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बंबई हाई कोर्ट: गर्भपात महिला का अधिकार है, चाहे वो शादीशुदा हो या लिव इन में

कैच ब्यूरो | Updated on: 21 September 2016, 12:50 IST
(पीटीआई)

बंबई हाई कोर्ट ने एक मामले में सुनवाई के दौरान कहा कि गर्भपात महिला का व्यक्तिगत अधिकार है. इसके साथ ही अदालत ने यह भी कहा कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वो शादीशुदा है या लिव-इन में रह रही है.

हाई कोर्ट ने सुनवाई में महिला के उस अधिकार का भी समर्थन किया, जिसके तहत वो अपनी पसंद का जीवन जीने के लिए पूर्णतः स्वतंत्र है.

कोर्ट ने कहा कि मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट के दायरे को महिला के ‘मानसिक स्वास्थ्य’ तक बढ़ाया जाना चाहिए और चाहे कोई भी कारण हो उसके पास अवांछित गर्भ को गिराने का विकल्प होना चाहिए.

जस्टिस वी के टाहिलरमानी और जस्टिस मृदुला भाटकर की पीठ ने मंगलवार को कहा कि अधिनियम का लाभ सिर्फ विवाहित महिलाओं को ही नहीं दिया जाना चाहिए, बल्कि उन महिलाओं को भी मिलना चाहिए जो सहजीवन (लिव इन) में विवाहित दंपति के रूप में अपने पार्टनर के साथ रहती हैं.

कोर्ट ने कहा कि हालांकि अधिनियम में प्रावधान है कि कोई महिला 12 सप्ताह से कम की गर्भवती है, तो वह गर्भपात करा सकती है और 12 से 20 सप्ताह के बीच महिला या भ्रूण के स्वास्थ्य को खतरा होने की स्थिति में दो चिकित्सकों की सहमति से गर्भपात करा सकती है.

कोर्ट ने कहा कि उस अवधि में उसे गर्भपात कराने की अनुमति दी जानी चाहिए भले ही उसके शारीरिक स्वास्थ्य को कोई खतरा नहीं हो. कोर्ट ने यह टिप्पणी गर्भवती महिला कैदियों के बारे में एक खबर का स्वत: संज्ञान लेते हुए की.    

महिला कैदियों को गर्भ गिराने की इच्छा से जेल अधिकारियों को अवगत कराए जाने के बावजूद अस्पताल नहीं ले जाया गया था. पीठ ने कहा, "गर्भावस्था महिला के शरीर में होता है और इसका महिला के स्वास्थ्य, मानसिक खरियत और जीवन पर काफी असर होता है. इसलिए, इस गर्भावस्था से वह कैसे निपटना चाहती है इसका फैसला अकेले उसके पास ही होना चाहिए."

First published: 21 September 2016, 12:50 IST
 
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