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राजनीतिक दल करोड़ों के चंदे के स्रोत का खुलासा क्यों नहीं करते?

आकाश बिष्ट | Updated on: 26 January 2017, 7:32 IST
(आर्या शर्मा/कैच न्यूज़)

एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक राइट्स की ताज़ा स्टडी कहती है कि 2004-2005 से 2014-15 के बीच सभी राजनीतिक दलों को मिले चंदे का दो तिहाई से अधिक चंदा अज्ञात स्रोतों से आया है. मतलब यह है कि इस दौरान राजनीतिक दलों को जो 11367.34 करोड़ का चंदा मिला, उसमें से 7832.98 करोड़ किसने दिया, इसका स्रोत नहीं बताया गया है.

वर्तमान में राजनीतिक दलों को 20 हजार से कम का चंदा देने वाले राजनीतिक संगठनों या व्यक्तियों का नाम बताने की बाध्यता नहीं है. कई लोगों का मानना है कि इस छूट का उपयोग काले धन को उपयोग सफेद करने में करने में किया जा रहा है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा हाल में काले धन को रोकने के लिए बड़े नोटों को प्रतिबंधित करने के घटनाक्रम के बाद यह अध्ययन हमें याद दिलाता है कि जब बात अज्ञात स्रोत से आय प्राप्त करने की हो तो राजनीतिक दल अब भी गैरजवाबदेह बने हुए हैं.

पर्दे के पीछे से चंदा क्यों?

एडीआर के विश्लेषण से यह साफ है कि पिछले 11 वर्षों में राजनीतिक दलों को 11367.34 करोड़ रुपये चंदे के रूप में मिले लेकिन उसमें मात्र 16 प्रतिशत यानी कि 1835.63 करोड़ ही ज्ञात स्रोत से थे. 

एडीआर ने यह आंकड़े आयकर विभाग से हासिल किए हैं. उसके अनुसार इन 11 वर्षों में कांग्रेस को मिले कुल चंदे का 83 प्रतिशत यानी कि 3323.39 करोड़ रुपये और भाजपा को उसके कुल चंदे का 65 प्रतिशत यानी 2125.91 करोड़ रुपये अज्ञात स्रात से आया है. 

वहीं क्षेत्रीय राजनीतिक दलों में सपा की 94 प्रतिशत आय और शिरोमणि अकाली दल की 86 प्रतिशत आय अज्ञात स्रोतों से आई. इस विश्लेषण में छह राष्ट्रीय राजनीतिक दल जैसे कांग्रेस, भाजपा, बसपा, एनसीपी, सीपीआई तथा सीपीएम के साथ 51 क्षेत्रीय दल शामिल किए गए हैं, जिसमें तृणमूल कांग्रेस भी शामिल है जिसको 2016 में राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा मिला है.

सभी राष्ट्रीय और क्षेत्रीय राजनीतिक दलों में बसपा ही एक मात्र पार्टी रही जिसकी 100 प्रतिशत आय अज्ञात स्रोतों से हुई. यानी कि पार्टी को एक भी डोनेशन बीस हजार रुपये से अधिक का नहीं मिला. अज्ञात स्रोतों से ही सही, लेकिन इसकी आय में इस बीच 2057 प्रतिशत की वृद्धि हुई है. 2004-05 में इसकी आय जहां 5.19 करोड़ थी, वहीं 2014-15 में यह बढ़कर 111.96 करोड़ हो गई. 

रोचक यह है कि इस अवधि में राष्ट्रीय दलों का अज्ञात स्रोतों से चंदा जहां 331 प्रतिशत बढ़ा, वहीं क्षेत्रीय दलों का चंदा 652 प्रतिशत बढ़ा. इनमें भी 51 क्षेत्रीय राजनीतिक दलों में से 12 दलों ने कभी चुनाव आयोग को अपनी आय का ब्योरा देने वाली रिपोर्ट ही नहीं सौंपी. वहीं कम से कम 45 दलों ने 11 साल में कम से एक साल अपनी आय रिपोर्ट चुनाव आयोग को नहीं सौंपी.

अज्ञात स्रोत से आय वह आय होती है जो कि राजनीतिक दलों ने 20000 रुपये से कम की मात्रा में प्राप्त की, जिसका उन्हें स्रोत नहीं बताना होता है. इन अज्ञात स्रोत में सेल आॅफ कूपन, आजीवन सहयोग निधि, रिलीफ फंड, अन्य आय, स्वयंसेवक योगदान, मीटिंग तथा मोर्चा के दौरान मिली आय आदि मदें दिखाई जाती हैं. इसमें जाहिर है नाम और दाता का ब्योरा नहीं होता है.

जबकि ज्ञात स्रोत में संपत्ति बेचने से प्राप्त आय, पुराने समाचार पत्र से आय, सदस्यता शुल्क, डेलीगेट की शुल्क, बैंक इन्टरेस्ट, प्रकाशनों की बिक्री तथा लेवी आदि होती है. इस सबका ब्योरा राजनीतिक दलों के बही-खातों में उपलब्ध होता है.

एडीआर की सिफ़ारिशें

एडीआर ने इन आंकड़ों के मद्देनजर यह अनुशंसा दी है कि राजनीतिक दलों को राइट टू इन्फॉरेमेशन के तहत अपने सभी दानदाताओं के नाम उजागर करना अनिवार्य बनाया जाए. एडीआर के अनुसार यह प्रावधान पड़ोसी देश नेपाल और भूटान समेत जर्मनी, फ्रांस, इटली, ब्राजील, बुल्गारिया और अमरीका तथा जापान में पहले से ही लागू हैं. इनमें से किसी देश में यह संभव नहीं है कि राजनीतिक दलों का 75 प्रतिशत चंदा या आय के स्रोत अज्ञात रहे.

साथ ही एडीआर ने यह अनुशंसा भी की है जिस किसी भी संगठन को विदेश से आय प्राप्त हो रही हो उसे किसी भी रूप में किसी राजनीतिक दल का समर्थन करने या उसके किसी उम्मीदवार के चुनाव अभियान में शामिल होने की अनुमति नहीं मिलनी चाहिए. साथ ही चुनाव आयोग द्वारा दलों की फंडिंग पर लगाम लगाने के प्रयासों का समर्थन करते हुए एडीआर ने कहा है कि सिर्फ उन्हीं राजनीतिक दलों को टैक्स से छूट मिलनी चाहिए जो कि विधानसभा तथा लोकसभा के चुनाव लड़ते और उनमें सीटें जीतते हैं.

साथ ही एडीआर ने चुनाव आयोग की इस मांग का भी समर्थन किया है कि 2000 रुपये से अधिक के सभी चंदा देने वालों के नाम राजनीतिक दलों द्वारा सार्वजनिक किए जाएं. एडीआर ने यह भी मांग की है कि राजनीतिक दलों की चुनाव आयोग को सब्मिट की गई इनकम रिपोर्ट का ऐसी संस्था द्वारा आॅडिट किया जाए जिसे या तो सीएजी अप्रूव करे या फिर खुद चुनाव आयोग. 

First published: 26 January 2017, 7:32 IST
 
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