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जीएन साईबाबा की जमानत रद्द, अरुंधति को कोर्ट की अवमानना की नोटिस

अश्विन अघोर | Updated on: 24 December 2015, 15:29 IST
QUICK PILL
  • बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर बेंच ने प्रोफेसर जीएन साईबाबा की जमानत रद्द कर दी है. कोर्ट ने लेखिका अरुंधति रॉय को अदालत की अवमानना के लिए नोटिस भेजा है.
  • नागपुर बेंच के जज ने बॉम्बे हाई कोर्ट के चीफ़ जस्टिस की साईबाबा को एक ईमेल के आधार पर जमानत देने के पूर्व फ़ैसले पर सवाल उठाते हुए इस मामले में बरती गयी अपारदर्शिता पर चिंता जतायी है.

बॉम्बे हाईकोर्ट के नागपुर बेंच ने बुधवार को दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर जीएन साईबाबा की जमानत रद्द कर दी. साईबाबा को महाराष्ट्र पुलिस ने मई 2014 में गिरफ्तार किया था. उनपर प्रतिबंधित माओवादी पार्टी से जुड़े होने का आरोप है.


न्यायाधीश एबी चौधरी की सिंगल बेंच ने उनकी जमानत याचिका खारिज कर दी. अदालत ने लेखिका अरुंधति रॉय के ख़िलाफ़ कोर्ट की अवमानना के लिए नोटिस भी जारी की. अरुंधति ने इस साल 18 मई को एक अंग्रेजी पत्रिका में साईबाबा पर एक लेख लिखा था. उन्हें इसी के लिए नोटिस दी गयी है.

सरकारी वकील भारती डांगरे के अनुसार,"साईबाबा ने पहले मेडिकल आधार पर जमानत मांगी थी...अदालत को लगा कि साईबाबा को कोई बड़ी स्वास्थ्य समस्या नहीं है. राज्य सरकार द्वारा दी जा रही चिकित्सा सुविधा उनके लिए पर्याप्त है."

अरुंधति रॉय ने इस साल 18 मई को एक अंग्रेजी पत्रिका में साईबाबा पर एक लेख लिखा था. उन्हें इसी के लिए नोटिस दी गयी है

अरुंधति को भेजी गयी नोटिस पर डांगरे ने कहा, "अपने लेख में रॉय ने साईबाबा को जमानत न देने के लिए अदालत की आलोचना की है. उन्होंने साईबाबा को 'युद्धबंदी' भी बताया है. अदालत ने अपने फ़ैसले में उनके पूरा लेख उद्धृत किया है." रॉय को 24 जनवरी तक इस नोटिस का जवाब देना है.

हाई कोर्ट ने साईबाबा को 48 घंटे के अंदर पुलिस के सामने हाजिर होने का आदेश दिया है.

मई, 2014 में गढ़चिरौली थाने के विशेष पुलिस बल ने साईबाबा को दिल्ली विश्वविद्यालय के रामलाल आनंद कॉलेज स्थिति आवास से गिरफ़्तार किया था. साईबाबा इस कॉलेज में अंग्रेजी पढ़ाते हैं.

गिरफ़्तार से पहले पुलिस टीम ने उनसे कई बार पूछताछ की थी. साईबाबा पर प्रतिबंधित संगठन सीपीआई-माओवादी का सक्रिय सदस्य होने का आरोप है. उनपर संगठन को लॉजिस्टिक सहयोग देने और उसके लिए नए लोगों की भर्ती में मदद का आरोप है. नागपुर के आईजी पुलिस रविंद्र कदम, "हमने माओवादी-माओवादी पार्टी में सक्रिय रूप से शामिल होने के पर्याप्त सबूत मिलने के बाद उन्हें साल 2014 में गिरफ़्तार किया था."

पुलिस ने प्रोफ़ेसर जीएन साईबाबा पर प्रतिबंधित संगठन सीपीआई-माओवादी का सक्रिय सदस्य होने का आरोप लगाया है

गिरफ़्तारी के बाद साईबाबा ने कई बार जमानत की अर्जी दी. हालांकि हर बार उनकी याचिका खारिज हो गयी. जमानत याचिकाएं खारिज होने के बाद पूर्णिमा उपाध्याय ने बाम्बे हाई कोर्ट के चीफ़ जस्टिस को ईमेल लिखकर साईबाबा की गिरफ़्तारी की परिस्थितियों और उनके गिरती सेहत के बारे में जानकारी दी. जिसके बाद हाई कोर्ट के चीफ़ जस्टिस मोहित शाह और जस्टिस सुनिल शुक्रे ने 30 जून को साईबाबा को जमानत दी. उन्होंने साईबाबा को नियमित जमानत के लिए नागपुर बेंच जाने का निर्देश दिया गया. कोर्ट के आदेश के बाद साईबाबा को नागपुर जेल से 50 हज़ार के निजी मुचलके पर रिहा किया गया.

24 नवंबर को साईबाबा की नियमित जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस एबी चौधरी चीफ़ जस्टिस के एक ईमेल के आधार पर जमानत देने के फैसले से अपनी नाखुशी जतायी. उन्होंने चीफ़ जस्टिस के फैसले पर कुछ कड़े क़ानून सवाल भी उठाए.

उन्होंने मामले को नागपुर और औरंगाबाद बेंच से प्रिंसिपल बेंच में ट्रासफर किए जाने में बरती गयी 'अपारदर्शिता' पर भी चिंता जताती थी. उन्होंने माना कि इससे इन बेंचों के जजों के अधिकार का अवमूल्यन हुआ है.

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24 नवंबर को पारित एक आदेश में जस्टिस चौधरी ने पूछा था,"क्या माननीय चीफ़ जस्टिस बगैर कोई कारण बताये या बगैर किसी मोशन के, दोनों पक्षों को सुने बिना, संबंधित बेंचों के जजों की राय जाने बगैर किसी मामले को किसी बेंच से प्रिंसिपल बेंच में ट्रांसफर कर सकते हैं?"

24 नवंबर को नियमित जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान अदालत द्वारा जाहिर की गयी चिंताओं के बाद साईबाबा की वकील रेबेका जॉन ने अदालत से कहा कि उनके मुवक्किल ने बॉम्बे हाई कोर्ट से किसी भी आधार पर जमानत नहीं मांगी थी.

First published: 24 December 2015, 15:29 IST
 
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