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पंजाब: सहजधारियों को एसजीपीसी से बाहर रखकर अकालियों को क्या फायदा होगा?

राजीव खन्ना | Updated on: 18 March 2016, 8:37 IST
QUICK PILL
  • बीजेपी सरकार कानून बनाकर शिरमोणी गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के चुनाव में सहजधारियों के वोट देने पर रोक लगाने जा रही है. राज्य सभा में ये कानून पारित हो चुका है.
  • प्रेक्षकों के अनुसार सुप्रीम कोर्ट में मामले के विचाराधीन होने के बावजूद अकाली दल बीजेपी के सहारे बनवाना चाहती है ये कानून.

पंजाब में सत्ताधारी शिरोमणी अकाली दल (एसएडी) अपने साझीदार बीजेपी की मदद से सिखों की सर्वोच्च धार्मिक संस्था शिरोमणी गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) के चुनाव में सहजधारियों को हिस्सा लेने पर रोक लगाने जा रही है.

पिछले हफ्ते राज्यसभा में सिख गुरुद्वारा संशोधन विधेयक पारित हुआ. इस विधेयक को एसजीपीसी में अकालियों के वर्चस्व को मजबूत करने के प्रयास के तौर पर देखा जा रहा है. पंजाब में अगले साल विधान चुनाव होने वाले हैं.

सहजधारी उन लोगों के लिए प्रयोग किया जाने वाला व्यापक शब्द है जो सिख धर्म की शिक्षाओं में यकीन रखते हैं लेकिन वो आधिकारिक तौर पर धार्मिक संस्कार नहीं कराते. कई विश्लेषक इसे सिख धर्म की विशेष रवायत मानते हैं. सहजधारी शब्द 'सहज' से बना है.

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आल इंडिया गुरुद्वारा एक्ट 1925 के तहत सहजधारियों को एसजीपीसी के चुनाव में वोट देने का अधिकार नहीं है.

एसजीपीसी पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और चंडीगढ़ स्थित सभी गुरुद्वारों और सिख धार्मिक संस्थानों के प्रबंधन देखता है. सिखों के सर्वाधिक पवित्र गुरुद्वारे अमृतसर स्थित हरमिंदर साहब की देखरेख भी एसजीपीसी के पास है.

एसजीपीसी के पदाधिकारियों का चुनाव हरमिंदर साहब में एक सार्वजनिक सभा में होता है ताकि सभी सिख इसमें भाग ले सकें.

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पंजाब विधान सभा ने 1959 में एक कानून बनाकर सहजधारियों को एसजीपीसी चुनाव में मतदान का अधिकार दिया था. हरियाणा के अलग राज्य के रूप में गठन के बाद ये अंतर-राज्यीय संगठन बन गया. इसके बाद इसमें बदलाव के लिए संसद कानून के द्वारा ही हो सकता है.

एसजीपीसी के पदाधिकारियों का चुनाव हरमिंदर साहब में एक सार्वजनिक सभा में होता है ताकि सभी सिख इसमें भाग ले सकें

1990 के दशक में सहजधारियों को चुनाव से बाहर करने की मांग उठने लगी. विरोध करने वालों ने आरोप लगाया कि सहजधारियों इस अधिकार का गलत इस्तेमाल कर रहे हैं.

अकालियों की मांग पर अटल बिहारी वाजपेयी की एनडीए सरकार ने एक नोटिफिकेशन के जरिए सहजधारियों को मतदान से रोक दिया गया.

इस नोटिफिकेशन को सहजधारी सिख फेडेरेशन ने अदालत में चुनौती दी. पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने नोटिफिकेशन को  2011 में खारिज कर दिया. उसके बाद एसजीपीसी ने इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की. जहां ये मामला अभी विचाराधीन है.

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इस बीच हर पांच साल पर होने वाले एसजीपीसी चुनाव स्थगित हो गया. अदालत ने अंतिम फैसला आने तक एसजीपीसी का कामकाज एक कार्यकारी कमेटी बनाकर उसे सौंप दिया. अदालत के फैसले से राज्य सराकर, एसजीपीसी समेत सभी पक्षों की रजामंदी थी.

इस समय एसजीपीसी के प्रमुख अवतार सिंह मक्कड़ हैं. उनके माध्यम से संस्था पर अकाली दल का अपरोक्ष नियंत्रण है.

केंद्र में जब से नरेंद्र मोदी सरकार बनी है तब से अकाली दल सरकार पर कानून बनाकर सहजधारियों को चुनाव से बाहर करवाने का प्रयास कर रहा है. अकालियों को डर है कि एसजीपीसी से उनका नियंत्रण खत्म हो जाएगा.

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सहजधारी सिख पार्टी(एसएसपी) ने राज्य सभा से पास संशोधन को दुर्भाग्यपूर्ण बताया है. पार्टी के वरिष्ठ नेता परमजीत सिंह रानू ने कैच से कहा, "ये फासीवादी ताकतों का एक अल्पसंख्यक समुदाय को अति-अल्पसंख्यक में बदल देने के प्रयास का हिस्सा है."

रानू कहते हैं कि "ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण ये है कि कैप्टन अमरिंदर सिंह और रवनीत सिंह बिट्टू ने भी इसका विरोध नहीं किया. राज्य सभा में बीजेपी अल्पमत में है फिर भी सभी दलों ने चुप्पी साधे रखी."

रानू कहते हैं कि सरकार ने तो सामान्य परंपरा के उलट इस विधेयक को पहले राज्य सभा में पारित कराया फिर वो इसे लोक सभा में पारित कराएगी.

रानू कहते हैं कि दोनों सदनों में पारित होने के बाद विधेयक राष्ट्रपति के पास जाएगा. वो कहते हैं, "हम राष्ट्रपति से समय मांगेंगे. हमने पहले ही उन्हें अपनी चिंता बता दी है."

रानू कहते हैं कि अकाली दल को राज्य के आगामी चुनाव में एंटी-इनकमबेंसी का डर सता रहा है. उसे लग रहा है कि वो एसजीपीसी पर भी नियंत्रण खो देगा. राज्य सरकार और एसजीपीसी का बज़ट लगभग बराबर ही होता है.

रानू कहते हैं, "हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ अकाली ही सुप्रीम कोर्ट गए थे. ये चोर रास्ता लेने के बजाय वो अदालत के फैसला का इंतजार कर सकते थे?"

रानू कहते हैं, "एसजीपीसी के नियम के अनुसार जिसने अमृत छका है वही चुनाव लड़ सकता है. ऐसे में उन्हें किस बा का डर है. मैं ये भी पूछना चाहता हूूं कि अकाली ये मुद्दा तभी क्यों उठाते हैं जब केंद्र में बीजेपी सत्ता में होती है? पिछले बार वाजपेयी थे, इस बार मोदी हैं."

रानु कहते हैं कि केंद्र सरकार के इस फैसले से सामाजिक गतिरोध पैदा होगा. इससे एक ही परिवार के जिस व्यक्ति ने अमृत छका है वो वोट देगा और जिसने नहीं छका है वो वोट नहीं देगा.

सूत्रों के अनुसार संसद की संस्तुति के बाद ये मामला सुप्रीम कोर्ट जाएगा जो एसजीपीसी पर लगी रोक हटा लेगा ताकि उसका पुनर्गठन हो सके.

प्रेक्षकों के अनुसार ऐसा होता है तो मक्कड़ एसजीपीसी से बाहर हो जाएंगे. पिछले साल पंजाब में गुरुग्रंथ साहब के अपमान के मामले पर उनकी काफी आलोचना हुई थी.

कांग्रेसी नेता कैप्टन अमरिंदर सिंह ने बीजेपी सरकार के फैसले को प्रतिगामी बताया है

पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल की बहू हरसिमरत कौर केंद्रीय मंत्री हैं. राज्य सभा में विधेयक पारित होने के बाद उन्होंने कहा कि उच्च सदन ने पिछली तारीख( अक्टूबर, 2003) से इसे पारित करके सिख समुदाय की भावना का सम्मान किया है.

हरसिरत ने इस विधेयक को अकाली दल की जीत बताया. उन्होंने कहा कि सहजधारियों की आड़ में बाहरी लोग एसजीपीसी में घुसपैठ करते थे.

कांग्रेसी नेता कैप्टन अमरिंदर सिंह ने बीजेपी सरकार के फैसले को प्रतिगामी बताया है.

अमरिंदर ने कहा, "भारत सरकार ने अकालियों को खुश करने के लिए ये फैसला लिया है ताकि एसजीपीसी पर अकालियों का नियंत्रण बना रहे. नतीजतन, सामाजिक विभाजन जारी रहे."

अमरिंदर ने लोकतांत्रिक प्रक्रिया का इस्तेमान करके समाज के एक तबके वोट देने से वंचित करने को दुर्भाग्यपूर्ण बताया. उनका मानना है कि सरकार का फैसला अदालत में टिक नहीं पाएगा.

इस मामले में एक दूसरा दृष्टिकोण भी है. विश्लेषकों का कहना है कि 21वीं सदी में आरएसएस इस बात को लेकर परेशान थी कि हिंदू सिख धर्म स्वीकार करते जा रहे हैं और अपने घरों में प्रकाशोत्सव मना रहे हैं.

आरएसएस को डर था कि यह लोग अमृत झककर सिख बन जाएंगे इसलिए भाजपा ने अकाली की मांग का समर्थन किया. कथित तौर पर 2001 और 2002 में आरएसएस नेताओं के उन बयानों पर कड़ी प्रतिक्रिया भी मिली जिनमें कहा गया था कि सिख हिंदू धर्म का ही एक हिस्सा थे.

First published: 18 March 2016, 8:37 IST
 
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