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आज की टीवी पत्रकारिता का ट्रेलर है रुस्तम!

शौर्ज्य भौमिक | Updated on: 14 August 2016, 8:02 IST

एक खूबसूरत नौसेना अधिकारी, उसकी आकर्षक अंग्रेज पत्नी और एक आशिक मिजाज रईस युवक. अगर ये सारे एक विदेशी शहर में, हाई सोसायटी के बीच एक साथ मौजूद हों तो अवैध संबंधों, हिंसक बदला और सामाजिक मूल्यों के पशोपेश का जो काॅकटेल बनता है, उसका नाम है- रुस्तम!

ये सारे घटनाक्रम उस वक्त के हैं जब 27 अप्रैल 1959 में कमांडर कवास मानेक शॉ नानावटी ने मुंबई पुलिस आयुक्त के सामने पेश हो कर अपना जुर्म कबूला था कि उन्होंने प्रेम आहूजा नाम के एक व्यक्ति को गोली मार दी, क्योंकि उसके नानावटी की पत्नी सिल्विया के साथ अवैध संबंध थे.

खोजी पत्रकारिता से बन रहा कार्रवाई का दबाव

शुक्रवार को रुस्तम बड़ी भव्यता और उम्मीदों के साथ सिनेमाघरों में रिलीज हुई. फिल्म पर लोगों की मिली-जुली प्रतिक्रिया आई है. नानावटी मामले को फिल्म और उसकी समीक्षा के आधार पर सही या गलत ठहराना ठीक नहीं होगा.

नानावटी मामले पर भारत में अंतिम न्यायिक सुनवाई हुई थी जिसे टाइम और न्यूयाॅर्कर ने भी कवर किया था. मामले पर पहले भी दो फिल्में ये रास्ते हैं प्यार के और अचानक बन चुकी हैं. इसके अलावा लेखक सलमान रश्दी के मिडनाइट चिल्ड्रन में भी इसका जिक्र किया गया है इसी तरह इंदिरा सिन्हा की किताब डेथ आॅफ मिस्टर लव में भी.

फिल्म इस लिहाज से भी देखी जानी चाहिए कि भारतीय पत्रकारिता पर व्यक्तिगत नजरिया और राष्ट्रवाद किस कदर हावी है

रुस्तम इसलिए महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि नानावटी मामला संभवतः पहला ऐसा मामला रहा, जिसमें ब्लिट्ज पत्रिका नेे सक्रिय भूमिका निभाते हुए भारत में काफी लोगों को प्रभावित करने की कोशिश की कि वे लोग नानावाटी के पक्ष में आ जाएं. इसके लिए मीडिया ने राष्ट्रवाद और जनभावनाओं का सहारा लिया.

यह एक प्रकार से आज के टीवी पत्रकारिता का ट्रेलर कहा जा सकता है, जो न्याय के लिए आवाज उठाता है. यह फिल्म इस लिहाज से भी देखी जानी चाहिए कि भारतीय पत्रकारिता पर व्यक्तिगत नजरिया और राष्ट्रवाद किस कदर हावी है.

अग्रणी इतिहासकार ज्ञान प्रकाश की किताब मुंबई फेबल्स में इस प्रकरण को हू-ब-हू कवर किया गया है.

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लेखक ज्ञान प्रकाश लिखते हैं, ‘‘जब 23 सितम्बर, 1959 को सुनवाई शुरू हुई, ब्लिट्ज ने इस पूरे मामले को नैतिकता और राष्ट्रवाद के इर्द-गिर्द रचे गए किसी नाटक की तरह लोगों के सामने पेश किया. इस नाटक के तीन मुख्य चरित्र थे, एक खूबसूरत नौसेना अधिकारी, उसकी आकर्षक अंग्रेज पत्नी और एक आशिक मिजाज रईस जिसने एक शादीशुदा महिला को उस वक्त सम्मोहित किया जब उसका पति देश की रक्षा के लिए सीमाओं पर तैनात था. ऐसा करके उसने न सिर्फ नानावटी बल्कि भारत के साथ भी गलत किया.’’

ब्लिट्ज के संपादक रूसी करंजिया (फिल्म में इस किरदार की भूमिका कुमुद मिश्रा ने निभाई है) को खबरों को मसालेदार बना कर पेश करने में महारत हासिल थी. इससे नानावटी मामला सुर्खियों में छा गया और इसकी व्यापक पहुंच ने लोगों को नानावटी के पक्ष में कर दिया लेकिन सच यही था कि नानावटी ने हत्या की थी.

सुनवाई के दिनों में ब्लिट्ज की सुर्खियां थीं- ‘‘ट्रेजेडी आॅफ द एटर्नल ट्रायएंगल’’, ‘‘सिल्विया नानावटी की प्यार और प्रताड़ना की कहानी, उन्हीं की जुबानी’’, ‘‘जनता नानावटी के साथ आए’’ और ‘‘तीन शॉट, जिससे पूरा राष्ट्र हिल गया.’’

अदालत के भीतर के दृश्य दिखाने के लिए तस्वीरों का प्रयोग किया गया. नानावटी के बारे में बताया गया कि अपनी सफेद वर्दी में दिखाई दे रहे इस नौजवान ने अपनी आधी जिंदगी देशसेवा में लगा दी. पवित्रता की मूरत बनी सिल्विया सफेद साड़ी और ब्लाउज पहने हुए थी और रुंधे गले से बोल रही थी.

सुनवाई के दिनों में ब्लिट्ज की प्रसार संख्या 152,000 तक पहुंच गई थी

जब तक मामले की सुनवाई चलती रही ब्लिट्ज नानावटी का एक ही दावा घसीटता रहा कि आपसी संघर्ष के दौरान गोली चल गई और दुर्घटनावश आहूजा की मौत हो गई. हालांकि फिल्म समीक्षा के लिहाज से करंजिया की भूमिका कमतर दिखाई गई है. सुनवाई के दिनों में ब्लिट्ज की प्रसार संख्या 152,000 तक पहुंच गई थी. जन भावनाएं नानावटी के साथ थीं. हाॅकरों ने रिवाॅल्वर की प्रतिकृति बेचनी शुरू कर दी थी. देश को झकझोर कर रख देने वाले इस मामले की सुनवाई को प्रत्यक्ष देखने के लिए हजारों लोग कोर्ट में जमा होने लगे थे. ‘नानावटी जिंदाबाद’ के नारे लगना आम बात थी. ब्लिट्ज ने नानावटी को सफलता पूर्वक एक हीरो के रूप में स्थापित किया.

पत्रकारिता के सारे सिद्धान्त धरे रह गए. ब्लिट्ज ने अपने हाथ में नैतिकता की लाठी उठा ली और देश का मध्य वर्ग नानावटी की गोलियां के पक्ष में खड़ा दिखने लग नानावटी देशभक्ति का प्रतीक बने तो आहूजा भ्रष्टाचार, पूंजीवाद और अनैतिकता का. इन सबके बीच वास्तविकता, वैधता और पत्रकारीय संतुलन कहीं खो गया.

नानावटी प्रभावशाली थे. किसी भी तरह से वे किसी साजिश या उच्च वर्ग के उपहास का शिकार नहीं थे. उन्हें अनगिनत भारतीयों के अलावा प्रधानमंत्री नेहरू, राज्यपाल और नौसेना का पूरा समर्थन था लेकिन फिल्म से यह चीज गायब है.

सवाल यह उठता है कि क्या स्वतंत्रता दिवस के ठीक पहले रुस्तम को रिलीज करना राष्ट्रवाद को भुनाने कोशिश है? या फिर फिल्म को अच्छा रेस्पाॅन्स मिले इसलिए ऐसा किया गया है?

First published: 14 August 2016, 8:02 IST
 
शौर्ज्य भौमिक @sourjyabhowmick

संवाददाता, कैच न्यूज़, डेटा माइनिंग से प्यार. हिन्दुस्तान टाइम्स और इंडियास्पेंड में काम कर चुके हैं.

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