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महिलाओं का खतना: इस अमानवीय प्रथा को लेकर निशाने पर बोहरा समुदाय

लमट र हसन | Updated on: 7 February 2016, 16:44 IST
QUICK PILL
  • भारत में बोहरा मुस्लिम समुदाय के बीच महिलाओं का खतना कराए जाने की परंपरा है. बोहरा समुदाय को मुस्लिमों में सर्वाधिक शिक्षित और समृद्ध समुदाय माना जाता है.
  • मुस्लिम महिलाओं का एक समूह महिलाओं के खतना के खिलाफ मुहिम चलाते हुए भारत सरकार से इसे प्रतिबंधित किए जाने की मांग कर रहा है.

मासूम रानाल्वी सात साल की थी जब उनका खतना कर दिया. हालांकि उन्हें यह याद नहीं कि यह काम ब्लेड या रेजर की मदद से किया गया. लेकिन उन्हें वह दर्द आज भी याद है और उसकी याद उनके जिस्म में न केवल सिहरन पैदा करती है बल्कि वह मनोवैज्ञानिक पीड़ा की याद दिलाती है जिससे उन्हें लंबे समय तक जूझना पड़ा था.

जब रानाल्वी की दादी ने उन्हें मुंबई के भिंडी बाजार ले जाने का फैसला किया तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा. उन्हें उम्मीद थी कि शायद वहां चॉकलेट या आईसक्रीम मिलेगी. लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ. 

इस उम्र में बच्चे टीके का दर्द भी सहने का तैयार नहीं होते. रानाल्वी को भिंडी बाजार के बोहरा मोहल्ले में एक घर में ले जाया गया और फिर पर्दे के पीछे किसी ने उनकी पैंट उतारी और फिर उनकी टांगों को पकड़ते हुए उनका खतना कर दिया गया. उन्हें किसी ब्लैक पाउडर की गंध याद है.

करीब 40 साल पहले रानाल्वी के साथ यह हिंसा हुई लेकिन उसकी यादें आज भी ताजा है. यह परंपरा आज भी जारी है. पूरी दुनिया में जिसमें वह इलाका भी है जिसे बोहरा समुदाय अपना घर मानता है. पश्चिमी देशों में इस परंपरा को गुप्त रूप से अंजाम दिया जाता है लेकिन तीसरी दुनिया के देशों में यह बिना किसी सुरक्षा के अंजाम दिया जाता है. बोहरा समुदाय को मुस्लिमों में सर्वाधिक शिक्षित और समृद्ध माना जाता है. विडंबना यह है कि बोहरा इस्लाम की दुनिया में एकमात्र वैसा समाज है जहां महिलाओं का खतना किया जाता है.

कौन हैं बोहरा?

दाउदी बोहरा समुदाय एक छोटा मगर समृद्ध शिया मुस्लिम समुदाय है जो मुख्य तौर पर पश्मिची भारत में रहते हैं. यह समुदाय अपनी उत्पत्ति शिया इस्माइली मिशनरियों के 11वीं सदी में मिश्र से यमन होते होते हुए खंभात बंदरगाह पर आने से जोड़कर देखता है. इनमें से अधिकांश मिशनरी गुजरात के व्यापारी बन गए और इन्हें ही आज बोहरा के तौर पर जाना जाता है.

पूर्वी अफ्रीका, पश्चिम एशिया और उत्तरी अमेरिका और भारत में मिलाकर कुल करीब 10 लाख बोहरा रहते हैं. इस समुदाय में मुख्य तौर पर व्यापारी, कारोबारी मालिक और प्रोफेशनल्स रहते हैं. बोहरा वर्ल्ड हैडक्वार्टर मुंबई में है जहां इनके समुदाय के धार्मिक मुखिया सैयदना रहते हैं. 

रानाल्वी बताती हैं, 'सैयदना का समर्थन और खतना को मंजूरी दिए जाने की वजह से सभी बोहरा महिलाओं को इसका पालन करना पड़ता है.' इस्लाम में महिलाओं के खतना की बात नहीं की गई है कि लेकिन महिलाओं को इसका पालन करना पड़ता है कि क्योंकि कुछ महिलाएं इसे कुलीन व्यवहार के तौर पर देखती हैं.

रानाल्वी बताती हैं, 'कई बोहरा महिलाएं बताती हैं कि यह प्रक्रिया धर्म की कुलीन प्रक्रिया का हिस्सा है इसलिए पुरुष और महिला दोनों को खतना से गुजरना होता है.'

लेकिन दोनों में एक फर्क है. पुरुषों का खतना स्वास्थ्य और हाईजीन की वजह से किया जाता है जिसे विज्ञान में भी मान्यता मिली हुई है.

रानाल्वी यूएस सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन की रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताती हैं, 'चिकित्सकीय रूप से पुरुषों का खतना किए जाने से एचआईवी और अन्य सेक्सुअल बीमारियों से निपटने में मदद मिलती है.'

महिलाओं को नियंत्रित करने का तरीका

लेकिन महिलाओं का खतना सेक्स की इच्छा को दबाने और महिलाओं को नियंत्रित करने के लिए किया जाता है. ताकि बोहरा पुरुषों को वर्जिन महिलाओं से शादी करने का मौका मिल सके और शादी के बाद उनकी महिलाओं को दूसरे पुरुषों के साथ संबंध बनाने से रोका जा सके.

विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक महिलाओं का खतना करने का कोई फायदा नहीं है और इससे उन्हें उल्टा नुकसान ही होता है. इसके अलावा यह मानवाधिकार का भी उल्लंघन है. दिसंबर 2012 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने महिलाओं का खतना रोकने के लिए प्रस्ताव पारित किया जबकि ऑस्ट्रेलिया में तीन बोहरा समुदाय के लोगों को महिला खतना का दोषी करार दिया गया.

लड़ाई की शुरुआत

रानाल्वी महिलाओं के खतना के खिलाफ आवाज बन चुकी हैं और अब अन्य महिलाएं भी इसके खिलाफ बोलने लगी हैं. महिलाओं के समूह ने एक होकर साल भर पहले चेंज डॉट ओआरजी पर एक याचिका दायर करते हुए सरकार से इसे प्रतिबंधित किए जाने की मांग की. इस याचिका पर अभी तक करीब 45,000 लोग दस्तखत कर चुके हैं.

जीरो टॉलरेंस

संयुक्त राष्ट्र ने 6 फरवरी को महिला खतना के खिलाफ इंटरनेशनल डे ऑफ जीरो टॉलरेंस मनाए जाने की घोषणा की है ताकि इसके खिलाफ मुहिम चलाते हुए इसे शुरू किया जा सके. 'स्पीक आउट ऑन एफजीएम' करीब 50 बोहरा महिलाओं का समूह है और इन्होंने 'इच वन रीच वन' नाम से महिलाओं के खतना  के खिलाफ मुहिम की शुरुआत की है ताकि बोहरा समुदाय के भीतर जागरुकता अभियान चलाया जा सके. साहियो नाम का एनजीओ इस मुहिम में इनका साथ दे रहा है जो महिला खतना के शिकार महिलाओं को मदद पहुंचाता है.

6 फरवारी से 8 फरवारी के बीच यह समूह कम से कम एक बोहरा महिला या पुरुष से संपर्क कर उनसे महिलाओं के खतना के बारे में बातचीत करेगा. 

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रानाल्वी ने कहा, 'हम उन्हें अपने कैंपेन के बारे में बताएंगे और उन्हें यह समझाने की कोशिश करेंगे कि आखिर क्यों हमें भारत सरकार से इसे प्रतिबंधित किए जाने की मांग करनी चाहिए. हम उनसे इस अपील पर दस्तखत करने की अपील करेंगे.'

हालांकि बोहरा समुदाय फिलहाल इसके लिए तैयार नहीं है. दूसरे शब्दों में जो महिला बोहरा पुरुष से शादी करना चाहती हैं उन्हें खतना कराना ही पड़ता है. 

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First published: 7 February 2016, 16:44 IST
 
लमट र हसन @LamatAyub

Bats for the four-legged, can't stand most on two. Forced to venture into the world of homo sapiens to manage uninterrupted companionship of 16 cats, 2 dogs and counting... Can read books and paint pots and pay bills by being journalist.

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