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औवैसी आईएस का समर्थन कर रहे हैं, या उससे निपटने में देश की मदद कर रहे हैं?

आदित्य मेनन | Updated on: 18 July 2016, 8:10 IST

आल इंडिया मजलिस ए इत्तेहादुल मुसलमीन (एआईएमआईएम) के प्रमुख और हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी के खिलाफ हैदराबाद में राजद्रोह का मुकदमा दर्ज किया गया है. 

उन पर आरोप है कि उन्होंने पिछले माह आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट (आईएस) से सहानुभूति रखने के संदेह में राष्ट्रीय जांच एजेन्सी (एनआईए) द्वारा गिरफ्तार पांच लोगों को कानूनी सहायता मुहैया कराने की बात कही थी.

एक स्थानीय अदालत के आदेश के बाद सरूर नगर पुलिस थाने में ओवैसी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 124ए के तहत राजद्रोह का मुकदमा दर्ज किया गया. पुलिस को 30 जुलाई से पहले अदालत को इस संदर्भ में रिपोर्ट देने को कहा गया है.

शिकायतकर्ता भाजपा से जुड़े वकील

ओवैसी के खिलाफ राजद्रोह मामले के पीछे भाजपा है. एक वकील के करुणसागर की निजी शिकायत के आधार पर यह मामला दर्ज किया गया है. सागर के बारे में कहा जाता है कि वह ग्रेटर हैदराबाद में भाजपा की लीगल और लेजिस्लेटिव सेल के संयोजक हैं.

करुणसागर के विचार से ओवैसी राजद्रोह के अपराधी हैं जो अपनी टिप्पणियों के जरिए राष्ट्रविरोधी तत्वों का साहस बढ़ा रहे हैं और एनआईए द्वारा गिरफ्तार आईएस के संदिग्धों को कानूनी मदद पहुंचाने की बात कहकर आतंकियों को ऑक्सीजन दे रहे हैं.

लोगों को स्मरण होगा कि ये वही करुणसागर हैं जिन्होंने इसी साल की शुरुआत में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी.

आशंका उत्पन्न होती है कि ओवैसी संदिग्धों को कानूनी मदद सुलभ कराने का बात कहकर आईएस की मदद कर रहे है

दरअसल, केजरीवाल ने ट्विटर पर एक कार्टून पोस्ट किया था. इस कार्टून में हनुमानजी जैसा दिख रहा एक व्यक्ति प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को आश्वस्त कर रहा था. उनके विचार से यह हनुमानजी का अपमान था.

छात्र रोहित वेमुला की आत्महत्या घटना के बाद उन्होंने अपना पूरा समय इस कोशिश में लगा दिया कि यह दलित छात्र वास्तव में ओबीसी वर्ग में आता था. करुणसागर आरएसएस से जुड़े कार्यकर्ता हैं और वह वीर सावरकर की हिन्दुत्ववादी विचारधारा से पूरी तरह प्रभावित हैं.

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एक वजह यह भी है कि उनकी शिकायत के पीछे भाजपा मजबूती से उनके साथ खड़ी है. पार्टी नेतृत्व का उन पर सीधा आशीर्वाद है. आश्चर्य की बात तो यह भी है कि कांग्रेस ने भी अपने प्रवक्ता टी वडक्कन के जरिए यही रुख अपनाया है और ओवैसी की गतिविधियों की कानून मंत्रालय के जरिए निगरानी कराए जाने की मांग की है. 

ऐसे में यही आशंका उत्पन्न होती है कि ओवैसी संदिग्धों को कानूनी मदद सुलभ कराने का बात कहकर आईएस की मदद कर रहे है.

क्या ओवैसी आईएस की मदद कर रहे हैं?

यह सवाल बड़ा ही मौजूं है. इसका जवाब हां में है. लेकिन यह आईएस इस्लामिक स्टेट नहीं, वरन इंडियन स्टेट है.

हम सभी ने यह अच्छी तरह देखा है कि अतीत में किस तरह मुसलमानों को फर्जी मामलों में आतंकवाद का आरोपी बता कर जेलों मे डाला जाता रहा है. मालेगांव विस्फोट मामला ऐसा ही एक उदाहरण है. लिहाजा यह और भी जरूरी है की आईएस आरोपियों की जांच निष्पक्ष तरीके से हो जाय. लेकिन कानूनी पहलू इस मामले में ओवैसी की राजनीतिक शैली के आगे फीके पड़ जाते हैं.

लोकतंत्र की मजबूती इसी सार्थकता में निहित है कि समाज के सबसे निचले श्रेणी का व्यक्ति भी यह महसूस कर सके कि उसकी भी लोकतंत्र में भागीदारी है. आजादी की मजबूत भावना के बावजूद कश्मीर के लोगों ने हथियार 1987 में उठाया जब राज्य के चुनावों में बड़े पैमाने पर धांधली की गई.

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ओवैसी की कोशिशों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि ज्यादा से ज्यादा मुस्लिम समुदाय यह महसूस करे कि व्यवस्था के भीतर वह अपने विचार व्यक्त कर सकता है. इस तरह उसे कट्टरवाद की तरफ बढ़ने से रोका जा सकता है. लोगों का पथभ्रष्ट होकर आतंकी संगठन में शामिल होने को जायज नहीं ठहराया जा सकता. वर्तमान में हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि नरेन्द्र मोदी की नीतियों से मुसलमानों के नाराज होने और उनमें भय के कई कारण हैं.

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय और जामिया मिलिया को उनका अल्पसंख्यक दर्जा छिनने का डर सता रहा है

इन घटनाओं को याद कीजिए जो पिछले दो सालों में हुईं हैं. दादरी में मोहम्मद अखलाक की पीट-पीटकर हत्या, लातेहार में बालूमाथ के जंगलों में भैंसों को बाजार ले जा रहे मजलूम अंसारी (35) और 12 वर्षीय इम्तयाज को फांसी पर लटका देना, पुणे में टैक्नो मोहसिन शेख की हत्या.

संजय राउत का मुस्लिमों से मताधिकार छीन लेने सम्बंधी लेख लिखना, साध्वी प्राची की यह मांग कि भारत को मुस्लिम मुक्त-बनाया जाए, योगी आदित्यनाथ के समर्थकों का मुस्लिम महिलाओं के विरोध में जोर-जोर से चिल्लाना. कुछ मुस्लिमों की जबरन घर वापसी कराना और उन पर गौमूत्र छिड़कना, जबकि अन्य को पीटना और गोबर खाने को मजबूर करना आदि-आदि.

ओवैसी दिलाएंगे आईएस के संदिग्धों को कानूनी मदद

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय और जामिया मिलिया को उनका अल्पसंख्यक दर्जा छिनने का डर सता रहा है और समान नागरिक संहिता तो कार्ड में सबसे ऊपर है ही.

इस सबको देखते हुए मुस्लिम अपनी नाराजगी को निश्चित रूप से जायज ठहरा सकेंगे. यह स्थिति 1990 के दशक से ज्यादा भिन्न नहीं है जब मुस्लिम समुदाय के लोग अयोध्या में बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के बाद खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे थे. 

उनकी नाराजगी कांग्रेस से थी जिसका वे निष्ठा के साथ दशकों से समर्थन करते आ रहे थे, उसने भी उनके लिए कुछ नहीं किया. भाजपा ने उन्हें एक तरफ दरकिनार कर दिया तो कांग्रेस ने दूसरी तरफ से. ऐसी स्थिति में मुसलमान खुद को व्यवस्था से अलग समझने लगे हैं.

असदुद्दीन ओवैसी के खिलाफ हैदराबाद में राजद्रोह का केस दर्ज

कुछ युवा स्टूडेन्ट्स इस्लामिक मूवमेन्ट ऑफ इंडिया जैसे कट्टरपंथी संगठन में शामिल हो गए विशेषकर उन राज्यों में जहां कांग्रेस अपयश के साथ एक मात्र धर्मनिरपेक्ष विकल्प के रूप में थी. लेकिन इस प्रक्रिया में जनता और उससे उपजे राष्ट्रीय जनता दल एवं समाजवादी पार्टी के तरह के दलों ने उन्हें रोक लिया जिससे मुस्लिमों में सुरक्षा और प्रतिनिधित्व का बोध आया.

हालांकि ओवैसी इंडियन स्टेट के लिए महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं. वह असहजता महसूस कर रहे मुस्लिमों के असंतोष को दूर करने की कोशिश कर रहे हैं. यदि शुद्ध और स्थिर भाव से देखा जाए तो वह कट्टरवाद के खिलाफ एक सेफ्टी वाल्व की तरह काम कर रहे हैं. लेकिन यह भाजपा की धारणा और सो-समझ से परे है.

वैचारिक संघर्ष

पिछले शुक्रवार को एआईएमआईएम ने हैदराबाद में एंटी-आईएस रैली आयोजित की जिसमें ओवैसी ने इस्लामिक स्टेट के आतंकियों को जहन्नुम का कुत्ता करार दिया है जिन्हें टुकड़ों में काट डालना चाहिए. ओवैसी ने यह भी कहा कि जिहाद करना है तो हथियार मत उठाओ बल्कि गरीबी को हटाओ, गरीब बच्चियों की शादी कराओ, यही जिहाद है.

हिन्दुत्व ब्रिगेड ने उन पर दोहरे मानक अपनाने का आरोप लगाया है कि एक ओर तो वह आईएस की आलोचना करते हैं तो दूसरी ओर कथित आईएस सदस्यों को कानूनी मदद देने की बात करते हैं.

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वास्तव में देखा जाए तो दोनों ही आईएस के खिलाफ सैद्धान्तिक संघर्ष का एक ही भाग है. यहां यह समझना महत्वपूर्ण है कि आईएस एंटी-इस्लामिक और पैशाचिक प्रवृत्ति का है और उन युवाओं को इससे दूर रखना है, जिनको आईएस के प्रचार द्वारा गुमराह किया जा रहा है.

इस बात के साक्ष्य हैं कि ओवैसी को भाषण देने के लिए इन युवाओं ने आमंत्रित किया था जो भारतीय लोकतंत्र के ढांचे में अपने जिहाद के लिए संघर्ष कर रहे हैं. यदि ओवैसी को हमेशा ही गलत ही ठहराया जाता रहा तो उनका एंटी-आईएस शब्द स्पष्ट रूप से उसी तरह से शब्दों का आडम्बर भर रह जाएगा जिसे वह मुहावरे के रूप में नर्क का कुत्ता कहते हैं. हां, वे हिन्दू दक्षिणपंथियों का विरोध करते रहे हैं, उन्हें भावनात्मक उन्माद का तो दोषी बनाया जा सकता है लेकिन राजद्रोह का नहीं.

First published: 18 July 2016, 8:10 IST
 
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