

पिछले महीने ही राजनाथ सिंह ने बरेली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ संयुक्त तौर पर किसानों की सभा को संबोधित किया.

बीजेपी पहले ही उत्तर प्रदेश में दिग्गज नेताओं को नजरअंदाज कर चुकी है. ऐसे में वह राजाथ सिंह को नजरअंदाज करने का जोखिम नहीं उठा सकती

राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक पार्टी की केंद्रीय ईकाई उत्तर प्रदेश के बीजेपी अध्यक्ष लक्ष्मीकांत वाजपेयी के बाद अगले अध्यक्ष की तलाश में जुटी हुई है. वाजपेयी का कार्यकाल खत्म होने को आ रहा है. 

सियासी गलियारों में गाजीपुर से सांसद मनोज सिन्हा और आंवला से तीन बार विधायक रहे धर्मपाल सिंह का नाम चर्चा में है. सिन्हा भूमिहार समुदाय से आते हैं जबकि सिंह लोध समुदाय से ताल्लुक रखते हैं. 

सिंह को राजनाथ सिंह का समर्थन हासिल है. ऐसे में अगर सिंह को उत्तर प्रदेश बीजेपी का अध्यक्ष बनाया जाता है तो अगले विधानसभा चुनाव में राजनाथ सिंह की अहम भूमिका होगी. सिंह को बीजेपी अध्यक्ष बनाए जाने से राजनाथ सिंह अपने दो धुर विरोधी कल्याण सिंह और उमा भारती को साधने में मदद मिलेगी जो इसी समुदाय से ताल्लुक रखते हैं.

तो फिर ब्राह्मण कहां जाएंगे?


उत्तर प्रदेश की रजानीति में ब्राह्मण बीजेपी के बड़े समर्थकों में शुमार हैं. इस मामले में लखनऊ के मेयर दिनेश शर्मा का नाम आता है. कलराज मिश्रा और मुरली मनोहर जोशी को हाशिए पर धकेले जाने के बाद पार्टी में महेश शर्मा ही ब्राह्मणों का एकमात्र चेहरा रह जाते हैं. सिंह की मदद से राजनाथ सिंह उत्तर प्रदेश में टिकटों के बंटवारे पर पूरा नियंत्रण रख पाएंगे.

बीजेपी उत्तर प्रदेश में नए पार्टी अध्यक्ष की तलाश कर रही है और उसके सामने मनोज सिन्हा और धर्मपाल सिंह का नाम है

लक्ष्मीकांत वाजपेयी ने हालांकि राजनाथ सिंह के साथ किसी तरह की प्रतिद्वंद्विता से इनकार किया है. उन्होंने कहा, 'हम जातिगत आधार पर कोई फैसले नहीं लेते हैं.'

राजनीति विज्ञानी एसके द्विवेदी भी जातिगत लड़ाई को खारिज करते हुए कहते हैं, 'अटल बिहारी वाजपेयी के बाद पार्टी ने ब्राह्मण नेताओं को आगे नहीं बढ़ाया है.' द्विवेदी ने महेश शर्मा का जिक्र करते हुए कहा कि मोदी और शाह की मदद से वह राजनाथ सिंह का खेल खराब कर सकते हैं. उन्होंने कहा, 'आखिरकार राजनाथ सिंह प्रधानमंत्री मोदी के विश्वासपात्रों में से नहीं हैं.'

2014 में बीजेपी ने 17 ब्राह्मणों और 14 ठाकुरों को टिकट दिया था. इसके अलावा पार्टी ने उत्तर प्रदेश में 25 ओबीसी उम्मीदवारों को टिकट दिया था. बीजेपी के एक स्थानीय नेता ने कहा, 'अगर राजनाथ सिंह को टिकट वितरण में भूमिका मिलती है तो निश्चित तौर पर विधानसभा चुनावों में ब्राह्मणों के मुकाबले ठाकुरों को ज्यादा टिकट मिलेगा.'

शनिवार को लखनऊ में हुई पार्टी की बैठक में यह फैसला लिया गया कि वह राज्य में 6 बड़ी रैलिया करेगी. बैठक की अध्यक्षता पार्टी के नेशनल वाइस प्रेसिडेंट और उत्तर प्रदेश के प्रभारी ओम माथुर ने कही. उन्होंने कहा कि इन सभी 6 रैलियों को राजनाथ सिंह और अमित शाह संयुक्त रूप से संबोधित करेंगे.  

बिहार चुनाव से मिले सबक को देखते हुए पार्टी ने उत्तर प्रदेश के बड़े नेताओं को तवज्जो देने का फैसला किया है. चूंकि पहले से ही कल्याण सिंह, मुरली मनोहर जोशी, लालजी टंडन, ओम प्रकाश सिंह, सूर्य प्रताप शाही और विनट कटियार को हाशिए पर पहुंचा चुकी है. ऐसे में अब पार्टी के लिए राजनाथ सिंह को नजरअंदाज करना मुश्किल होगा.

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First published: 15 March 2016, 22:58 IST
 
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