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किसान आत्महत्या या महामारी: बंबई हाईकोर्ट ने लगाई महाराष्ट्र सरकार को फटकार

सौरव दत्ता | Updated on: 4 July 2016, 7:53 IST

महाराष्ट्र सरकार की कड़ी आलोचना करते हुए बंबई हाईकोर्ट की औरंगाबाद पीठ ने किसानों की आत्महत्या के प्रति उदासीनता के लिए प्रदेश सरकार की जमकर खिंचाई की है.

टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज के एक अध्ययन पर भरोसा जताते हुए न्यायमूर्ति बोर्डे और जस्टिस वडाने की बेंच ने महाराष्ट्र के विदर्भ और मराठवाड़ा क्षेत्र में किसानों के संकट के समाधान के लिए पर्याप्त प्रयास न करने पर सरकार को फटकारते हुए एक अंतरिम आदेश पारित किया है.

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सरकार ने एक हलफनामे में कहा है कि विदर्भ और मराठवाड़ा के 14 जिलों के सभी किसान परिवारों के 68 लाख लोगों को राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार अत्यधिक रियायती दरों पर खाद्यान्न की आपूर्ति की जा रही है. इसके तहत चावल 3 रुपये प्रति किलोग्राम और गेहूं दो रुपये प्रति किलोग्राम की दर पर प्रति व्यक्ति प्रति माह 5 किलोग्राम अनाज उपलब्ध कराया जा रहा है.

व्यवस्थागत वजहें

हाईकोर्ट के आदेश के पैरा 37 में महाराष्ट्र को "किसानों के लिए कब्रिस्तान" करार देते हुए अदालत उस वेदना का असली कारण जानना चाहती है, जिसे झेलने के लिए किसानों को मजबूर होना पड़ रहा है.

टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (टीआईएसएस) के अध्ययन का निष्कर्ष यह निकलता है कि जाति और वर्ग के आधार पर जमीन की जोत में भारी असमानता है और यही किसानों के सामने आए इस संकट का सबसे बड़ा कारण है.

अध्ययन में यह भी कहा गया है कि जिस तरह से ऋण बांटे गए, वही किसानों के सामने आए इस संकट का असली कारण है. साथ ही खाद्यान्न के बाजार मूल्य और सरकार द्वारा दिए जा रहे न्यूनतम समर्थन मूल्य के बीच का अंतर भी किसानों पर आए संकट के पीछे बड़ा कारण है.

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लेकिन अदालत के फैसले का मूल सरकार द्वारा राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के कार्यान्वयन की बीन बजाने में है. यह वही विवादास्पद कानून है, जिसका विरोध वर्तमान केंद्र सरकार के अनेक समर्थक पूरे दिल से करते थे.

स्वराज अभियान (द्वितीय) बनाम भारत संघ (रिट याचिका (सिविल) नं 857/2015) में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का विस्तार से हवाला देते हुए अदालत ने फैसला दिया है कि हर जिले के मुख्य राजस्व अधिकारी यह सुनिश्चित करें कि "प्राथमिकता वाले परिवारों" (वे परिवार, जिन्हें भोजन की गंभीर जरूरत है) को भोजन उपलब्ध हो.

इतना ही नहीं, शीर्ष अदालत के फैसले के पैरा 30 से उद्धृत करते हुए आदेश में कहा गया है कि सिर्फ पहचान वाले दस्तावेजों जैसे राशन कार्ड या आधार कार्ड की कमी से किसी भी परिवार को भोजन से वंचित नहीं किया जाना चाहिए.

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अदालत ने यह कहते हुए एक और ऐतिहासिक अधिकार लोगों को दिया है कि बिहार, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में मिड-डे मील में अंडे दिए जाने चाहिए. यह उस समय महत्वपूर्ण हो जाता है जब इसे मध्य प्रदेश सरकार के मिड-डे मील में अंडे देना बंद करने के निर्णय के सामने रखकर देखा जाता है. इससे राजनीतिक बवाल भी मचेगा.

First published: 4 July 2016, 7:53 IST
 
सौरव दत्ता @SauravDatta29

Saurav Datta works in the fields of media law and criminal justice reform in Mumbai and Delhi.

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